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सुविधाएं बढ़ीं, खेलों का दायरा बढ़ा, लेकिन एशियाड में भारत के गोल्ड मेडल क्यों नहीं बढ़े – द लेंस

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Source :- BBC INDIA

हरमनप्रीत सिंह के मलेशिया पर पहला गोल करने के बाद जश्न मनाते भारतीय खिलाड़ी

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पढ़ने का समय: 9 मिनट

एशिया में भारत एक बड़ी शक्ति के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है और इस मौजूदगी का पैमाना सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं है. कई अन्य क्षेत्रों में भी भारत की कोशिश है कि वह प्रभावी रूप से सामने आ सके जिनमें से एक है खेल.

यही वजह है कि पिछले काफी समय से खेलों के मुकाबलों में भारत के प्रदर्शन को लेकर चर्चा होती रही है, उस पर ज़ोर भी रहा है.

जापान के आईची-नागोया एशियाई खेलों में भारत के प्रदर्शन पर चर्चा हो रही है, क्योंकि पदकों के लिहाज से यह प्रदर्शन 2023 के हांगझाऊ एशियाई खेलों की तुलना में कुछ फीका रहा है.

इस बार भारत 21 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 85 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथे स्थान पर है.

हांगझाऊ में मिले 28 स्वर्ण पदकों के आंकड़े तक इस बार भारतीय दल नहीं पहुंच सका. हांगझाऊ एशियाई खेलों में भारत ने 107 पदक जीते थे और वह अब तक का उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.

लेकिन इस बार एक सवाल ज़्यादा जोर से पूछा जा रहा है कि इतने बड़े प्रतिभा भंडार, बेहतर आधारभूत ढांचे, खेल अकादमियों, खेल विज्ञान और उच्च स्तरीय प्रशिक्षण के बावजूद भारतीय खिलाड़ी वह सुधार क्यों नहीं कर पा रहे हैं, जो रजत पदक को स्वर्ण पदक में बदल देता है?

हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है. अगर भारत 2014 के 57 पदकों से 2018 के 69 पदकों और फिर 2023 के 107 पदकों तक पहुंचा है, तो यह भी स्पष्ट है कि भारतीय खेलों का आधार व्यापक हुआ है.

इसलिए असल सवाल यह है कि भारत के खेल तंत्र ने कितने नए पदक विजेता तैयार किए हैं और कितने नए चैंपियन? क्या हमारी समस्या प्रतिभा की है, कोचिंग की है, उच्च प्रदर्शन तैयारी की है या दबाव को संभालने की? क्या हम खिलाड़ियों को पोडियम तक पहुंचाने में ज़्यादा सफल हो रहे हैं, लेकिन उन्हें पोडियम की सबसे ऊंची सीढ़ी तक पहुंचाने में उतने सफल नहीं हैं?

और अगर ऐसा है, तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? खिलाड़ी की? कोच की? संघों की? या पूरे खेल तंत्र की?

इसे समझने के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बात की भारत की जानी-मानी एथलीट दुति चंद, द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हॉकी कोच प्रीतम रानी सिवाच और जानी-मानी खेल पत्रकार नीरू भाटिया से.

जापान में कैसा रहा भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन

भारतीय महिला हॉकी टीम ने एशियाड ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया. दो अक्टूबर को इसी का जश्न मनाती भारतीय टीम

2016 और 2020 के ओलंपिक खेलों समेत कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं दुति चंद कहती हैं कि जापान में हुए एशियाई खेलों में भारतीय एथलीटों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है.

4×400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक मिला और मिश्रित रिले में कांस्य पदक मिला. हाई जंप में भी पदक आया. लॉन्ग जंप और अन्य स्पर्धाओं में भी पदक आए. चाहे कांस्य हो, रजत हो या स्वर्ण, लेकिन पदक तो आए हैं.

अगर प्रदर्शन के आधार पर देखें तो इस बार भारतीय खिलाड़ियों ने 33 नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं. चाहे हाई जंप हो, पोल वॉल्ट हो, 100 मीटर हो या 200 मीटर, कई स्पर्धाओं में राष्ट्रीय रिकॉर्ड टूटे हैं.

इसलिए केवल पदक को ही सब कुछ नहीं माना जा सकता. कभी पदक मिलता है, कभी नहीं मिलता. लेकिन जो भी खिलाड़ी गया, उसने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया.

द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता प्रीतम रानी सिवाच बीबीसी के इंडियन स्पोर्ट्स वूमन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड में लाइफ़टाइम अचीवमेंट से भी सम्मानित रही हैं. उनका कहना है कि व्यक्तिगत स्पर्द्धाओं में इस बार शायद उतने पदक नहीं आए, लेकिन टीम खेलों में भारतीय दल ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

वह कहती हैं कि इसके पीछे कई कारण हैं. टीम के भीतर बेहतर तालमेल है. उच्च स्तरीय प्रशिक्षण व्यवस्था है. अच्छे कोच हैं. बेहतर आधारभूत ढांचा है.

लेकिन लगभग तीन दशक से खेल पत्रकारिता कर रहीं वरिष्ठ खेल पत्रकार नीरू भाटिया कहती हैं कि यह कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है.

वो कहती हैं, “कुछ स्पर्धाओं में सुधार जरूर हुआ है. स्क्वैश में अच्छा प्रदर्शन हुआ है. कुछ अन्य खेलों में भी प्रगति हुई है. लेकिन समग्र रूप से देखें तो प्रदर्शन उतना प्रभावशाली नहीं रहा जितनी उम्मीद थी.”

क्रिकेट से भी पदक मिले हैं. लेकिन अगर क्रिकेट शामिल नहीं होता तो कुल पदकों की संख्या और कम हो जाती.

भाटिया को ख़ासतौर पर बैडमिंटन में प्रदर्शन से काफ़ी निराशा हुई है. वह कहती हैं सबसे बड़ी उम्मीद सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी से थी.

“उनसे स्वर्ण पदक की उम्मीद थी. पी. वी. सिंधु भी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकीं और जल्दी बाहर हो गईं. लक्ष्य सेन भी कुछ ख़ास नहीं कर पाए.”

स्वर्ण मेडल से चूकना और फ़ाइनल का दबाव

दुति चंद

भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर तो हुआ है लेकिन चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि भारतीय खिलाड़ी बड़ी संख्या में रजत और कांस्य पदकों पर रुक गए.

इस बात पर नीरू भाटिया कहती हैं, ”स्वर्ण पदक का मतलब है कि आप एशिया में नंबर एक हैं. आप सबसे बेहतर हैं. अगर आप लगातार दूसरे या तीसरे स्थान पर आ रहे हैं और उसी से संतुष्ट हो रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप सर्वश्रेष्ठ बनने के काबिल नहीं हैं. यह कोई अच्छी बात नहीं है. उनके हिसाब से इसका अर्थ है कि हमने उतनी प्रगति नहीं की है जितनी हमें करनी चाहिए थी.”

हालांकि दुति चंद कहती हैं कई बार स्वर्ण और रजत का अंतर बहुत कम होता है. वह बताती हैं कि जब उन्होंने 100 मीटर फ़ाइनल में वह केवल 0.01 सेकंड के अंतर से स्वर्ण पदक से चूक गई थीं और उन्हें रजत पदक मिला था.

उन्होंने कहा, “इस बार की प्रतियोगिता में भी दोनों पदकों के बीच बहुत ज़्यादा अंतर नहीं था… 0.01, 0.02 या 0.05 सेकंड जैसे छोटे अंतर से ही स्थान तय हुए.”

वह कहती हैं कि कई बार खिलाड़ी फ़ाइनल में जाकर घबरा जाता है. अपने अनुभव को याद करते हुए वह कहती हैं कि फ़ाइनल में पहुंचकर वह हमेशा थोड़ा घबरा जाती थीं.

वो कहती हैं, ”मन में यह सवाल आता था कि मैं पदक जीत पाऊंगी या नहीं. क्योंकि बहुत सी बातें मायने रखती हैं. जैसे ब्लॉक स्टार्ट कैसा होगा, दौड़ के दौरान सहनशक्ति कैसी रहेगी, मांसपेशियों की ताकत कैसी रहेगी.”

”इसके अलावा दर्शकों की भीड़ होती है, कोच होते हैं, मीडिया होती है. इन सबका थोड़ा दबाव रहता है.”

प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं बेहतर हुई हैं

प्रीतम रानी सिवाच

दुति चंद कहती हैं कि किसी भी प्रतियोगिता में अच्छे प्रदर्शन में सबका योगदान होता है.

उनके मुताबिक़, “खिलाड़ी का काम है मेहनत करना. कोच जिस तरह मार्गदर्शन करेगा, जिस तरह के अभ्यास बताएगा, खिलाड़ी वैसा ही करेगा. लेकिन पूरे तंत्र को चलाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी सरकार की होती है. अगर सरकार समय पर सहायता नहीं देगी तो खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पाएगा.”

वह कहती हैं, ”मान लीजिए आपको किसी प्रतियोगिता में जाना है. अगर उससे पहले राष्ट्रीय शिविर नहीं लगे, सुविधाएं नहीं मिलें, सप्लीमेंट नहीं मिले या विदेश जाकर प्रतिस्पर्द्धा करने के अवसर न मिलें तो जितना प्रदर्शन बेहतर होना चाहिए, उतना नहीं हो पाएगा.”

वह नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि वह लगातार विदेश में रहकर प्रशिक्षण करते हैं.

“इसी कारण विश्व चैंपियनशिप में भी सफल होते हैं, ओलंपिक में भी पदक जीतते हैं और अन्य प्रतियोगिताओं में भी लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हैं.”

कोच प्रीतम रानी सिवाच कहती हैं कि अब शीर्ष स्तर पर सुविधाएं काफी अच्छी हैं. जब हमारी टीमें विश्व कप या एशियाई खेलों में जाती हैं तो उनके साथ बड़ा सहयोगी स्टाफ होता है.

वो कहती हैं, ”खेल विज्ञान का पूरा तंत्र मौजूद रहता है. मनोवैज्ञानिक होते हैं. फिजियोलॉजिस्ट होते हैं. प्रशिक्षक होते हैं. मालिश विशेषज्ञ होते हैं.”

”खिलाड़ियों को लगभग सभी जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं. भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) ने भी काफी सक्रिय भूमिका निभाई है. कई राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र खोले गए हैं. हॉकी के लिए भी ऐसे कई केंद्र शुरू किए गए हैं.”

”इसके अलावा जो छोटी-छोटी योजनाएं शुरू की गई हैं, उनका भी अच्छा प्रभाव पड़ा है. खेलो इंडिया केंद्रों का भी फायदा मिला है. इन सबका असर टीम खेलों में साफ दिखाई देता है. हमने विदेशों से भी उच्च प्रदर्शन कोच नियुक्त किए हैं. उसका भी लाभ खिलाड़ियों को मिला है. मुझे लगता है कि आने वाले समय में इसका फ़ायदा दूसरे खेलों को भी मिलेगा.”

ओलंपिक के लिए क्या तैयारियां करनी चाहिए

29 सितंबर को 4X400 रिले रेस जीतने के बाद जोश में दौड़तीं भारतीय खिलाड़ी

दुति चंद कहती हैं कि ओलंपिक में पदक जीतने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.

वो कहती हैं, “दौड़ प्रतियोगिताओं की बात करें तो दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों का प्रदर्शन अब भी भारतीय खिलाड़ियों से काफी बेहतर है.”

उन्होंने कहा कि भारतीय धावक जहां लगभग 11 सेकंड के आसपास दौड़ते हैं, वहीं दुनिया के शीर्ष खिलाड़ी 10 सेकंड के आसपास या उससे भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

दुति चंद ने कहा, “जब तक हम उस स्तर तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक ओलंपिक पदक की उम्मीद करना कठिन होगा. फिर भी कई ऐसी स्पर्द्धाएं जिनमें भारत के पास पदक की संभावनाएं हैं. लंबी दूरी की दौड़, हाई जंप, पोल वॉल्ट और विभिन्न थ्रो स्पर्द्धाओं में अवसर मौजूद हैं.”

उनका कहना है कि स्प्रिंट स्पर्धाओं में सफलता के लिए खिलाड़ियों को बहुत अधिक मेहनत करनी होगी और उन्हें लगातार समर्थन भी मिलना चाहिए.

दुति चंद कहती हैं कि सरकार जिस तरह खिलाड़ियों को विदेश भेज रही है, प्रतियोगिताएं खेलने का मौका दे रही है, वित्तीय सहायता दे रही है, सप्लीमेंट उपलब्ध करा रही है और राष्ट्रीय शिविरों में सुविधाएं दे रही है, उसे जारी रखना होगा.

उन्होंने कहा, “अगर यह व्यवस्था बनी रहती है तो खिलाड़ी अगले स्तर तक जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर हेमा दास को देखें. उन्होंने विश्व जूनियर चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था. उन्हें अच्छी सुविधाएं मिलीं और बाद में उन्होंने एशियाई खेलों के लिए भी क्वालीफाई किया और रिले में स्वर्ण पदक जीता.”

उनके अनुसार, अगर एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को भी नीरज चोपड़ा जैसी निरंतर सुविधाएं और मार्गदर्शन मिले.

दुति चंद ने कहा कि अगले दो-तीन वर्षों तक उनके साथ लगातार काम किया जाए तो उनका प्रदर्शन और बेहतर हो सकता है और वे ओलंपिक स्तर पर भी अच्छे परिणाम दे सकते हैं.

नीरू भाटिया

प्रीतम रानी सिवाच कहती हैं, ”खिलाड़ियों को सुविधाएं भी पहले की तुलना में अधिक मिल रही हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर अभी काफी काम बाकी है. यही वह क्षेत्र है जहां अभी भी कमी दिखाई देती है. हमें प्रतियोगिताएं बढ़ानी होंगी. खेल संस्कृति विकसित करनी होगी. जब तक समाज में खेल संस्कृति मजबूत नहीं होगी, खेल आगे नहीं बढ़ सकते.”

वह कहती हैं कि इसके साथ ही हमें दीर्घकालिक व्यवस्था भी बनानी चाहिए.

उन्होंने कहा, “जो खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल रहे हैं, उनके लिए अच्छी अकादमियां स्थापित की जानी चाहिए. उन्हें वहां कोचिंग की ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए. अगर एक सफल खिलाड़ी अपनी अकादमी में बच्चों को प्रशिक्षित करेगा तो उसका अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचेगा. मुझे लगता है कि खेलों में आने वाले धन का एक बड़ा हिस्सा इस दिशा में लगाया जा सकता है.”

नीरू भाटिया कहती हैं, ”ओलंपिक अभी दो साल दूर हैं और यह समय बहुत महत्वपूर्ण है. अब हमें यह पहचानना होगा कि एशियाई खेलों के आधार पर ऐसे कौन खिलाड़ी हैं जो ओलंपिक में पदक जीत सकते हैं. फिर उन पर केंद्रित निवेश करना चाहिए. उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कोच उपलब्ध कराए जाएं. उन्हें अधिक अंतरराष्ट्रीय अनुभव दिया जाए. जरूरत हो तो विदेशों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए.”

उनका मानना है कि अगर अगले ओलंपिक में पदक बढ़ाने हैं तो यही रास्ता अपनाना होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS