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SME कारोबार के लिए क्यों कैश फ्लो के हिसाब से लोन मिलना चाहिए

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Source :- LIVE HINDUSTAN

मुख्य बातें

  • कैश-फ्लो पर आधारित ऋण में नजर इस बात पर होती है कि कारोबार कितना कमाता है, कमाई किस समय होती है, आमदनी में कितना उतार-चढ़ाव रहता है और कारोबार बिना अतिरिक्त दबाव के कितना कर्ज चुका सकता है

भारत के छोटे कारोबार लंबे समय से अपने एक अलग ढंग से चलते आए हैं—रोज की बिक्री, हफ्ते भर की खरीदारी, मौसम के हिसाब से बदलती मांग, परिवार के लोगों की मदद, सप्लायर से मिलने वाला उधार और नकदी के आने-जाने के बीच लगातार संतुलन। फिर भी, दशकों से औपचारिक ऋण निर्णय अक्सर इस आधार पर लिए जाते थे कि एक उद्यमी क्या गिरवी रख सकता है, न कि इस आधार पर कि एंटरप्राइज या छोटी मझोली कंपनी क्या चुका सकती है। इस दृष्टिकोण ने कई व्यवहार्य व्यवसायों को वंचित कर दिया है। तेजी से स्टॉक बदलने वाली फार्मेसी, छोटे दैनिक लेन-देन से कमाई करने वाली मोबाइल एक्सेसरीज की दुकान, त्योहारों से पहले चरम पर रहने वाली सिलाई इकाई या दैनिक नकद और डिजिटल बिक्री के साथ लगातार पुनःपूर्ति करने वाली किराना दुकान, इन सभी के पास गिरवी रखने के लिए भूमि या मशीनरी न होने पर भी अच्छी ऋण चुकाने की क्षमता हो सकती है।

कैश-फ़्लो पर आधारित लेंडिंग को समझना

कैश-फ़्लो पर आधारित ऋण में नजर इस बात पर होती है कि कारोबार कितना कमाता है, कमाई किस समय होती है, आमदनी में कितना उतार-चढ़ाव रहता है और कारोबार बिना अतिरिक्त दबाव के कितना कर्ज चुका सकता है। बैंक स्टेटमेंट, जीएसटी फाइलिंग, पेमेंट मिलने का चक्र, यूपीआई हिस्ट्री और सहमति से साझा किया गया अकाउंट एग्रीगेटर डेटा अंडरराइटिंग को आसान जरूर नहीं बनाते, लेकिन कारोबार की वास्तविक वित्तीय स्थिति को समझने और उनके आकलन को अधिक सटीक बनाने में मदद करते हैं।

जरूरतमंद एमएसएमई के लिए क्रेडिट की कमी को दूर करना

इस अवसर की गुंजाइश काफी बड़ी है। जुलाई 2026 की सिडबी-ट्रांसयूनियन सिबिल एमएसएमई पल्स रिपोर्ट देश में क्रेडिट तक सीमित पहुंच की तस्वीर साफ करती है। दिसंबर 2025 तक भारत में 8.7 करोड़ रजिस्टर्ड एमएसएमई थे। फिर भी मार्च 2026 तक सिर्फ 3.6 करोड़ ने ही औपचारिक क्रेडिट का लाभ उठाया था। इसलिए चुनौती केवल एमएसएमई क्रेडिट का दायरा बढ़ाने की नहीं है। असली जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि बढ़ने वाले ऋण का हर अतिरिक्त रुपया सही कारोबार तक, सही वित्तीय ढांचे के साथ और सही समय पर पहुंचे। कैश-फ्लो पर आधारित लेंडिंग अधिक एमएसएमई को औपचारिक वित्त तक तेज और सीधी पहुंच देने में इस बदलाव को गति दे सकती है।

डिजिटल सबसे पहले, लेकिन सिर्फ डिजिटल नहीं

डिजिटल सिस्टम तेजी से मजबूत हो रहे हैं। यूपीआई ने वित्त वर्ष 2026 में 314 लाख करोड़ रुपये के 24,162 करोड़ ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस किए। साथ ही, सांख्यिकी मंत्रालय के जनवरी-मार्च 2026 के तिमाही बुलेटिन से पता चला कि बिना रजिस्ट्रेशन वाले गैर-कृषि संस्थानों में से लगभग 81% ने कैशलेस ट्रांज़ैक्शन के तरीके अपना लिए थे। अकाउंट एग्रीगेटर सिस्टम भी अब सिर्फ वादों से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर काम करने लगे हैं। ‘सहमति’ (Sahamati) के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में एए (अकाउंट एग्रीगेटर) के जरिए 189 लाख लोन के तहत 1.67 लाख करोड़ रुपये का वितरण हुआ। इसके अलावा, जून 2026 तक इसके पब्लिक डैशबोर्ड पर 31.45 करोड़ लिंक्ड अकाउंट और 49.35 करोड़ मंजूरी (consents) दर्ज की गईं। यह फ्रेमवर्क इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि यह लोन लेने वालों को अपनी मंजूरी से डेटा शेयरिंग पर कंट्रोल देता है और साथ ही लोन देने वालों को व्यवस्थित और वेरिफ़ाइड जानकारी भी उपलब्ध कराता है।

हालांकि, इसकी उपयोगिता केवल सिस्टम से जुड़ाव पर निर्भर नहीं करती; असली फर्क इस बात से पड़ता है कि इसे ग्राहक की पूरी प्रक्रिया में कितनी अच्छी तरह अपनाया जाता है। एमएसएमई को मदद के साथ दिए जाने वाले लोन के मामलों से मिले नतीजे उत्साहजनक हैं। Accion की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 55% लोन अकाउंट एग्रीगेटर के जरिए लिए गए थे। साथ ही, कस्टमर-जर्नी को फिर से डिजाइन करने, फ़ील्ड-टीम की ट्रेनिंग और एनालिटिक्स में सुधार के बाद एए ऐप्लिकेशन के लोन स्वीकृति दर में लगभग 10% की बढ़ोतरी हुई। इससे एक अहम बात सामने आती है। एए तब ज्यादा प्रभावी होता है जब इसे उधारकर्ता की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए, आसान भाषा में समझाया जाए और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक प्रक्रिया भी उपलब्ध हो। इसका इस्तेमाल केवल बैक-एंड एपीआई के तौर पर करने के बजाय ऐसी जानकारी में बदलना जरूरी है, जो वास्तविक क्रेडिट फैसले लेने में काम आए।

लेकिन भारत की कारोबारी अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह डिजिटल नहीं हुई है। आरबीआई की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, लोगों और छोटे रिटेल विक्रेताओं के बीच किए गए एक सर्वे से पता चला है कि वे अभी भी कैश का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करते हैं। साथ ही, वित्त वर्ष 2026 के दौरान चलन में मौजूद बैंकनोट्स की वैल्यू में भी 11.9% की बढ़ोतरी हुई। अंडरराइटिंग के लिहाज से यह तथ्य महत्वपूर्ण है। टियर 3 और उससे छोटे इलाकों में रिटेल बिजनेस में क्यूआर और कार्ड पेमेंट भले ही दिखते हों, लेकिन रोजमर्रा के लेन-देन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कैश में हो सकता है। ऐसे में अगर लेंडर केवल डिजिटल रिकॉर्ड पर निर्भर रहें, तो कारोबार की वास्तविक आय का सटीक आकलन नहीं हो पाता है और उसकी कर्ज चुकाने की क्षमता तथा जोखिम की तस्वीर भी अधूरी रह सकती है।

इस अंतर को ऋण उत्पाद तैयार करते समय भी ध्यान में रखना जरूरी है। लेंडर और एमएसएमई उधारकर्ता के बीच लेन-देन को आसान बनाने के लिए कर्ज चुकाने का शेड्यूल डिजिटल कैश फ्लो के समय और पैटर्न के अनुरूप रखा जा सकता है। मसलन, किश्तों को सेटलमेंट साइकल या मौसमी आय के हिसाब से तय किया जा सकता है। कारोबार में नकदी से होने वाली बिक्री का हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। फील्ड असेसमेंट और कारोबार से जुड़े अन्य प्रमाणों से इसकी पुष्टि हो जाए, तो यह कैश-फ़्लो अंडरराइटिंग में लेंडर को अतिरिक्त भरोसा देता है। केवल इसलिए इसे नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा कि इसका पूरा रिकॉर्ड डिजिटल रूप में दिखाई नहीं देता।

पूरे कारोबार को समझना

बेहतर मॉडल वह है जो डिजिटल साधनों को प्राथमिकता दे, लेकिन जमीनी हकीकत को भी साथ लेकर चले। डिजिटल रिकॉर्ड को एमएसएमई ऋण देने में जरूरी जमीनी और कारोबारी आकलन के साथ जोड़ना चाहिए। इन्वेंट्री टर्नओवर, स्टॉक मूवमेंट, आपूर्तिकर्ता बिल, खरीद चालान, रिसिवेबल साइकल, व्यवसाय की अवधि, उद्यमियों के साथ बातचीत और क्षेत्र-आधारित मूल्यांकन। वैकल्पिक डेटा इस तस्वीर को और स्पष्ट कर सकता है। उचित सहमति और नियंत्रण के साथ एआई भौगोलिक रूप से टैग की गई दुकान की छवियों का विश्लेषण करके व्यवसाय की पहचान, परिचालन सेटअप, इन्वेंट्री की दृश्यता और विजिट के दौरान स्थिरता जैसे संकेतकों का पता लगा सकता है, जबकि इमेज की गुणवत्ता और प्रामाणिकता की मानवीय समीक्षा महत्वपूर्ण बनी रहती है। मैप और लोकेशन डेटा व्यवसाय की उपस्थिति और अवधि की पुष्टि करने, ऑनबोर्डिंग और बाद के सत्यापन निर्देशांकों की तुलना करने, समय के साथ होने वाले बदलावों या पते में परिवर्तन की पहचान करने और स्थान जोखिम पैटर्न को चिह्नित करने में मदद कर सकता है। माइक्रो-मार्केट इंटेलिजेंस किसी ब्रांच या पिन कोड से भी कहीं ज़्यादा बारीक स्तर पर कैचमेंट की क्षमता, कॉम्पिटिटर की सघनता, सोर्सिंग कंसंट्रेशन और क्रेडिट जोखिम की जांच करके एंटरप्राइज को सही संदर्भ में रख सकता है। एक भोजनालय की नकद बिक्री, एक जूते की दुकान का स्टॉक मूवमेंट और एक हार्डवेयर की दुकान का शेल्फ रोटेशन, ये सभी ऋण चुकाने की क्षमता को बता सकते हैं, जो एक बैंक स्टेटमेंट से छूट सकती है। हालांकि, इन संकेतों का काम जमीनी आकलन और सत्यापित वित्तीय आंकड़ों को मजबूत करना होना चाहिए, उनकी जगह लेना नहीं। जिम्मेदारी के साथ किया गया कैश-फ्लो लेंडिंग किसी एक डेटा स्रोत को पूरी तस्वीर मानने के बजाय पूरे कारोबार की वास्तविक स्थिति को समझने पर जोर देता है।

गारंटी जोखिम उठाने की क्षमता को बढ़ाती हैं, वे अंडरराइटिंग की जगह नहीं लेतीं: क्रेडिट गारंटी इस बदलाव को ज़्यादा समावेशी बना सकती हैं, लेकिन इन्हें क्रेडिट अनुशासन का विकल्प नहीं बनना चाहिए। क्रेडिट गारंटी स्कीम के तहत साल 2000 में शुरू होने से लेकर 30 जून, 2026 तक 1.47 करोड़ माइक्रो और छोटे उद्यमों (MSEs) को कुल मिलाकर 14.69 लाख करोड़ रुपये की क्रेडिट गारंटी दी गई है। सीजीएफएमयू माइक्रो यूनिट्स के लिए एक मददगार भूमिका निभाता है। यह मुद्रा फ्रेमवर्क के तहत 20 लाख रुपये तक के कॉलेटरल-मुक्त माइक्रो लोन और योग्य स्वयं-सहायता समूहों (SHGs) के लोन की सुविधा देता है। मिलकर ये योजनाएं लेंडर को पहली पीढ़ी के उद्यमियों और कम क्रेडिट हिस्ट्री वाले कारोबारों तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती हैं। इसके लिए जरूरी है कि अंडरराइटिंग का आधार कैश-फ्लो का आकलन, लगातार निगरानी और शुरुआती चेतावनी संकेत ही रहें।

समावेशी और जिम्मेदार कर्ज की दिशा में

एमएसएमई लेंडिंग का अगला चरण न तो केवल गिरवी पर निर्भर होना चाहिए और न ही सिर्फ एल्गोरिदम के भरोसे चलना चाहिए। इसे कारोबार के कैश-फ़्लो और उसके कर्ज चुकाने के चक्र के अनुरूप होना चाहिए, साथ ही लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी संकेतों और मजबूत पोर्टफोलियो अनुशासन का सहारा लेना चाहिए। जैसे-जैसे एमएसएमई लोन बुक बढ़ती है, प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि क्रेडिट सही कारोबार तक, सही ढांचे के साथ और सही समय पर पहुंचे। भारत के सबसे छोटे कारोबार पहले से ही बिक्री, सेटलमेंट, सप्लायर को भुगतान, लोन चुकाने, स्टॉक की आवाजाही और ग्राहकों के व्यवहार के जरिए वित्तीय अनुशासन का रोजाना सबूत देते हैं। कैश-फ़्लो पर आधारित लेंडिंग से लेंडर इन संकेतों को समझ सकते हैं और बेहतर क्रेडिट फैसले ले सकते हैं। सही तरीके से किया जाए तो यह एमएसएमई फाइनेंस को गिरवी की शर्त से आगे ले जा सकता है और भारत के कारोबार किस तरह कमाते हैं, कर्ज चुकाते हैं और आगे बढ़ते हैं—इस वास्तविकता के और करीब ला सकता है।

लेखक भारत फाइनेंशियल इनक्लूजन लिमिटेड के रिटेल चीफ बिजनेस अफसर आशीष पिपलिया हैं।

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