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https://www.livehindustan.com/lh-img/smart/img/2026/10/16/1200x900/vvr_1792152834410_c5VF_1792152851180_uwwB_350237a2-4837-4322-a06b-006598bed400_c0tb.jpgविजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की फिल्म रणबाली जिसे राहुल सांकृत्यायन ने डायरेक्ट किया है वो रिलीज हो गई है। फिल्म देखने से पहले पढ़ें ये रिव्यू।
फिल्म : रणबाली
स्टार कास्ट : विजय देवरकोंडा, रश्मिका मंदाना
डायरेक्टर : राहुल सांकृत्यायन
विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदान की फिल्म रणबाली रिलीज हो गई है। इस फिल्म को लेकर दोनों स्टार्स काफी एक्साइटेड हैं क्योंकि शादी के बाद दोनों की ये साथ में पहली फिल्म है जो रिलीज हो रही है। फिल्म को राहुल सांकृत्यायन ने डायरेक्ट किया है। अब अगर आप फिल्म देखने का प्लान बना रहे हैं तो पहले ये रिव्यू पढ़ लें।
फिल्म में क्या है
1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में एक ऐसी शैली-जिसे बाद में ‘फैक्शन फिल्में’ कहा गया, इसमें टॉलीवुड पर पूरी तरह से दबदबा था। लाउड डायलॉग, जांघ पर थाप मारना, मूंछों पर ताव देना, कटे हुए सिर और खून से सने दरांती। समय के साथ इसने कई रूप लिए, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता कम होती गई।
क्या है मूवी की स्टोरी
सिंगनमला बोब्बिली रणबाली(विजय देवरकोंडा) का नाटकीय जन्म उसे जीवन की एक बड़ी घटना की ओर ले जाता है, जहां उसके पास बचा समय तेजी से बीत रहा है। उसकी मां, राजप्पा (ईश्वरी राव) चाहती है कि उसके मरने से पहले बेटे की शादी खूबसूरत जयाम्मा (रश्मिका मंदाना) से करवा देती है ताकि उन्हें कोई वारिस मिल सके।
सर थियोडोर हेक्टर (अर्नोल्ड वोस्लू) मद्रास प्रेसीडेंसी पहुंच जाते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य अपनी रानी को ज्यादा से ज्यादा अनाज पहुंचाना है, भले ही इसके लिए किसी को भी कोई भी कीमत चुकानी पड़े। अब क्या रानाबाली अपने लोगों को भुखमरी से बचा पाएगा?
कैसी है फिल्म
भारत में ब्रिटिश शासन किस हद तक गया था, यह दिखाने के लिए राहुल लगभग उन सभी तरीकों का इस्तेमाल करते हैं जिनके बारे में उन्हें पता है कि उन्हें सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिल जाएगी। अपनी बात रखने के लिए उन्होंने अपने शूट किए गए सीन के बीच 1800 के दशक के ‘महान अकाल’ (ग्रेट फेमिन) की ऐतिहासिक तस्वीरें शामिल की हैं।
कहां रही थोड़ी कमी
दिक्कत यह है कि कुछ समय बाद यह ‘टॉर्चर पोर्न’ जैसा लगने लगता है। एक पल आप समझते हैं कि आपको इन दृश्यों को देखना होगा और जो बेचैनी आप महसूस कर रहे हैं उसे सहना होगा ताकि भारत जिस दौर से गुजरा है उसका सम्मान किया जा सके। दूसरी तरफ फिल्म में इतने सारे किरदार हैं कि आप उन पर ध्यान तो देना चाहेंगे, लेकिन आपको कभी इतना मौका ही नहीं मिलता कि आप सच में उनसे जुड़ सकें या उनके प्रति हमदर्दी महसूस कर सकें।
फिल्म यह भी दिखाती है कि भारतीय खुद को भी काफी नुकसान पहुंचाते हैं। फिल्म की शुरुआत में जब अपनी जान पर खतरा आता है तो रणबाली एक आदमी का सिर काट देता है। बाद में उसे इसके नतीजों का सामना करना पड़ता है।
शोर-शराबा खटकने लगता है
यह तो समझ में आता है कि इस दौर में जो कोई भी तकलीफ झेल रहा है, वह गुस्से में होगा, लेकिन कुछ देर बाद फिल्म का शोर-शराबा खटकने लगता है। हेक्टर बार-बार रणबाली चिल्लाता रहता था। एक समय के बाद यह सब बहुत बोरिंग लगने लगता है। लीड करेक्टर अपनी मां पर चिल्लाता है, पत्नी पर भी, दोस्तों पर भी यहां तक कि पृथ्वी पर भी। वो आम टोन में तो बात करते ही नहीं नजर आए।
चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में, राहुल ने रणबाली को कुछ इस तरह पेश किया है जैसे कि वह गुटों की लड़ाई वाली कोई फिल्म हो। फिल्म में मौतों की बढ़ती संख्या कोई समस्या नहीं है क्योंकि इस तरह की फिल्म में ऐसा होना स्वाभाविक ही है। लेकिन इस कहानी को बताते समय ऐसा लगता है कि उन्होंने भावनाओं के बजाय हिंसा को चुना है।
ओवरऑल कैसी है फिल्म
रणबाली इस बचकाने सवाल का बहुत सटीक जवाब देती है कि भारतीयों ने बस अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई क्यों नहीं लड़ी? काफी सटीक ढंग से। लेकिन सवाल का जवाब देने और मुख्य किरदार के लिए मास मूवमेंट की कोशिश के बीच, कहीं न कहीं इस कहानी की आत्मा को खो देती है। ‘रणबाली’ (फिल्म और किरदार) का दिल मानो तभी धड़कता है, जब जयाम्मा आस-पास होती हैं।
रश्मिका गाने में भले ही लिप सिंक बेहतर ना कर पाई हो, लेकिन उनके किरदार ने फिल्म में जान डाल दी है और आप उनके करेक्टर की परवाह करने पर मजबूर हो जाते हो। लेकिन पूरी फिल्म भी ऐसी होती तो मूवी और बेहतर होती।
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