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जंतर-मंतर पर पुलिस की सख़्ती पर सरकार की चुप्पी क्यों?

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Source :- BBC INDIA

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान एक महिला प्रदर्शनकारी को पकड़कर ले जाते पुलिसकर्मी

इस साल जुलाई महीने में नीट परीक्षा पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेन ज़ी से इंस्टाग्राम के ज़रिये संवाद किया था.

इसके बाद अंग्रेजी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने सितंबर महीने में भारत में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी से जुड़ी एक खोजी रिपोर्ट छापी.

रिपोर्ट में कहा गया था कि एसआईआर अभियान के दौरान चुनाव आयुक्तों को कई फ़ैसलों की जानकारी नहीं दी गई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने इन फ़ैसलों पर बार-बार आपत्ति जताई थी.

विपक्षी दल ये आरोप लगा रहे हैं कि इस प्रक्रिया के ज़रिये 13 करोड़ वोटरों के नाम लिस्ट से काट दिए गए. बीजेपी को इसका चुनावी लाभ मिला है और इसकी वजह से कई राज्यों में वो चुनाव जीतने में सफल रही है.

इस रिपोर्ट के बाद इस साल बनी कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों ने जोर-शोर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग शुरू कर दी.

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं और समर्थकों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए प्रदर्शन की शुरुआत की. इन प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और प्रदर्शनकारियों में जमकर टकराव हुआ.

पिछले कई दिनों से चल रहे इन प्रदर्शनों के दौरान राहुल गांधी समेत विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके, आइसा की अध्यक्ष और आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया.

इसके साथ ही बड़ी संख्या में प्रदर्शन में उतरे युवाओं को हिरासत में लिया गया. आंदोलन को कवर करने के लिए पहुंचे कई पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया.

दिल्ली में इन प्रदर्शनों पर दुनिया भर के मीडिया का ध्यान खींचा और कई अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने इसे पीएम नरेंद्र मोदी की अब तक सबसे बड़ी राजनैतिक चुनौती माना.

क्या यह चुप्पी किसी बड़े संकट का संकेत है?

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साध रखी है. दिल्ली में कई वकीलों ने आरोप लगाया है कि शनिवार और रविवार को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें मनमाने तरीक़े से हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की.

पत्रकारों के संगठनों ने पुलिस और सुरक्षा बलों की सख़्ती, महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी और उनके काम में बाधा डालने पर चिंता जताई.

लेकिन गृह मंत्रालय की ओर से अभी तक इस पर कोई बयान नहीं आया.

हालांकि जब यूएन ह्यूमन राइट्स ने आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई पर चिंता जताई और हिरासत में लिए गए लोगों को तत्काल बिना शर्त रिहा करने की मांग की तो सरकार की ओर से कहा गया कि ये चिंताएं बेबुनियाद और अनुचित हैं. ये देश के आंतरिक मामलों में ग़ैर-ज़रूरी दखलअंदाज़ी है.

कई लोगों का कहना है कि जुलाई में शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर कॉकरोच पार्टी के नेतृत्व में युवाओं का प्रदर्शन हुआ था तो पीएम नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर आकर युवाओं से बात की लेकिन इस बार ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच भारी टकराव के बाद भी युवाओं से बात नहीं की.

सवाल ये है कि क्या ये सरकार की कोई सोची-समझी रणनीति है या फिर इस बार उसे अपना पलड़ा कमज़ोर लग रहा है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने इस सप्ताह अपने कॉलम में लिखा मोदी-बीजेपी की कहानी अभी भी सबसे उल्लेखनीय बनी हुई है, हालांकि यह पहले जितनी जोरदार नहीं रह गई है. मोदी अपने सार्वजनिक पद के 26वें साल में कदम रखते हुए जिस झटके से जूझ रहे हैं उस झटके को कई तरह के थपेड़े और तीखा बना रहे हैं.

मोदी के 25 साल के सफर पर संकटों का साया है और एक बड़े तूफान के आसार बन रहे हैं.

द प्रिंट के राजनीतिक संपादक डीके सिंह एसआईआर मामले को सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत मानते हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ”हमने देखा है कि पहले भी बीजेपी की नीतियों के ख़िलाफ़ सवाल उठाए जा रहे थे लेकिन अब युवा पीढ़ी पीएम से सीधे और आक्रामक अंदाज़ में सवाल कर रही है. इस युवा पीढ़ी के काफी लोग पहले पीएम मोदी के समर्थक हुआ करते थे. लेकिन उनका तीखे तेवरों के साथ सड़क पर उतरना काफ़ी चौंकाने वाला है.”

डीके सिंह कहते हैं, ”नरेंद्र मोदी सरकार कमजोर नहीं दिखना चाहती है. लेकिन युवाओं ने उनके सामने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी है कि विचित्र स्थिति पैदा हो गई है. इसलिए युवा आंदोलनकारियों पर भारी सख़्ती के बावजूद सरकार कुछ भी नहीं कह रही है.”

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SOURCE : BBC NEWS