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ईरान युद्ध से कांप गई दुनिया, लेकिन भारत ने ऐसे बचाई अपनी फ्यूल सप्लाई…जानकर हैरान रह जाएंगे

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Source :- LIVE HINDUSTAN

भारत ने पश्चिम एशिया में 4 महीने तक चले युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान जिस तरह संभावित ईंधन संकट को टाला, वह दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल बन गया। जब अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर हमलों के बाद ईरान ने 28 फरवरी को दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, तब पूरी दुनिया में कच्चे तेल और एलपीजी की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही होती है। भारत, जो अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है, उसके लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी।

इतना ही नहीं, भारत के लगभग 50 प्रतिशत तेल और 90 प्रतिशत एलपीजी की सप्लाई इसी मार्ग से आती है। ऐसे में माना जा रहा था कि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की भारी कमी हो सकती है, लेकिन सरकार की पहले से की गई तैयारियों और त्वरित फैसलों ने इस संकट को आम लोगों तक पहुंचने नहीं दिया।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के कुछ ही हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। ब्रेंट क्रूड भी 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं एलपीजी की कीमतों में करीब 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और 14.2 किलो के घरेलू गैस सिलेंडर की आयात लागत 1,600 रुपये से ऊपर चली गई। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें नहीं लगीं, गैस सिलेंडर की किल्लत नहीं हुई और किसी तरह की राशनिंग लागू नहीं करनी पड़ी।

इस सफलता के पीछे सरकार की कई रणनीतियां थीं। सबसे पहले घरेलू स्तर पर एलपीजी उत्पादन बढ़ाया गया। इसके लिए पेट्रोकेमिकल उद्योग में इस्तेमाल होने वाले C3 और C4 गैस स्ट्रीम को अस्थायी रूप से एलपीजी उत्पादन में लगाया गया। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (OMCs) को निर्देश दिया गया कि वे बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन करें, ताकि आम उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ न पड़े।

सरकार ने मार्च में पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती भी की, जिससे लोगों को राहत मिली। इस फैसले से सरकार को करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ, लेकिन महंगाई को नियंत्रित रखने में यह कदम बेहद अहम साबित हुआ।

पिछले 10 सालों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर किए गए निवेश भी इस संकट के दौरान काम आए। साल 2014 में भारत के पास केवल 11 एलपीजी आयात टर्मिनल थे, जो अब बढ़कर 22 हो चुके हैं। एलपीजी आयात क्षमता भी 12 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़कर 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष पहुंच गई है। इसी तरह भारत अब 27 देशों के बजाय 41 देशों से कच्चा तेल खरीदता है। लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए सप्लायर जुड़े हैं, जबकि अमेरिका और रूस से आयात भी बढ़ाया गया है। इसके कारण भारत की निर्भरता केवल एक क्षेत्र पर नहीं रही और सप्लाई में विविधता आई।

सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को भी तेज किया, जिससे पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर कच्चे तेल की खपत कम की जा सकी। दूसरी ओर रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) में पहले से पर्याप्त स्टॉक मौजूद था। भारत के पास वर्तमान में लगभग दो महीने का कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी का बफर स्टॉक उपलब्ध है, जबकि ISPRL के रणनीतिक भंडार में करीब 5.33 मिलियन टन तेल सुरक्षित रखा गया है। चांदीखोल और पाडुर परियोजनाओं के विस्तार के बाद यह क्षमता और बढ़ेगी।

इस संकट के दौरान कई देशों को गंभीर कदम उठाने पड़े। श्रीलंका ने फिर से पेट्रोल राशनिंग लागू कर दी। पाकिस्तान ने स्कूल बंद किए और कामकाजी सप्ताह छोटा कर दिया। म्यांमार में वाहनों पर ऑड-ईवन नियम लागू हुआ, जबकि बांग्लादेश ने तेल डिपो पर सेना तैनात कर दी। जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे विकसित देशों को भी अपने रणनीतिक भंडार खोलने पड़े और अरबों डॉलर की सब्सिडी देनी पड़ी। लेकिन, भारत में न तो स्कूल बंद हुए, न वाहनों पर रोक लगी और न ही घरेलू गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित हुई। केवल कमर्शियल एलपीजी और डीजल-एविएशन फ्यूल के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी हो सकें।

अब अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा खुल रहा है और जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। कच्चे तेल की कीमतें फिर से लगभग 74 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं और आने वाले महीनों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों पर भी राहत मिलने की उम्मीद है। इस पूरे घटनाक्रम ने साबित किया कि समय रहते बुनियादी ढांचे में निवेश, आयात स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडारण और त्वरित नीति निर्णय किसी भी बड़े वैश्विक संकट का असर आम जनता तक पहुंचने से रोक सकते हैं। भारत की यह रणनीति भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक मजबूत मॉडल मानी जा रही है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN