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बंदर की खोपड़ी तोड़ेंगे, खरगोश की हड्डियां चटकाएंगे! नए नियमों पर क्यों भड़कीं गौरी मौलेखी?

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Source :- INDIATV NEWS

नई दिल्ली: पीपल फॉर एनिमल्स की ट्रस्टी और जानी-मानी पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े नए ड्राफ्ट नियमों पर गंभीर चिंता जताई है। इंडिया टीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि नए नियम जानवरों की सुरक्षा के लिए पहले से मौजूद व्यवस्थाओं को कमजोर कर सकते हैं। उनके मुताबिक, लैब को खुद प्रयोगों की मंजूरी देने का अधिकार देना और जानवरों पर होने वाले परीक्षणों की निगरानी कम करना बेहद खतरनाक है। इससे जानवरों की पीड़ा बढ़ सकती है। साथ ही देश की वैज्ञानिक रिसर्च और दवा उद्योग पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है।

लैब को खुद प्रयोग की मंजूरी देने का अधिकार सबसे बड़ा खतरा

गौरी मौलेखी के मुताबिक, नए ड्राफ्ट का सबसे खतरनाक प्रावधान प्रयोगशालाओं को यह अधिकार देना है कि वे खुद तय करें कि किस प्रयोग के लिए सरकारी मंजूरी लेनी है और किसे अपनी आंतरिक समिति से ही मंजूर कराना है। उन्होंने इसे हितों के टकराव का मामला बताया। मौजूदा व्यवस्था में प्रयोग से पहले यह जांच की जाती है कि जानवरों का इस्तेमाल जरूरी है या नहीं, कितने जानवरों की जरूरत होगी और क्या दूसरे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। इसके लिए प्रयोग का पूरा विवरण तैयार किया जाता है, जिसे प्रोटोकॉल कहा जाता है। मौलेखी का कहना है कि अब इस निगरानी को कमजोर किया जा रहा है।

बाजार से जानवर खरीदने की छूट से बढ़ेगी परेशानी

ड्राफ्ट में कहा गया है कि अगर रजिस्टर्ड ब्रीडर्स से जानवर उपलब्ध नहीं होते हैं तो प्रयोगशालाएं कुछ फार्म एनिमल्स, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से खरीद सकती हैं। मौलेखी ने इस प्रावधान पर भी गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि इससे सड़क पर रहने वाले कुत्तों, बंदरों और अन्य जानवरों के साथ-साथ मंडियों से गाय-बैल को भी प्रयोगों के लिए उठाए जाने का खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी समझाया कि अज्ञात जगहों से लाए गए जानवरों की पहले से मौजूद बीमारियां और संक्रमण प्रयोग के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे गलत वैज्ञानिक आंकड़े मिल सकते हैं, जिनके आधार पर बनने वाली दवाएं इंसानों के लिए भी परेशानी पैदा कर सकती हैं।

जंगली जानवरों को पकड़कर प्रयोग करने पर भी चिंता

गौरी मौलेखी के मुताबिक, नए नियमों में जंगली जानवरों को पकड़कर प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल करने की गुंजाइश भी नजर आती है। उन्होंने कहा कि जानवरों को पकड़ने के लिए जंगलों में जाल, फंदे और शिकंजे लगाए जा सकते हैं। इससे वन्यजीवों और उनके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि किसी संकटग्रस्त प्रजाति की सुरक्षा केवल उस जानवर तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके पूरे पर्यावरण और खाद्य श्रृंखला को बचाना भी जरूरी है। ऐसे में जंगली जानवरों को प्रयोगों के लिए पकड़ने की छूट कई कानूनी और व्यावहारिक समस्याएं पैदा कर सकती है।

लैब में आधे जानवरों को मारकर जांचेंगे दवा का असर!

मौलेखी ने दावा किया कि नए नियमों के तहत किसी जानवर पर पांच साल तक बार-बार प्रयोग किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि हड्डियों से जुड़ी दवाओं की जांच के लिए खरगोशों की हड्डियां तोड़ी जाती हैं और फिर अलग-अलग दवाओं से उनके जुड़ने की प्रक्रिया देखी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले बेहोशी की दवा और दर्द कम करने वाली दवाएं देना जरूरी था, लेकिन नए ड्राफ्ट में इससे जुड़े सुरक्षा प्रावधान हटा दिए गए हैं। इसके अलावा, जहरीली दवाओं की जांच में जानवरों को तब तक दवा दी जा सकती है, जब तक आधे जानवरों की मौत न हो जाए। आंखों में जलन की जांच के लिए भी खरगोशों की आंखों में दवाएं डाली जाती हैं।

बंदर को जिंदा रखकर हेलमेट की टेस्टिंग का दिया उदाहरण

इंटरव्यू के दौरान गौरी मौलेखी ने बताया कि हेलमेट की जांच के लिए भी जानवरों पर दर्दनाक प्रयोग किए जाते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बंदर को पूरी तरह होश में रखकर कुर्सी से बांधा जाता है और उसके सिर पर इतना दबाव डाला जाता है कि उसकी खोपड़ी टूट जाए। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि किस स्थिति में उसकी मौत होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस तरह के प्रयोगों में जानवरों के दर्द और डर को समझने की कोशिश की जाती है? मौलेखी ने कहा कि जानवर केवल शारीरिक दर्द ही नहीं, बल्कि डर, तनाव, अकेलापन और अपने परिवार से अलग होने की पीड़ा भी महसूस करते हैं। लंबे समय तक भूखा रखना या छोटे पिंजरे में बंद रखना भी उनके लिए मानसिक तकलीफ का कारण बन सकता है।

लैब की अपनी समिति करेगी दर्द का स्तर तय, निगरानी पर सवाल

ड्राफ्ट में प्रयोगों को हल्के, मध्यम और गंभीर दर्द की श्रेणियों में बांटने की व्यवस्था है। मौलेखी के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रयोगशालाओं की अपनी समितियां ही तय कर सकेंगी कि किसी प्रयोग से कितना दर्द होगा। उन्होंने बताया कि समिति में छह सदस्य होंगे, जिनमें चार संबंधित संस्थान के और दो बाहरी सदस्य होंगे। ऐसे में संस्थान के सदस्यों की संख्या अधिक होने से फैसलों पर उनका प्रभाव रह सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पहले होने वाले अचानक निरीक्षणों की जगह पहले से सूचना देकर निरीक्षण करने की व्यवस्था से गड़बड़ियां छिपाने का मौका मिल सकता है। उनके मुताबिक, इससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर होगी।

भारत बन सकता है दूसरे देशों के मुश्किल प्रयोगों का ठिकाना

गौरी मौलेखी ने आशंका जताई कि नए नियमों से भारत उन विदेशी कंपनियों के लिए आकर्षक जगह बन सकता है, जिन्हें दूसरे देशों में जानवरों पर प्रयोग करने के लिए कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ में 2010 के कानून के तहत हर प्रयोग के लिए यह बताना जरूरी होता है कि जानवरों के बिना परीक्षण क्यों नहीं किया जा सकता और कम जानवरों से काम क्यों नहीं चल सकता। मौलेखी के मुताबिक, भारत को भी जानवरों पर प्रयोग कम करने और एआई, सिमुलेशन तथा दूसरे विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कमजोर नियमों से भारत की दवा और रिसर्च इंडस्ट्री की अंतरराष्ट्रीय साख प्रभावित हो सकती है और देश विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के बजाय पीछे रह सकता है।

गौरी मौलेखी ने लोगों से 5 नवंबर से पहले सुझाव भेजने की अपील की

गौरी मौलेखी ने लोगों से नए ड्राफ्ट पर अपनी राय सरकार तक पहुंचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार ने आम लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं, इसलिए यह अपनी बात रखने का अच्छा मौका है। कानून बनाने से पहले पशु कल्याण कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत, स्वास्थ्य क्षेत्र और नागरिक संगठनों से सलाह लेना जरूरी है। उनके मुताबिक, अगर लोग अपनी आवाज नहीं उठाएंगे तो स्थिति और खराब हो सकती है। उन्होंने कहा कि अंतिम नियम ऐसे होने चाहिए जो देश को आगे ले जाएं, न कि जानवरों की सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रगति दोनों को कमजोर करें। ड्राफ्ट पर सुझाव और आपत्तियां 5 नवंबर से पहले सरकार को भेजी जा सकती हैं।

नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

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SOURCE : INDIATV NEWS