Home rss world hindi अब पासपोर्ट से होगी वोटरों की जांच? ट्रंप प्रशासन ने चुनावी डेटा...

अब पासपोर्ट से होगी वोटरों की जांच? ट्रंप प्रशासन ने चुनावी डेटा को लेकर बनाया नया प्लान

5
0

Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने संसद (कैपिटल हिल) के प्रमुख सांसदों को इस संबंध में एक नोटिस भेजा है, जिसमें पासपोर्ट रिकॉर्ड के सामान्य इस्तेमाल’ की लिस्ट में वोटर एलिजिबिलिटी जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया है।

अमेरिका में मध्यावधि चुनावों से पहले वोटर लिस्ट की निष्पक्षता और फर्जी वोटिंग को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट रिकॉर्ड्स का दायरा बढ़ाने की तैयारी में है, ताकि राज्य और स्थानीय अधिकारी (और संभावित रूप से कुछ गैर-सरकारी संगठन) मतदाताओं की नागरिकता और पात्रता जांच कर सकें।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने संसद (कैपिटल हिल) के प्रमुख सांसदों को इस संबंध में एक नोटिस भेजा है, जिसमें पासपोर्ट रिकॉर्ड के ‘सामान्य इस्तेमाल’ की लिस्ट में “वोटर एलिजिबिलिटी” जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया है।

पासपोर्ट डेटा में क्या खास है और यह क्यों अहम है?

अमेरिकी पासपोर्ट रिकॉर्ड में देश के नागरिकों की बेहद संवेदनशील जानकारी मौजूद होती है- जैसे जन्म स्थान, नागरिकता के सबूत और पहचान से जुड़े दस्तावेज।

क्या है मौजूदा नियम: अब तक पासपोर्ट डेटा का इस्तेमाल सामाजिक सुरक्षा लाभों, नौकरियों के सत्यापन, संपत्ति के निपटारे, कानून व्यवस्था बनाए रखने और आतंकवाद-विरोधी अभियानों के लिए ही होता आया है।

नए प्रस्ताव के तहत अब इस डेटा का उपयोग राज्य और स्थानीय स्तर पर यह जांचने के लिए किया जा सकेगा कि वोटर लिस्ट में दर्ज व्यक्ति वास्तव में अमेरिकी नागरिक है या नहीं।

गैर-सरकारी संस्थाओं को एक्सेस: प्रस्ताव में संकेत दिया गया है कि गैर-सरकारी संस्थाओं को भी यह एक्सेस मिल सकता है, हालांकि नोटिस में यह साफ नहीं है कि किन एनजीओ को यह अनुमति मिलेगी।

कोर्ट में खुला राज, केंद्र बनाम राज्य की जंग तेज

विदेश मंत्रालय के इस गुप्त प्लान का खुलासा खुद अमेरिकी न्याय विभाग ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव से जुड़े कार्यकारी आदेश पर चल रही एक अदालती सुनवाई के दौरान किया।

अमेरिका में चुनाव कराने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों और स्थानीय सरकारों की होती है। डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े संगठनों और नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन केंद्रीय डेटाबेस का मनमाना इस्तेमाल करके चुनाव प्रक्रिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, ट्रंप प्रशासन और उनके समर्थकों का तर्क है कि गैर-नागरिकों को वोटिंग से रोकने और चुनाव में होने वाली धोखाधड़ी को खत्म करने के लिए फेडरल डेटा का मिलान जरूरी है।

इसके अलावा, न्याय विभाग ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से SAVE डेटाबेस का दायरा बढ़ाने की भी मांग की है, ताकि राज्य बड़े पैमाने पर डेटा स्कैन कर सकें। हालांकि, एक निचली अदालत ने प्राइवेसी के कानूनों का हवाला देते हुए इस पर रोक लगा दी थी।

नवंबर मध्यावधि चुनाव पर क्या होगा असर?

कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते इस नए प्रस्ताव के 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले लागू होने की संभावना न के बराबर है।

प्रक्रिया के मुताबिक, विदेश मंत्रालय संसद को सूचित करने के 30 दिन बाद इस प्रस्ताव को आधिकारिक ‘फेडरल रजिस्टर’ में प्रकाशित करेगा।

इसके बाद आम जनता और हितधारकों को सुझाव देने के लिए 30 दिनों का समय दिया जाएगा।

यानी यह नियम चुनाव खत्म होने के बाद ही अमल में आ सकेगा। हालांकि, भविष्य में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति और आम चुनावों में वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को बदलने के लिए इसे बेहद दूरगामी और निर्णायक कदम माना जा रहा है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN