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RBI अब इन बैंकों को भी देगा लाइसेंस, 22 साल बाद नियम में बदलाव

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Source :- LIVE HINDUSTAN

केंद्रीय रिजर्व बैंक करीब 22 साल के बाद शहरी सहकारी बैंकों को एक बार फिर से लाइसेंस देना शुरू करेगा। इसके लिए जल्द ही आवेदन संबंधी दिशानिर्देशों का ड्राफ्ट जारी किया जाएगा। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करते हुए यह घोषणा की।

22 साल से थी रोक

बता दें कि आरबीआई ने करीब 22 साल से शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने पर रोक लगा रखी थी। अतीत में कुछ शहरी सहकारी बैंकों में राजनीतिक हस्तक्षेप और कमजोर कामकाज के संचालन के कारण समय-समय पर वित्तीय संकट होने की आशंकाओं के चलते यह फैसला लिया गया था। अब आरबीआई ने इस रोक को हटाने और यूनिवर्सल बैंकों की तर्ज पर ‘ऑन-टैप लाइसेंसिंग’ (किसी भी समय) प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया है। आरबीआई गवर्नर ने बताया कि इस बारे में जनवरी, 2026 में परिचर्चा-पत्र जारी किया गया था और अब हितधारकों से सुझाव लेने के लिए दिशानिर्देशों का मसौदा जल्द जारी किया जाएगा।

इस बीच, आरबीआई ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए केंद्रित रिस्क मैनेजमेंट (सीआरएम) संबंधी दिशानिर्देशों की समीक्षा की घोषणा भी की है। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि वर्ष 2008 में जारी ऋण निगरानी व्यवस्था (सीएमए) संबंधी निर्देश वर्तमान में लागू हैं लेकिन बैंकिंग और सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में आए व्यापक बदलावों को देखते हुए इन्हें अपडेट करना आवश्यक हो गया है।

उन्होंने कहा कि ऋण वितरण से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए ड्राफ्ट संशोधन दिशानिर्देश व्यापक हितधारक परामर्श के लिए जारी किए जाएंगे, ताकि सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाया जा सके।

निदेशकों के कार्यकाल से संबंधित नियमों में संशोधन

हाल ही में आरबीआई ने शहरी सहकारी बैंकों के निदेशकों के कार्यकाल से संबंधित नियमों में संशोधन किया है। आरबीआई ने कहा कि कोई भी व्यक्ति निदेशक मंडल में लगातार 10 साल से अधिक समय तक निदेशक नहीं रह सकता है। आरबीआई ने कहा कि संशोधित दिशा-निर्देशों में कहा कि 10 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद किसी निदेशक की दोबारा नियुक्ति तीन साल के अनिवार्य ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि के बाद ही हो सकेगी।

आरबीआई के मुताबिक ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां शहरी सहकारी बैंकों के निदेशक कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर निदेशक मंडल में बने रहने के लिए बीच में इस्तीफा देकर जल्द ही फिर से निर्वाचित या सह-नामित हो जाते थे। इससे वे निर्धारित अवधि से अधिक समय तक पद पर बने रहते थे। नए नियमों के तहत कूलिंग-ऑफ की अवधि में संबंधित व्यक्ति बैंक से किसी भी रूप में नहीं जुड़ा रहेगा, वह सिर्फ सदस्य या ग्राहक के रूप में जुड़ सकता है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN