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PoK में कत्लेआम की ग्राउंड रिपोर्टिंग से बौखलाया पाकिस्तान, क्या अल जजीरा को कर दिया ब्लॉक?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

पीओके में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और कथित कत्लेआम की ग्राउंड रिपोर्टिंग के बाद अल जजीरा देश भर में यूजर्स के लिए पहुंच से बाहर हो गया है। इस्लामाबाद ने आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की है…

पाकिस्तान में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर नए सवाल उठ खड़े हुए हैं। दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और चुनाव संबंधी हिंसा की रिपोर्टिंग के बाद अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर अल जजीरा देश भर में यूजर्स के लिए पहुंच से बाहर हो गया है। हालांकि इस्लामाबाद ने कतरी न्यूज नेटवर्क को ब्लॉक करने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिर भी विपक्षी नेता और सोशल मीडिया यूजर्स आरोप लगा रहे हैं कि अल जजीरा इंग्लिश की वेबसाइट तब बाधित की गई, जब ब्रॉडकास्टर ने मुजफ्फराबाद से सुरक्षा बलों की कार्रवाई को उजागर करते हुए ग्राउंड रिपोर्ट्स प्रकाशित की।

दरअसल, ये पाबंदियां उस समय आई हैं जब पाकिस्तान पीओके में अशांति से निपटने के अपने तरीके को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के साथ-साथ कई स्थानीय और क्षेत्रीय डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म तक पहुंच भी सीमित कर दी गई है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने हालांकि ऐसी किसी कार्रवाई की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की है। बता दें कि यह विवाद हफ्तों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों, इंटरनेट ब्लैकआउट और प्रदर्शनकारियों व सुरक्षा बलों के बीच झड़पों के बीच सामने आया है।

क्या पाकिस्तान ने अल जजीरा को किया बैन?

पाबंदी की खबरें सबसे पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई। पूरे पाकिस्तान में यूजर्स ने बताया कि वे अल जजीरा की वेबसाइट नहीं खोल पा रहे हैं। इन दावों को बल तब मिला जब कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने इसे ब्रॉडकास्टर की पीओके रिपोर्टिंग से जोड़ा। न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार, अल जजीरा इंग्लिश उन अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों में शामिल था जो कथित तौर पर पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में यूजर्स के लिए पहुंच से बाहर हो गए। कई स्थानीय और क्षेत्रीय डिजिटल न्यूज पोर्टल भी प्रभावित बताए गए। हालांकि पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (PEMRA), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय या किसी अन्य आधिकारिक संस्था ने अभी तक कोई नोटिफिकेशन जारी कर पुष्टि नहीं की है।

बता दें कि जेकेएलएफ एजेके-जीबी जोन के पूर्व डिप्टी जनरल सेक्रेटरी सोहैब खान ने इस मुद्दे को सबसे पहले उठाया। सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट में उन्होंने लिखा कि इस्लामाबाद से अभी कन्फर्म हुआ कि पीओके में हाल की घटनाओं की कवरेज के बाद एजे इंग्लिश वेबसाइट को पाकिस्तान में बैन कर दिया गया है। स्वतंत्र मीडिया को चुप कराने से सच्चाई नहीं छिप जाएगी। वहीं, लंदन स्थित पीटीआई नेता फैजा मुराद ने भी यही आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अल जजीरा की रिपोर्टिंग के बाद विदेशी पत्रकारों पर भी प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। उर्दू से अनुवादित पोस्ट में उन्होंने लिखा कि पीओके चुनावों पर रिपोर्ट के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने विदेशी पत्रकारों को याद दिलाया कि फॉरेन मीडिया फैसिलिटेशन गाइडलाइंस के तहत लाहौर, इस्लामाबाद और कराची के अलावा किसी भी इलाके से रिपोर्टिंग के लिए पहले से एनओसी जरूरी होगा। उन्होंने इसे ‘हाइब्रिड सरकार’ द्वारा मुक्त पत्रकारिता और विदेशी मीडिया की पहुंच को सीमित करने का सबूत बताया।

अल जजीरा ने पीओके से क्या रिपोर्ट किया?

बता दें कि अल जजीरा उन चुनिंदा बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स में से एक है जो संकट के दौरान पीओके से लगातार ग्राउंड कवरेज दे रहा है। कई दिनों तक मुजफ्फराबाद से रिपोर्टिंग करते हुए ब्रॉडकास्टर ने बड़े पैमाने पर हड़ताल, सड़कें बंद होने, चुनाव तनाव, इंटरनेट ब्लैकआउट और आम लोगों पर सुरक्षा उपायों के असर को दर्ज किया। रिपोर्टों में इंटरनेट शटडाउन से शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़े प्रभाव के साथ तथाकथित असेंबली चुनावों के राजनीतिक विवाद को भी कवर किया गया।

एक रिपोर्ट में बताया गया कि मतदान में भागीदारी काफी कम रही क्योंकि कई लोगों ने विरोध प्रदर्शनों के साथ एकजुटता जताते हुए पोलिंग स्टेशनों से दूरी बनाए रखी। मुजफ्फराबाद लगभग पूरी तरह शटडाउन था, सड़कें सुनसान और बाजार बंद थे। स्थानीय लोगों और विरोधी समूहों ने भारी सुरक्षा तैनाती, कर्फ्यू और रोडब्लॉक के बीच चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष न बताते हुए आरोप लगाए।

ब्रॉडकास्टर ने पाकिस्तान आर्मी चीफ असीम मुनीर के प्रशासन और सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों को भी जगह दी। चुनावी हेराफेरी, जन-नाराजगी और बड़े राजनीतिक संकट के आरोपों को भी दर्ज किया गया। मुजफ्फराबाद की नादिया खिताब राजा ने बताया कि यहां प्रोटेस्ट हो रहे हैं। लोगों और कई पार्टियों ने इसका बॉयकॉट किया है। औरतें बाहर नहीं आ रही हैं। लोग सिस्टम से परेशान हैं। वे तंग आ चुके हैं।

पीओके में विरोध प्रदर्शन क्यों जारी?

प्रदर्शन जून में शुरू हुए और हाल के वर्षों में इलाके के सबसे बड़े विरोध आंदोलनों में शुमार हो गए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) इसका नेतृत्व कर रही है। शुरू में तथाकथित असेंबली में आरक्षित सीटों का विरोध था, जो बाद में राजनीतिक अधिकारों, शासन और आर्थिक मुद्दों तक फैल गया। प्रदर्शनकारियों की मांगों में अधिक राजनीतिक स्वायत्तता, स्थानीय प्रशासन में इस्लामाबाद का हस्तक्षेप कम करना, हिरासत में लिए गए जेएएसी कार्यकर्ताओं की रिहाई, आम लोगों की मौतों की जवाबदेही, संसाधनों का सही बंटवारा और गेहूं समेत जरूरी वस्तुओं की कीमतों का नियमन शामिल है। वादों का क्रियान्वयन, पारदर्शिता, लोकतांत्रिक अधिकार और संस्थागत जवाबदेही भी मांगी जा रही है।

झड़पें, सड़क जाम और इंटरनेट बंद होने से रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई। कार्यकर्ताओं के अनुसार कम से कम 80 आम लोग मारे गए, जबकि जेएएसी ने चार दिनों की झड़पों में 50 से अधिक मौतों और सैकड़ों घायलों का दावा किया। पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की है और स्वतंत्र रूप से सत्यापित भी नहीं किया जा सका। जेएएसी सदस्य सरदार उमर नजीर कश्मीरी ने सुरक्षा बलों पर हिंसक कार्रवाई का आरोप लगाया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था की कड़ी आलोचना करते हुए ‘भारत के लिए रास्ता खोलो’ जैसे नारे भी लगाए।

दूसरी ओर भारत का रुख साफ है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और 1947-48 युद्ध के बाद से इस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। भारत ने 31 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पीओके में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पाकिस्तान के ‘बेरहमी से’ बल प्रयोग की जांच करने और इस्लामाबाद को ‘जुल्म’ के लिए जवाबदेह ठहराने को कहा। नई दिल्ली ने इन विरोध प्रदर्शनों को दशकों से चले आ रहे ‘सिस्टमिक शोषण, बुनियादी अधिकारों से वंचित करने और प्रशासनिक दबाव’ का नतीजा बताया है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN