Source :- BBC INDIA

कासालगंगा नदी संगोला, मालशिरस और पंढरपुर तालुकों में 42 किमी तक बहती है

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

यह कहानी पानी के संकट से जूझते गांवों के रूपांतरण की है. यह कहानी दूरदृष्टि, इच्छाशक्ति, सहभागिता और सामुदायिक प्रबंधन की है. यह कहानी ऐसी जीत की है जो मिसाल बन गई.

आम तौर पर माना जाता है कि किसी भी गांव को सूखा-मुक्त अवस्था तक पहुंचने में कम से कम 20 से 25 साल लगते हैं. लेकिन जनभागीदारी, जनशिक्षा, जल साक्षरता, योजना, प्रबंधन और मितव्ययी उपयोग के ज़रिये कासालगंगा नदी बेसिन के 23 गांवों ने मात्र सात साल में सूखे पर काबू पा लिया है.

2016 में, कासालगंगा नदी बेसिन में स्थित महूद बुद्रुक गांव ने सूखे से उबरना शुरू किया. धीरे-धीरे कोलेगांव, माहिम, कटफल और अन्य गांवों ने भी इसका अनुसरण किया.

कासालगंगा नदी बेसिन के अधिकांश गांवों ने अपने जलग्रहण क्षेत्र की नदी-जल निकासी प्रणाली को पूरी तरह से पुनर्जीवित कर लिया है. इसके अलावा, उन्होंने जल संरक्षण कार्यों पर भी ज़ोर दिया है.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

महूद बुद्रुक गांव ने जल विकास में पहल की और केंद्र सरकार ने इसे मान्यता दी.

25 फरवरी 2019 को, दिल्ली में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्री नितिन गडकरी ने गांव ‘महूद बुद्रुक’ को राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किया.

‘हमने पानी कमाया है’

महूद बुद्रुक में पहली ग्राम सभा

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

सांगोला, मालशिरस और पंढरपुर तालुकों से होकर बहने वाली कासालगंगा नदी 42 किलोमीटर लंबी है. जबकि इसकी प्रमुख धाराएं और नालियां 20 किलोमीटर लंबी हैं.

नदी बेसिन में कुल 15 गांव और 8 घाटियां हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 35,241.9 हेक्टेयर है. इसमें से 1,417.96 हेक्टेयर वन विभाग के अंतर्गत है. 445 हेक्टेयर वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है.

2011 की जनगणना के अनुसार, यहां की जनसंख्या 74,831 है. यहां 74 जल संग्रहण और जल भंडारण तालाब हैं और कृषि योग्य भूमि 26,671 हेक्टेयर है. इस बेसिन में वार्षिक वर्षा 380 मिमी होती है.

इस दृष्टि से देखें तो कासालगंगा बेसिन एक जलग्रहण क्षेत्र है. बहुत बड़ा तो नहीं, लेकिन इस जलग्रहण क्षेत्र में किए गए जल संरक्षण कार्यों के कारण यहां गिरने वाली बारिश की हर बूंद को रोका जा सकता है.

ग्रामीण गर्व से कहते हैं, “जब बारिश हुई, तो हमने तेज़ी से बहते पानी को धीमा किया, जो धीमे बह रहा था उसे रोक दिया, जो रुक गया उसे हमने ज़मीन में जाने दिया. इस रुके हुए पानी को हम जलाशय के रूप में संरक्षित करते आ रहे हैं. इसीलिए हम कहते हैं कि ‘हमने पानी कमाया है’.”

कासालगंगा घाटी के गांवों में पानी संचय करने का सफ़र आसान नहीं था. इसके लिए जन भागीदारी, जन जागरूकता, श्रमदान, प्रशासन का सहयोग और विभिन्न संगठनों के सीएसआर प्रयासों की आवश्यकता पड़ी. इसके अलावा, टाटा कंसल्टेंसी जैसे संगठनों ने इस कार्य के लिए वैज्ञानिक सहयोग और तकनीकी सहायता प्रदान की.

जल संकट और उसके परिणाम

इस क्षेत्र में सूखा एक प्राकृतिक घटना है. कासालगंगा नदी घाटी भी इससे अछूती नहीं रही. हालांकि, अनार की फसल सूखे की गंभीरता को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार थी.

1980 तक सन्गोला तालुका के महूद और आसपास के गांवों के किसानों अनार की खेती में बहुत रुचि नहीं थी. लेकिन अनार की बिक्री एक सहकारी समिति के माध्यम से व्यवस्थित और प्रबंधित की जाती थी.

इसके चलते शुष्क भूमि क्षेत्रों में ‘अनार की खेती का आंदोलन’ स्थापित हो गया और कासालगंगा नदी बेसिन अनार के बागानों के रूप में स्थापित हो गया.

अनार की फसलों को बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती थी. लेकिन जल पुनर्भरण के लिए कोई कार्य नहीं किया गया. परिणामस्वरूप, भूजल और सतही जल भंडार धीरे-धीरे कम होते गए. इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया. इसके कारण 2013 से 2016 के बीच भीषण सूखा पड़ा.

इस सूखे के दौरान, पानी की कमी के चलते किसानों को अपने अनार और अन्य फलों के बागों का 80 प्रतिशत हिस्सा उखाड़ना पड़ा. इतना ही नहीं, पीने का पानी भी अनुपलब्ध हो गया.

कई गांवों को टैंकरों के ज़रिए पीने का पानी ख़रीदना पड़ा. इससे पानी की गंभीर कमी हो गई. पशुओं के चारे की भी कमी हो गई. इसका असर दूध के कारोबार पर पड़ा और उत्पादन में काफ़ी गिरावट आई.

मज़दूरी की कमी के कारण, गांव के कई कृषि मज़दूर और छोटे भूस्वामी परिवारों को शहरों की ओर पलायन करना पड़ा.

तालुका में प्रसिद्ध महूद का साप्ताहिक बाज़ार ठप पड़ गया. सब्ज़ियों, अनाज, दालों, फलों और सब्ज़ियों जैसे कृषि उत्पादों के उत्पादन में भारी गिरावट आई और कई परिवारों की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई.

जल विकास की शुरुआत कैसे हुई?

महूद बुद्रुक गांव के निवासी और नासिक स्थित पत्रकार महेंद्र महाजन गांव आए और सूखे की स्थिति देखी. उन्हें लगा कि गांव में जल व्यवस्था को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए. उन्होंने यह बात गांव के पत्रकार दीपक धोकटे से कही.

इन दोनों ने तत्कालीन सरपंच बालासाहेब ढाले, उप सरपंच दिलीप नागने, अधिवक्ता धनंजय मेटकारी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष ग्राम में जल आपूर्ति को पुनर्जीवित करने का विचार प्रस्तुत किया.

सभी ने सर्वसम्मति से इसे स्वीकार कर लिया. तुरंत ही पहली ग्राम सभा आयोजित की गई और यह प्रस्ताव पारित किया गया कि जल विकास कार्य में राजनीति को नहीं लाया जाना चाहिए. इस प्रस्ताव का अंत तक पालन किया गया.

महूद गांव में आयोजित पहली ग्राम सभा में 2 हज़ार से अधिक ग्रामीण उपस्थित थे. इस ग्राम सभा में जनहित शुल्क एकत्र करने का निर्णय लिया गया. जनहित शुल्क एकत्र करने के साथ ही असल में काम शुरू हुआ.

जनभागीदारी, जन जागरूकता और जन सहभागिता के तीन तत्वों को केंद्र में रखा गया था. सबसे पहले महूद गांव में जनभागीदारी से कासालगंगा नदी से अतिक्रमण हटाने और नदी के पुनरुद्धार का काम किया गया.

इसी बीच, परिसर में जल संरक्षण का काम ‘जलयुक्त परिसर अभियान’ योजना के माध्यम से किया गया. धीरे-धीरे, कासालगंगा घाटी के सभी गांवों ने महूद का अनुसरण किया. घाटी के ग्रामीणों ने जल विकास का श्रेय ग्राम सभा को दिया, किसी और को नहीं.

सिंचाई क्षेत्र में भारी वृद्धि

कासालगंगा घाटी के पंढरपुर तालुका में चार गांवों के क्षेत्र को छोड़कर सारा इलाक़ा शुष्क भूमि था. कासालगंगा नदी के पुनरुद्धार और जल संरक्षण कार्यों के कारण, 70 से 75 प्रतिशत क्षेत्र सिंचाई के अंतर्गत आ गया है.

गर्दी गांव के किसान सूर्यकांत इनामदार कहते हैं, “कुओं और बोरवेलों में जलस्तर बढ़ने से गांव का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा सिंचित हो गया है. गांव के बाहरी इलाकों में दो-चार किसानों को छोड़कर बाकी सभी किसानों को खेती के लिए पानी मिल रहा है. किसानों ने अनार के बाग उखाड़ दिए हैं और मक्का, सब्ज़ियां, फल, गन्ने की खेती बढ़ गई है.”

जल संरक्षण कार्यों के कारण नदी तट के दोनों ओर दो से पांच किलोमीटर की दूरी तक भूजल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. पहले 300 से 500 फीट गहरे बोरवेल खोदने पर भी पानी नहीं मिलता था. जल संरक्षण कार्यों के बाद ऐसे कई बोरवेलों में पानी आने लगा है.

सर्दियों और बरसात के मौसम में कुएं पानी से लबालब भर जाते हैं. कई किसानों ने जल संग्रहण के लिए खेतों में तालाब बना लिए हैं. इससे मौसमी और वार्षिक सिंचाई के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

मलराना नदी पर दो से तीन किलोमीटर तक पाइपलाइन बिछ गई हैं. विशेष रूप से, नदी के किनारे बसे किसानों ने कुओं से पाइपलाइन बिछाकर ऊपरी इलाकों की शुष्क भूमि को सिंचाई के दायरे में ला दिया है. इसके परिणामस्वरूप, घाटी में मलराना नदी के किनारे कृषि फलने-फूलने लगी है.

जल उपयोग नियोजन और प्रबंधन क्या है?

महूद बुद्रुक की ग्राम सभा में मंथन करते स्थानीय निवासी

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

कासालगंगा नदी में पानी बह रहा है, फिर भी इसके किनारे बसे किसान ड्रिप सिंचाई के अलावा किसी और तरीके से अपनी फसलों की सिंचाई नहीं करते. यह जल साक्षरता के कारण संभव हो पाया है. किसान स्वयं जल की योजना बनाते हैं, उसका उपयोग करते हैं और कुशलतापूर्वक उसका प्रबंधन करते हैं. किसानों ने अपने ऊपर एक प्रकार का जल उपयोग अनुशासन लागू किया है.

पूर्व कृषि अधिकारी शशिकांत महामुनि बताते हैं, “2017 में जब से महूद गांव में जलयुक्त शिविर अभियान शुरू हुआ है, तब से जल प्रबंधन और नियोजन की एक परंपरा स्थापित हो गई है. लगभग 90 प्रतिशत किसानों ने ड्रिप सिंचाई के माध्यम से बाग लगाए हैं. जल भंडारण बढ़ाने के साथ-साथ घाटी के ग्रामीणों ने जल प्रबंधन और नियोजन के क्षेत्र में भी काफ़ी प्रगति की है.”

बाग-बगीचों की खेती करने वाले किसान 100 प्रतिशत ड्रिप सिंचाई प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं.

किसान कैलाश खबाले ने कहा, “ड्रिप सिंचाई के माध्यम से खेती करने के तरीके के बारे में किसानों का मार्गदर्शन किया गया. इसके अलावा, किसान एक-दूसरे की खेती के तरीकों और मशीनरी के उपयोग के फ़ायदों को देखते हैं.”

जलवायु परिवर्तन के अनुसार फसल पद्धतियों में परिवर्तन

बदलते पर्यावरण के अनुरूप किसानों ने अपनी फसल पद्धति में बदलाव किया है. इसी वजह से किसान तनावग्रस्त नहीं हुए हैं और न ही कर्ज़ के चंगुल में फंसे हैं. इसके विपरीत, किसानों ने सब्ज़ियां, फल, अनाज, फलों के बाग और नकदी फसलों जैसी विभिन्न फसलों की ओर रुख किया है.

उदाहरण के लिए, उन्होंने कम समय में तैयार होने वाली और कम पानी की ज़रूरत वाली ज्वार, फूलों की खेती, प्याज, मक्का और अन्य फसलों में विविधीकरण किया है.

महूद, कटफल, चिकमूद, माहिम, गर्दी और अन्य गांवों में कई किसान हैं जिन्होंने कई फलदार पेड़, मिश्रित फलदार पेड़ जैसे मौसमी, इमली, महोगनी और लकड़ी उत्पादन करने वाली फसलें लगाई हैं.

उमेश महाजन ने कहा, “यदि एक फल की फसल में बीमारी लग जाती है, तो दूसरे फल की फसल बनी रहती है. रणनीति यही है कि यदि एक फसल से लाभ नहीं होता है, तो दूसरी फसल से लाभ होना चाहिए.”

किसान विभिन्न प्रकार के फलों की खेती के साथ प्रयोग भी कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, किसान केला, ताड़ी, बांस, इमली, खट्टे फल, अमरूद, आंवला, ड्रैगन फ्रूट आदि जैसे विभिन्न फलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं.

साथ ही, घाटी के किसानों ने प्रत्येक फसल के आर्थिक लाभों को समझ लिया है. इस संदर्भ में, मक्का की अर्थव्यवस्था पर गौर करना महत्वपूर्ण है. वे मक्के के हरे कंदों (हरे पौधों) से मुरघास (silage) बनाते हैं. मक्के को पीसकर दुधारू पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जाता है.

पशुओं के गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में किया जाता है. इसके पीछे की रणनीति कृषि में निवेश कम करना और आय बढ़ाना है. नदी घाटी के किसानों ने आर्थिक व्यवहार्यता का सटीक आकलन किया है. यह कृषि का एक बहुत ही सकारात्मक पहलू है.

क्या हम आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं?

कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों से किसानों की आर्थिक आय में वृद्धि हुई है. हालांकि जैसे-जैसे पैसा आता है वैसे-वैसे शहरों के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है. शहरों में रहकर गांवों में खेती करना या शहरों में निवेश करना पसंद किया जाता है. लेकिन कासालगंगा घाटी के किसानों के मामले में ऐसा नहीं है.

कृषि, संबद्ध उद्योगों और दुग्ध उत्पादन से प्राप्त धन का उपयोग भौतिक व्यय के बजाय कृषि के विकास के लिए किया जा रहा है. उदाहरण के लिए, वे अपनी कमाई का उपयोग भूमि समतल करने, खेतों में गाद भरने, पत्थर और चट्टानें हटाने, बांध बनाने, नालियों की मरम्मत करने, कुएं खोदने, आधुनिक कृषि मशीनरी खरीदने, जल प्रबंधन सामग्री खरीदने, जल नियोजन प्रयोग करने, तालाब बनाने और जल संग्रहण आदि के लिए करते हैं. कुछ किसान बैंकों में धन जमा करते हैं.

25 फरवरी, 2019 को दिल्ली में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन और नदी विकास मंत्री नितिन गडकरी के हाथों राष्ट्रीय जल पुरस्कार प्राप्त करते हुए महूद बुद्रुक के ग्रामीण

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

सचिन पाटिल के अनुसार, “घाटी के ऊपरी इलाकों में काफ़ी बंजर भूमि थी. लेकिन पानी की उपलब्धता के चलते, उन ज़मीनों को विकसित (फसलों के लिए उपयुक्त बनाना) किया जा रहा है और खेती के अंतर्गत लाया जा रहा है.”

“इसके अलावा लोग कमाई का उपयोग घर बनाने, बैंकों में जमा करने, दुधारु पशु खरीदने, बच्चों की शादी करने, बच्चों को शिक्षित करने में कर रहे हैं. कुछ लोग कृषि और कृषि से संबंधित व्यावसायिक क्षेत्रों में कारोबार कर रहे हैं, दुकानें खोल रहे हैं. इसके अलावा, सब्ज़ियां और फलदार पेड़ लगाने में भी निवेश किया जा रहा है. इससे पता चलता है कि अधिकांश किसान आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं.”

जैविक खेती की ओर अग्रसर होना

श्रम की उपलब्धता में कमी और खरपतवारनाशकों और कीटनाशकों के प्रचलन के कारण रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में वृद्धि हुई.

मिट्टी और कृषि उत्पादों पर कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से उत्पादन क्षमता में गिरावट आई है. मिट्टी की उर्वरता में भी समस्याएं उत्पन्न हुई हैं. हालांकि, दुग्ध उद्योग के कारण दुधारु गायों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.

उदाहरण के लिए, छोटे भूस्वामियों और कृषि मज़दूरों ने भी खुली गौशाला बनाकर गाय पालन शुरू कर दिया है. गाय का मूत्र और गोबर इन पशुओं की खेती के लिए जैविक खाद के रूप में उपलब्ध हो रहा है. साथ ही, दूध उत्पादन बढ़ा और आय में भी वृद्धि होने लगी. परिणामस्वरूप, कुछ गांवों में लगभग 80 प्रतिशत किसान जैविक खेती की ओर रुख कर चुके हैं.

ग्रामीणों का कहना है, “लक्ष्य भविष्य में शत प्रतिशत जैविक खेती हासिल करना है. इसके लिए, जागरूकता के माध्यम से अधिकांश किसानों को रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने के लिए प्रेरित किया गया है.”

पानी की उपलब्धता और जैविक खेती के प्रति जागरूकता के कारण किसानों ने रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम कर दिया है. किसानों ने पाया है कि जैविक खेती में निवेश कम होता है और उत्पादन अधिक होता है.

सफलता कैसे हासिल की?

कटफल गांव की आबादी 4,000 है. 4,174.51 हेक्टेयर क्षेत्रफल में से 2,487.82 हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है. शेष भूमि खेती के लिए उपयुक्त नहीं है.

2017 तक यहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं था. मौसमी और स्थायी पलायन जारी था. इसके अलावा, 95 प्रतिशत किसान और कृषि मज़दूर कर्ज़ में डूबे हुए थे.

खेती की ज़मीन बंजर होने के कारण, यहां पारंपरिक फसलों के अलावा कोई अन्य फसल नहीं होती, वो भी बारिश के पानी पर निर्भर थी. बारिश थोड़ी कम होने पर पशुओं को चारा शिविर ले जाना पड़ता था.

इसके अलावा, 80 प्रतिशत परिवार गन्ने की कटाई के लिए कराड, सतारा और सांगली क्षेत्रों में स्थित चीनी कारखानों में मौसमी पलायन करते थे. कुछ परिवार मज़दूरी के लिए स्थायी रूप से वसई-विरार में पलायन कर रहे थे.

लोगों के दान, सीएसआर निधि और जल संरक्षण योजनाओं के माध्यम से, कासालगंगा नदी का पुनर्जीवन हुआ और शिवरा में जल संरक्षण कार्य किए गए. परिणामस्वरूप, भूजल और भूमिगत जल स्तर में वृद्धि हुई. नदी के किनारों पर पानी जमा होने लगा.

इसके परिणामस्वरूप, शिवरा में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि हुई. किसानों को अहसास हुआ कि कटफल गांव की मिट्टी और वातावरण शिमला मिर्च की खेती के लिए बहुत उपजाऊ हैं. इसी से प्रेरित होकर ‘शिमला मिर्च पैटर्न’ को लागू किया गया, जिससे आर्थिक परिवर्तन आया.

कटफल के किसान बालासाहेब पाटिल गर्व से बताते हैं कि हमारे गांव के किसान हर दिन सीजन के दौरान एक करोड़ रुपये की शिमला (धोबली) मिर्च बेचते हैं. गांव से शिमला मिर्च से भरे दो ट्रक और कई पिकअप ट्रक अलग-अलग बाज़ारों में जाते हैं.

मुंबई, ठाणे, कोलकाता, दिल्ली और पटना के व्यापारी किसानों के खेतों से कटफल शिमला मिर्च खरीदते हैं. पहले गांव में काम नहीं मिलता था, अब मज़दूर नहीं मिलते. मानसून और सर्दियों के दौरान गांव को प्रतिदिन 1500 से 1800 मज़दूरों की आवश्यकता होती है.

गांव में आए इस आर्थिक बदलाव को ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया’ ने देखा. इसलिए, गांव में बंद पड़ी शाखा को फिर से खोल दिया गया. इस शाखा में सबसे अधिक जमा राशि किसानों की है.

कुछ ऐसी ही कहानी महूद में भी है, जो फलों और सब्ज़ियों की खेती का केंद्र है, और माहिम, गर्दी और पालशी के दुग्ध उत्पादन वाले गांवों में भी यही हाल है.

युवा रोज़गार में एक महत्वपूर्ण मोड़?

पिछले दो दशकों से, शिक्षित युवा खेती करने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि खेती करना उनके लिए किफ़ायती नहीं था. हालांकि, कासालगंगा नदी बेसिन के गांव धीरे-धीरे अपवाद बनते जा रहे हैं.

यहां के युवाओं ने सीखा और तरक्की की है. चूंकि उन्हें घर से ही कृषि उद्योग का प्रशिक्षण मिल रहा है, इसलिए यह देखा गया है कि इन युवाओं का झुकाव खेती की ओर अधिक है.

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद भी, अधिकांश युवा कृषि की ओर रुख करते नजर आ रहे हैं. शिक्षित युवा नौकरी की तलाश में भागने के बजाय कृषि में कुछ करने के दृढ़ संकल्प के साथ उतर रहे हैं और आम, केला, बांस, इमली और आंवला की खेती में सफलतापूर्वक प्रयोग भी कर रहे हैं.

दत्तात्रेय बंदगर कहते हैं, “अगर आप दूध उत्पादन से प्रति माह 1.5 लाख रुपये कमा सकते हैं, तो नौकरी क्यों करें? माहिम गांव में पहले केवल 6 हज़ार लीटर दूध एकत्र होता था, अब यह बढ़कर 20 हज़ार लीटर से अधिक हो गया है.”

देश के नंबर एक राष्ट्रीय जल पुरस्कार विजेता ग्राम पंचायत महूद बुद्रुक सरपंच, उप सरपंच ने कासलगंगा नदी कायाकल्प परियोजना समन्वयक और ग्रामीणों के साथ कासलगंगा नदी को बारहमासी और स्वच्छ बनाने के लिए अध्ययन के हिस्से के रूप में कासलगंगा नदी की परिक्रमा की

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

कटफल, महूद, गर्दी, सुफली और पालशी गांवों में दूध उत्पादन में वृद्धि की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. घाटी के ग्रामीणों ने दूध उत्पादन में एक क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है. घाटी के गांवों में कृषि और दूध उत्पादन में सफल युवा पाए जाते हैं.

इसके अलावा, गांवों के युवा भी एकजुट होकर सामूहिक खेती करने या कृषि में फसल प्रणाली को बदलने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करने में लगे हुए हैं. उदाहरण के लिए, महूद के कैलाश खबाले ने 5 किसानों को साथ लेकर केले की खेती का सफल प्रयोग किया है. प्रति एकड़ 5 लाख रुपये से अधिक का उत्पादन हुआ है.

महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण

घाटी की महिलाओं को कृषि, कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों, पशुपालन और गैर-कृषि व्यवसायों में काम करने के अवसर मिले तो उन्होंने रोज़गार और स्वरोज़गार से आय अर्जित करना शुरू कर दिया.

2018 में महूद गांव में महिलाओं के 20 स्वयं सहायता समूह थे. अब इनकी संख्या बढ़कर 100 से अधिक हो गई है. स्वयं सहायता समूहों में शामिल होने वाली महिलाएं भूमिहीन, कृषि मज़दूर, दिहाड़ी मज़दूर, छोटे भूस्वामी, व्यवसायी, गृहिणी, स्वयं खेती करने वाली और पशुपालक होती हैं.

ये महिलाएं सब्ज़ी की खेती, मुर्गी पालन, स्वतंत्र व्यवसाय, कृषि-प्रसंस्करण (ज्वार की रोटी, लड्डू, चटनी बनाना) आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं. महिला स्वयं सहायता समूह की नेता उमा भरते का कहना है कि इससे महिला सशक्तिकरण हो रहा है.

आर्थिक उत्पादन के रिकॉर्ड

पहले किसानों के वित्तीय निवेश और आय का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था. हालांकि, हाल ही में घाटी के किसानों ने ये रिकॉर्ड रखना शुरू कर दिया है. किसानों का कहना है कि कासालगंगा नदी के पुनरुद्धार के बाद से हमारी आय लगभग तीन से चार गुना बढ़ गई है.

कासलगंगा घाटी के ग्रामीणों द्वारा निकाली गई 'कासलगंगा नदी संवाद यात्रा'

इमेज स्रोत, Dr. Sominath Gholwe

कुछ आंकड़ों के अनुसार, इन 23 गांवों और बस्तियों में गन्ना और प्याज जैसी नकदी फसलों से 5.33 करोड़ रुपये, सब्ज़ियों से 192.86 करोड़ रुपये, बागवानी (फूलों की खेती) से 1.91 करोड़ रुपये, बकरी और भेड़ पालन से 80 करोड़ रुपये, दुग्ध उत्पादन से 216 करोड़ रुपये, मुर्गी पालन से 1.41 करोड़ रुपये, अंडों से 30.24 करोड़ रुपये, किशमिश से 3.44 करोड़ रुपये और रेशम से 0.42 करोड़ रुपये का कुल अनुमानित उत्पादन हो रहा है.

ग्रामीण क्षेत्रों में, सोने की खरीद को आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. 2016 में, 20 हज़ार की आबादी वाले महूद बुद्रुक गांव में सोने की केवल 7 दुकानें थीं, अब इनकी संख्या बढ़कर 56 से अधिक हो गई है. ज़ाहिर है, कृषि उत्पादों से प्राप्त धन का निवेश सोने की खरीद में किया जा रहा है.

मज़दूरी के क्षेत्र में बदलाव

2017 से पहले, कासालगंगा घाटी के भूमिहीन, कृषि और अकुशल मज़दूर काम की तलाश में विभिन्न स्थानों पर जाया करते थे. कासालगंगा नदी के पुनर्जीवन के बाद मज़दूरों का पलायन रुक गया है, बल्कि बाहरी गांवों से मज़दूर काम के लिए घाटी में आने लगे हैं.

विट्ठलवाड़ी, महूद बुद्रुक गांव में स्थित एक श्रमिक बस्ती है.

कासालगंगा नदी पर काम शुरू होने से पहले, इस बस्ती के मज़दूर किसानों के पास जाकर काम मांगते थे लेकिन अब मज़दूर उपलब्ध नहीं हैं. अब इसकी ज़रूरत नहीं रह गई है क्योंकि मज़दूरों को औपचारिक रूप से संगठित किया गया है.

किसानों और मज़दूरों के बीच मध्यस्थता करने वाला ‘मुकादम’ (ठेकेदार) वर्ग आगे आया है. इन मुकादमों के माध्यम से किसानों की मांग के अनुसार श्रम आपूर्ति शुरू हो गई है. मुकादम किसानों की मांग के अनुसार 10, 12 या 15 मज़दूरों का समूह/टीम बनाकर उन्हें कृषि कार्य के लिए भेजते हैं.

कासालगंगा घाटी के 23 गांवों और बस्तियों में अपनाई गई सहभागी जल विकास पद्धति महाराष्ट्र ही नहीं देश के ऐसे सभी क्षेत्रों के लिए एक मिसाल है जो लापरवाही और कुप्रबंधन से पानी की कमी या सूखे से जूझ रहे हैं.

(डॉक्टर सोमिनाथ घोलवे, ग्रामीण सामाजिक व्यवस्थाओं के विद्वान हैं. उनकी पुस्तक ‘कासालगंगा: लोकसभागतून से जल विकास की एक कहानी’ हाल ही में पुणे स्थित प्रकाशन गृह, द यूनिक फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित की गई है.)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS