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निठारी हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट से बरी सुरिंदर कोली हरिद्वार में मृत पाए गए

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Source :- BBC INDIA

सुरिंदर कोली की पुरानी तस्वीर.

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हरिद्वार पुलिस के मुताबिक़, 2006 के निठारी सिलसिलेवार हत्याकांड में 2025 में सुप्रीम कोर्ट से सभी आरोपों से बरी किए गए सुरिंदर कोली हरिद्वार के भूपतवाला इलाक़े में मृत पाए गए.

सुरिंदर कोली पिछले कुछ महीनों से हरिद्वार में रह रहे थे. वह लाल माता मंदिर के सामने एक छोटी चाय की दुकान चलाते थे. इसी दुकान पर वह मृत पाए गए.

सुरिंदर कोली अल्मोड़ा के भिकियासैंण इलाक़े के रहने वाले थे. पुलिस ने उनके परिवार को घटना की जानकारी दे दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि सुरिंदर कोली को जिन सबूतों के आधार पर पिछली अदालतों ने दोषी ठहराया और सज़ा दी, वह क़ानूनी तौर पर अवैध, अविश्वसनीय और विरोधाभासी थीं.

इस मामले में एक और अभियुक्त रहे मोनिंदर सिंह पंधेर को अदालत पहले ही बरी कर चुकी थी.

नोएडा के सेक्टर-31 स्थित निठारी गाँव में पीड़ित बच्चों के अब चार परिवार ही बचे हैं. ज़्यादातर परिवारों ने गाँव के साथ-साथ अदालती लड़ाई से भी मुँह मोड़ लिया है.

हरिद्वार पुलिस ने क्या बताया

हरिद्वार के सीओ सिटी शिशुपाल सिंह नेगी

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बीबीसी के सहयोगी पत्रकार आसिफ़ अली के अनुसार, उत्तरी हरिद्वार के सप्तऋषि/भूपतवाला क्षेत्र में सुरिंदर कोली का शव मिला.

हरिद्वार के सीओ सिटी शिशुपाल सिंह नेगी ने हुए कहा, “सप्तऋषि क्षेत्र में एक व्यक्ति का शव मिला है. जानकारी मिली है कि मृतक का नाम सुरेंद्र कोली है. प्राथमिक दृष्टि से मामला सुसाइड का लग रहा है. एफ़एसएल की टीम मौके पर जांच कर रही है और शव का पोस्टमार्टम डॉक्टरों के पैनल से कराया जाएगा.”

पुलिस के मुताबिक़, रिहाई के बाद सुरेंद्र कोली हरिद्वार में एक खोखा लगाकर चाय की दुकान चला रहा था। घटना के बाद फ़ॉरेंसिक टीम ने साक्ष्य जुटाए हैं, हालांकि मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है.

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की ‘जीवन आस्था’ हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

क्या था मामला?

मोनिंदर पंधेर की पुरानी तस्वीर.

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मोनिंदर पंधेर और सुरिंदर कोली दोनों को साल 2009 में बलात्कार, हत्या, सबूतों को नष्ट करने और अन्य आरोपों से जुड़े मामलों में ग़ाज़ियाबाद की एक सीबीआई अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी.

11 मामलों में कोली इकलौते अभियुक्त थे और दो मामलों में उन्हें पंधेर के साथ सहअभियुक्त बनाया गया था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2023 में कोली को केस से जुड़े 12 मामलों में बरी कर दिया. साथ ही मोनिंदर भी अपने ख़िलाफ़ दर्ज दो मामलों में निर्दोष साबित हुए.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि जाँच ख़राब तरीक़े से की गई है और “सबूत इकठ्ठा करने के बुनियादी मानदंडों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है.”

कोर्ट का फ़ैसला और सवाल

मोनिंदर पंधेर और सुरिंदर कोली

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कोर्ट के इस फ़ैसले पर वकील पारस नाथ सिंह ने कहा था, ”इस केस में कोई परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं थे. इसलिए कोली के जो भी क़बूलनामे सीबीआई ने दर्ज किए थे, उन्हें कोर्ट ने भरोसे के लायक नहीं माना. क़ानून के मुताबिक़ कबूलनामा ख़ुद से किया हुआ होना चाहिए, किसी डर या दबाव में नहीं.”

308 पन्ने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले की कॉपी के पेज नंबर 47 पर लिखा है, “कोली 60 दिनों तक पुलिस कस्टडी में रहे लेकिन इन 60 दिनों में कभी भी उनकी मेडिकल जाँच नहीं हुई, जिससे शारीरिक प्रताड़ना जैसी संभावनाओं पर संशय बरकरार रहता है. केवल साल 2007 में एक मेडिकल सर्टिफ़िकेट लाया गया, जिसकी विश्वसनीयता को पुष्ट करने के लिए डॉक्टर को गवाही के लिए नहीं पेश नहीं किया गया.”

फ़ैसले में लिखा गया है कि जिस मैजिस्ट्रेट के सामने कोली के कथित कबूलनामे दर्ज किए गए उन्होंने भी इस चीज़ को लेकर संतुष्टि नहीं ज़ाहिर की कि अभियुक्त ने ये बिना किसी के दबाव के कहा है.

हाई कोर्ट ने इस चीज़ को हाइलाइट किया कि अभियोजन पक्ष ने समय-समय पर अपने स्टैंड बदले.

शुरुआती केस कोली और हाउस नंबर डी-5 के मालिक मोनिंदर पंधेर के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया था.

जो चीज़ें स्पॉट से मिलीं, उनके लिए भी दोनों को ज़िम्मेदार माना गया.

लेकिन समय के साथ सारी चीज़ों के लिए कोली को ही दोषी ठहराया जाने लगा.

जाँच के अलग-अलग स्तर पर अभियोजन पक्ष के सबूत भी बदलते रहे और आख़िर में केवल कोली का कबूलनामा ही इकलौता आधार रह गया, जिसकी विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में थी.

11 नवंबर, 2025 को कोली के ख़िलाफ़ लंबित आख़िरी मामले में फ़ैसला सुनाते हुए सीजेआई बीआर गवई की बेंच ने कहा था, “जिन सबूतों को कोर्ट ने अपर्याप्त और अविश्वसनीय बताकर कोली को पहले ही 12 मामलों में बरी कर दिया था. उन्हीं सबूतों के आधार पर एक मामले में उसे दोषी बनाए रखना संवैधानिक रूप से सही नहीं है.”

कोर्ट ने माना कि निठारी में जो अपराध हुए वो बहुत डरावने थे और जिन परिवारों ने अपने बच्चे खोए, उनकी तकलीफ़ शब्दों में नहीं बयां की जा सकती. लेकिन इतनी लंबी जाँच के बाद भी असल अपराधी कौन है, यह पक्के सबूतों के साथ साबित नहीं हो पाया है.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा, ”क़ानून किसी को सिर्फ़ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकता. चाहे शक कितना ही बड़ा क्यों न हो, अदालत को ठोस सबूत चाहिए. अदालत ने साफ़ कहा कि न्याय करने के दबाव में क़ानूनी नियमों को दरकिनार नहीं किया जा सकता.”

कोर्ट ने आख़िर में पुलिस और एजेंसियों की जाँच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए.

कोर्ट ने कहा, ”अगर जाँच समय पर, पेशेवर तरीक़े से और संविधान के नियमों के मुताबिक हो, तो सबसे मुश्किल मामलों में भी सच सामने लाया जा सकता है. लेकिन निठारी मामले में ऐसा नहीं हुआ. लापरवाही और देरी ने पूरी जाँच को कमज़ोर कर दिया और उन रास्तों को भी बंद कर दिया जहाँ से असली अपराधी तक पहुँचा जा सकता था.”

नतीजा ये है कि मोनिंदर सिंह पंधेर और सुरिंदर कोली दोनों सभी मामलों में निर्दोष साबित हुए और रिहा हो गए.

क्या था निठारी कांड?

निठारी कांड के दौरान पुलिस जांच की एक पुरानी तस्वीर.

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साल 2005 से 2006 के बीच दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी गाँव में एक के बाद एक कई बच्चों और युवतियों के ग़ायब होने की घटना सामने आई थी.

इन बच्चों और बच्चियों के परिजनों ने स्थानीय थाने में इन मामलों से जुड़ी शिकायत की लेकिन पुलिस पर महीनों तक अनदेखी के आरोप लगे.

आख़िरकार पुलिस ने जाँच शुरू की, तो पंधेर के घर के पीछे के नाले से 19 कंकाल बरामद किए गए. मोनिंदर सिंह पंधेर और सुरिंदर कोली को गिरफ़्तार किया गया.

मामला सीबीआई तक पहुँचा, जाँच एजेंसी को अपनी खोजबीन के दौरान मानव हड्डियों के कुछ हिस्से और 40 ऐसे पैकेट मिले जिनमें मानव अंगों को भरकर नाले में फेंक दिया गया था.

जाँच आगे बढ़ी और साल 2009 में ग़ाज़ियाबाद की सीबीआई अदालत ने एक मामले में दोनों को फाँसी की सज़ा सुनाई.

लेकिन बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट से होते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और कोर्ट ने अपने फ़ैसले में दोनों ही अभियुक्तों को निर्दोष बताया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS