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फ्रांस के मंत्री का दावा- ‘देश में हालात पुलिस के काबू से बाहर’; आख़िर क्यों भड़के दंगे?

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Source :- BBC INDIA

फ़्रांस के नांतेस में महंगाई और बढ़ती ईंधन क़ीमतों के ख़िलाफ़ विरोध में पुलिस पर टियर गैस फेंकता प्रदर्शनकारी (फ़ोटो: 17 अक्तूबर, 2026)

फ़्रांस के गृह मंत्री लॉरां न्युनेज़ ने कहा है कि वहां के कई शहरों में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद हालात पुलिस के काबू से भी बाहर हो गए हैं.

उन्होंने कहा कि प्रशासन हालात की गंभीरता का अंदाज़ा लगाने में विफल रहा.

उन्होंने इस्तीफ़ा देने की भी पेशकश की लेकिन फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उनसे पद पर बने रहने की गुज़ारिश की.

मैक्रों ने न्युनेज़ से फ्रांस की सड़कों को सुरक्षित बनाने और शनिवार और रविवार की हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों को क़ानून के कटघरे में लाने के तरीक़े तलाशने को कहा है.

फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू सोमवार को कैबिनेट की बैठक कर रहे हैं.

इसमें देशभर में हुई हिंसा और लूटपाट की घटनाओं की समीक्षा की जाएगी.

आधुनिक फ्रांस के इतिहास में सार्वजनिक अशांति के ये सबसे गंभीर मामलों में से एक हैं.

लाखों लोग सड़कों पर उतरे

फ़्रांस के माउंटपीलिया शहर में 17 अक्तूबर को विरोध के लिए जुटे लोग

शनिवार, 17 अक्तूबर को 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने बढ़ती महंगाई और अच्छी सरकारी शिक्षा समेत सार्वजनिक सेवाओं की ख़राब क्वालिटी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. ज़्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे. लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ प्रदर्शनकारी और तोड़फोड़ करने वाले लोग सामने आए, जिसके बाद हालात बिगड़ गए.

अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट और तोड़-फोड़ की गई.

दंगा रोधी पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछार की. कई जगह पुलिसकर्मियों को लोगों पर डंडे बरसाते हुए देखा गया. फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक़, शनिवार को करीब 1,000 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें सात की हालत गंभीर है.

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कार्यकाल ख़त्म होने वाला है

गृह मंत्री न्युनेज़ पर राजनीतिक विरोधियों, कुछ ट्रेड यूनियनों और सोशल मीडिया मंचों पर लोगों ने आरोप लगाया है कि शनिवार को पहले से तय कई प्रदर्शनों से निपटने के लिए वह पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए और पुलिस की तैनाती भी कम थी.

फ्रांस की संसद के निचले सदन की अध्यक्ष याएल ब्राउन-पिवे ने कहा है कि वह पूरे मामले की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करना चाहती हैं.

रविवार रात फ्रांस की राजधानी पेरिस में टूटी हुई दुकानों की कतार के पास एक दीवार पर लाल रंग से लिखा था, “रोशनी के शहर में अंधेरा छाया हुआ है.”

पेरिस को अक्सर ‘सिटी ऑफ़ लाइट’ यानी ‘रोशनी का शहर’ कहा जाता है.

फ्रांस में ऐसी अफ़वाहें भी थीं कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों देश के कुछ हिस्सों में अस्थायी कर्फ्यू लगा सकते हैं या हालात को शांत करने के लिए आपातकाल लागू कर सकते हैं.

राष्ट्रपति मैक्रों की आलोचना

पेरिस में 17 अक्तूबर को एक रैली के दौरान प्रदर्शनकारी

आख़िर में, मैक्रों ने रविवार को टेलीविज़न पर देश को संबोधित किया. उन्होंने लोगों से राष्ट्रीय एकता की अपील की और फ्रांस की जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दी जाएगी.

मैक्रों के भाषण की फ्रांस के मीडिया में कड़ी आलोचना हुई है. मीडिया का कहना है कि भाषण में ठोस जानकारी नहीं दी गई.

मीडिया में कई सवाल भी पूछे जा रहे हैं.

मसलन, अब तोड़-फोड़ और दंगा करने वालों को क़ानून के कटघरे में कैसे लाया जाएगा?

फ्रांस के शहरों और कस्बों को बेहतर तरीक़े से कैसे सुरक्षित किया जाएगा? ख़ासकर तब, जब कुछ हफ़्तों बाद फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों का एलान हो चुका है.

तोड़फोड़ की वजह से हुए नुक़सान की भरपाई कारोबारियों को कैसे और कब की जाएगी?

और शिक्षा के मुद्दे पर छात्रों और शिक्षकों के संगठनों के साथ बातचीत कब शुरू होगी? आख़िर पिछले महीने इन्हीं मुद्दों को लेकर ये प्रदर्शन शुरू हुए थे.

मैक्रों के उत्तराधिकारियों के बीच कड़ा मुक़ाबला

प्रवासी विरोधी राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मरीन ली पेन, ख़ुद को राष्ट्रपति पद के दावेदार में से एक के तौर पर पेश कर रही हैं

रविवार को फ़्रांस के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन में एक, सीजीटी यूनियन की महासचिव सोफी बिने ने मैक्रों पर छात्रों की चिंताओं, महंगाई के संकट और फ्रांस में सार्वजनिक सेवाओं की लगातार गिरती गुणवत्ता को दूर करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया.

ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ने अब यह ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री लेकोर्नू को सौंप दी है. फ्रांस में मैक्रों को व्यापक रूप से एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर देखा जा रहा है, जिनका कार्यकाल अब ख़त्म होने वाला है. वह सत्ता से विदा होने की राह पर हैं.

उनका उत्तराधिकारी बनने के लिए कड़ा मुक़ाबला चल रहा है और छह महीने बाद चुनाव होना है. प्रवासी विरोधी राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मरीन ली पेन और पूंजीवाद विरोधी वामपंथ के नेता ज्यां-ल्यूक मेलोंशों भी सुर्खियों में आने की कोशिश कर रहे हैं.

इससे फ्रांस में पहले से जारी तनाव और बढ़ रहा है. यह तनाव राजनीति के साथ-साथ सड़कों पर भी दिखाई दे रहा है.

फ्रांस की संसद ठप पड़ी है और तीन राजनीतिक धड़ों के बीच गहरे मतभेद हैं. तीनों सत्ता के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं.

इसके अलावा फ्रांस की आर्थिक परेशानियां भी हैं. निवेशक सरकार पर बढ़ते सार्वजनिक कर्ज़ को काबू में करने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं. लेकिन फ्रांसीसी सरकार को डर है कि अगर उसने सार्वजनिक सेवाओं या कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती की, तो और भी ज़्यादा नाराज़ लोग सड़कों पर उतर आएंगे.

आगे क्या होगा?

फ़्रांस के कई शहरों में प्रदर्शनकारी बेकाबू हो गए और कई दुकानें लूट लीं

इस समय फ्रांस में लोग अक्सर सवाल पूछ रहे हैं, “अब क्या होगा? आगे क्या होगा? क्या हमारा देश टूट चुका है?”

शनिवार की घटनाओं से पूरे फ्रांस में लोग हैरान और परेशान हैं. आंसू गैस से घिरे शहरों, खुलेआम लूटपाट और जलती हुई सार्वजनिक इमारतों की तस्वीरों ने देश को चिंता में डाल दिया है.

जिन लोगों से मैं बात कर रहा हूं, उनमें से कई इस बात से निराश हैं कि वे भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन देश के प्रमुख नेता इसके बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाने में जुटे हुए हैं और मौजूदा अस्थिरता के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

शिक्षक और तीन बच्चों के पिता एडुआर ने मुझसे कहा, “जब हम अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तब वे इस स्थिति को राष्ट्रपति चुनाव के लिए राजनीतिक लड़ाई का मुद्दा बना रहे हैं.”

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए टियर गैस का इस्तेमाल किया (फ़ोटो: 17 अक्तूबर, 2026)

मैक्रों और उनके प्रधानमंत्री ने शनिवार की हिंसा और अराजकता के लिए कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को ज़िम्मेदार ठहराया. वहीं, कट्टर वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलोंशों ने सरकार पर “अक्षमता” का आरोप लगाया.

राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी नेता मरीन ली पेन, जो क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सख़्त रुख़ के लिए जानी जाती हैं, ने फ्रांसीसी झंडे के सामने बैठकर राष्ट्रपति के अंदाज़ में एक वीडियो जारी किया. इसमें उन्होंने “थकी हुई, अपनी ऊर्जा खो चुकी और दिशाहीन मैक्रों सरकार” को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.

अगले दो हफ़्तों में फ्रांसीसी अधिकारी हालात में थोड़ी राहत की उम्मीद कर रहे हैं. सोमवार से छात्रों की मिड-टर्म छुट्टियां शुरू हो रही हैं.

लेकिन 5 नवंबर को कई ट्रेड यूनियनों के साथ-साथ फ्रांस के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय ‘येलो जैकेट’ (जिले जों) आंदोलन ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन का ऐलान किया है.

इस आंदोलन ने 2018 में मैक्रों के पहले कार्यकाल के दौरान एक साल से ज़्यादा समय तक प्रदर्शन किए थे.

फ्रांस इस समय सांस थामे हुए है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS