Source :- Khabar Indiatv
अमेरिका की जनता ने प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप को करारा झटका दिया। मध्यावधि चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की बुरी हार हुई। संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रैट्स को बहुमत मिल गया। ट्रंप की हार से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। ट्रंप ने सारी दुनिया को टैरिफ से धमकाया, अपने दोस्त मुल्कों को सरेआम बेइज्जत किया, नोबेल शांति पुरस्कार लेने के लिए अपनी तारीफों के पुल बांध दिए, अपनी धाक जमाने के लिए ईरान पर हमला किया, सारी ताकत लगाकर भी ईरान को हरा नहीं पाए, लेकिन पूरी दुनिया को मुश्किल में डाल दिया।
अमेरिका में भी तेल की कीमतें बेइंतिहा बढ़ीं, इसलिए चुनाव में जो हुआ वो तो होना ही था। लेकिन क्या इस हार से ट्रंप बदल जाएंगे? इसकी कोई संभावना नहीं है। वह तो अभी भी कह रहे हैं कि ballot पर अगर ट्रंप का नाम होता तो उनकी पार्टी की ज़बरदस्त जीत होती। ट्रंप ये भूल गए कि उन्होंने इन चुनावों में दिन रात कैम्पेन किया, अपने लिए वोट मांगे, पर अब वो हार की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं।
ट्रंप नहीं बदलेंगे, ये तो तय है, पर कांग्रेस और सीनेट में उनकी पार्टी का बहुमत न होने से वो हर मामले में मनमानी नहीं कर पाएंगे। ट्रंप के काम पर संसद की निगरानी बढ़ जाएगी क्योंकि अमेरिका में संसद के पास इसकी power है। ट्रंप के रियल एस्टेट कारोबार और उनके परिवार के सदस्यों की कमाई की जांच हो सकती है, ईरान के युद्ध पर हुए भारी खर्च पर सवाल पूछे जा सकते हैं लेकिन अमेरिका में राष्ट्रपति की बहुत सारी power कांग्रेस में बहुमत से ऊपर होती हैं। इसलिए वो executive order जारी करते रहेंगे।
ट्रंप के पास VETO power है, जो विदेश नीति और सैन्य कार्रवाई जैसे फैसले लेने का अधिकार देती है। ट्रंप के VETO को पलटने के लिए हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। इसलिए ट्रंप का कोई ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
ट्रंप की जगह कोई और लीडर होता तो हार के बाद मनोबल खोकर बैठ जाता लेकिन ट्रंप कभी किसी speed breaker की परवाह नहीं करते, न ही वो अपनी गाड़ी की speed कम करते हैं। अब न उन्हें कोई अगला चुनाव लड़ना है और न किसी को सपोर्ट करना है। इसलिए ट्रंप न बदले हैं, न बदलेंगे।
सिखों का नरसंहार: 1984 के वो खौफनाक दिन
1984 के जख्मों का जिक्र हुआ तो मुझे 1, 2 और 3 नवंबर, 1984 के वो दिन याद आए, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली की सड़कों पर सिख भाइयों का कत्लेआम हुआ था। आज भी ये याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मैं और पत्रकार तवलीन सिंह त्रिलोकपुरी की सड़कों पर गए थे, हम सड़क के बीचों-बीच divider पर चल रहे थे और दोनों तरफ लाशें पड़ी हुई थीं, कुछ कटी हुई, कुछ जली हुई। हमारे देखते-देखते बेकाबू भीड़ ने एक सिख भाई को गले में टायर डालकर जला दिया। हम पुलिस को बुलाने की कोशिश करते रहे, लेकिन दूर-दूर तक पुलिस का कोई नामोनिशान नहीं था। कोई बचाने नहीं आया।
मैं सब्जी मंडी की mortuary (शवगृह) का वो भयानक दृश्य कभी नहीं भूल सकता, जहां एक के ऊपर एक सिख भाइयों की लाशों के ढेर लगे थे। मेरे साथ जो फोटोग्राफर थे, वह लाशों को देखकर बेहोश हो गए थे। शवगृह में पड़ी बर्फ का पानी मुंह पर छिड़क कर मैं उनको किसी तरह होश में ला सका।
हमने तो बस ये दृश्य देखे थे और उन्हें भूल नहीं पाते। सोचिए, जिन लोगों ने अपनों को खोया, जिनके परिवार वाले जलाए गए, जिनके घर लूटे गए, उन पर नवंबर के शुरुआती दिनों को याद करके क्या बीतती होगी। ये सोच कर भी दिल दहल उठता है।
देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 04 नवंबर, 2026 का पूरा एपिसोड
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