Source :- LIVE HINDUSTAN
नेपाल और भारत के बीच एक लंबी और खुली सीमा है, जिसका अधिकांश हिस्सा 1816 की सुगौली संधि द्वारा तय किया गया था। हालाँकि, सुस्ता और लिम्पियाधुरा-लिपुलेख-कालापानी जैसे क्षेत्रों में सीमांकन का काम अभी भी अधूरा है।
पड़ोसी देश नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जे से जुड़े कुछ ऐसे दावे किए हैं कि उससे उनके ही देश में राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ है। इस साल दक्षिण एशियाई देश के सबसे कम उम्र यानी 35 साल में प्रधानमंत्री बनने वाले बालेन शाह ने दावा किया है कि उनके देश यानी नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्र पर कब्जा किया है, जबकि काठमांडू लगातार भारत पर कब्जे का आरोप लगाता रहा है। शाह ने यह दावा नेपाली संसद में अपने पहले संबोधन के दौरान किया। अब उनके इस बयान और दावे पर नेपाल में राजनीतिक भूचाल आ गया है। सीमा विशेषज्ञों और विपक्षी दलों के बीच भी शाह के इस बयान पर भारी नाराजगी है।
बालेन शाह ने अपने संबोधन में माना कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्रों से जुड़ा सीमा विवाद दोनों देशों के संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दोनों देशों को इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि काठमांडू ने इस मामले को चीन और यूनाइटेड किंगडम के सामने भी उठाया है।
बालेन शाह ने क्या कहा था?
प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संसद को संबोधित करते हुए बालेन शाह ने कहा, “आप एक तथ्य जानकर हैरान होंगे जो मुझे प्रधानमंत्री बनने के बाद हाल ही में पता चला है। भारत ने न केवल नेपाली क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा किया है।” उन्होंने आगे कहा कि अब दोनों देशों को तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए और दोस्तों की तरह बैठकर इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि नेपाल ने भारत की किन जमीनों पर कथित तौर पर कब्जा किया है।
भारत ने क्या कहा?
बता दें कि नेपाल और भारत के बीच एक लंबी और खुली सीमा है, जिसका अधिकांश हिस्सा 1816 की सुगौली संधि द्वारा तय किया गया था। हालाँकि, सुस्ता और लिम्पियाधुरा-लिपुलेख-कालापानी जैसे क्षेत्रों में सीमांकन का काम अभी भी अधूरा है। यह लंबे समय से चला आ रहा सीमा विवाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव का एक मुख्य कारण रहा है। हालाँकि, नेपाल लगातार भारतीय जमीन पर भारत द्वारा कब्जे की शिकायत करता रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शाह की टिप्पणियों से ऐसा लगा कि कब्ज़ा दोनों तरफ से हुआ है। इस बीच, भारत ने दो टूक कहा है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं और इस मुद्दे को दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।
विपक्ष और विशेषज्ञों का तीखा प्रहार
नेपाली प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद नेपाल में विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नेपाली कांग्रेस की बासना थापा और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश मल्ला जैसे सांसदों ने प्रधानमंत्री से इस दावे के सबूत मांगे हैं या फिर बयान वापस लेने की मांग की है। पूर्व राजदूतों और विशेषज्ञों ने भी इस बयान पर आश्चर्य जताया है। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि नेपाल ने भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीमा स्तंभों के गायब होने के कारण कुछ लोग एक-दूसरे की जमीन का इस्तेमाल जरूर कर रहे होंगे, लेकिन नेपाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर भारत की किसी जमीन पर कब्जा नहीं किया है।एक अन्य पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर अतिक्रमण का कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है और न ही भारत ने कभी आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई मुद्दा उठाया है।
नेपाल सरकार का ‘डैमेज कंट्रोल’
इस मुद्दे पर विवाद बढ़ता देख नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश की है। मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री का आशय सीमा पर स्थित ‘नो-मैन्स लैंड’ (no-man’s land) में होने वाले “क्रॉस-बॉर्डर कब्जे” से था। मंत्रालय के अनुसार, नदियों द्वारा सीमा निर्धारण के कारण कुछ ऐसी स्थितियां बनी हैं जहां एक देश के नागरिक तकनीकी रूप से दूसरे देश की जमीन पर खेती या निवास कर रहे हैं।
क्या है मुख्य विवाद?
नेपाल और भारत के बीच 1816 की सुगौली संधि के समय से सीमा विवाद चला आ रहा है। मुख्य विवाद लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी क्षेत्रों को लेकर है। भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं और इस मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। भारत ने हाल ही में नेपाल द्वारा इन क्षेत्रों पर किए गए दावों को “एकतरफा और कृत्रिम विस्तार” बताते हुए खारिज कर दिया था। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद ने प्रधानमंत्री बालेन शाह की भविष्य की कूटनीतिक वार्ताओं में नेपाल की स्थिति को कमजोर करने की आशंका पैदा कर दी है।
SOURCE : LIVE HINDUSTAN







