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Abraham Accords: अब्राहम अकॉर्ड्स 15 सितंबर 2020 को अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए किया गया एक ऐतिहासिक समझौता है।

Abraham Accords: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार (25 मई) को अरब और मुस्लिम देशों सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन से दो टूक अपील की कि वे सभी ईरान के साथ संघर्ष खत्म होने के बाद अब्राहम समझौते में शामिल हों, उस पर दस्तखत करें और इजरायल को मान्यता दें। लेकिन पाकिस्तान ने इससे इनकार कर दिया है। दरअसल, ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में कहा कि ईरान के साथ शांति वार्ता में मध्यस्थता कर रहे देशों को अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए, जो इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक एवं सुरक्षा संबंध स्थापित करने से संबंधित है। उन्होंने कहा कि ईरान का इस समझौते पर हस्ताक्षर करना सम्मान की बात होगी।

ट्रंप ने ये भी कहा कि अमेरिका की ओर से इस बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए किए गए सभी प्रयासों के बाद, इन सभी देशों के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे कम से कम अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें। हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर एक-दो देश के पास ऐसा न करने का कोई कारण हो तो इसे स्वीकार किया जा सकता है। बता दें कि अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के मध्यस्थों में शामिल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन पहले ही अब्राहम समझौते पर दस्तखत कर चुके हैं। अब ट्रंप चाहते हैं कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन भी इस समझौते पर दस्तखत कर दे।

क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स?

अब्राहम अकॉर्ड्स 15 सितंबर 2020 को अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए किया गया एक ऐतिहासिक समझौता है। इसका मकसद मध्य-पूर्व में शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना है। सितंबर, 2020 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और इजरायल के बीच अब्राहम एकॉर्ड (Abraham Accord) की मध्यस्थता की थी, जिसमें अरब के खाड़ी देशों और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का वादा किया गया था। इस मूल समझौते पर दस्तखत करने वालों में UAE, बहरीन और इजरायल ही हैं।

नाम के पीछे क्या तर्क?

इस समझौते का नाम यहूदियों, ईसाइयों और अरबों यानी तीनों धर्मों में पूजनीय पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया है, जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व में शांति और सुरक्षा की स्थापना और उसे मजबूत करना है। इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने दस्तखत किए और इजरायल को मान्यता दी। बाद में, मोरक्को और सूडान भी इस अकॉर्ड्स में शामिल हो गए।

समझौते के उद्देश्य और क्षेत्रीय लाभ क्या?

इस समझौते के माध्यम से हस्ताक्षरकर्ता देशों के बीच दूतावास खोलने, सीधी हवाई उड़ानें संचालित करने और राजनयिकों की तैनाती करने की बात कही गई है। इसके अलावा संबंधित देशों के बीच पर्यटन, प्रौद्योगिकी, तकनीकि, सुरक्षा और व्यापार के लिए साझेदारी स्थापित करने पर भी बल दिया गया है।

मुस्लिम देशों पर ट्रंप का दबाव क्यों?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अब्राहम समझौते पर दस्तखत करने के लिए मुस्लिम देशों पर दबाव बना रहे हैं क्योंकि इसके पीछे ईरान युद्ध को खत्म करने की मंशा तो है लेकिन वह पूरे मिडिल-ईस्ट के भू राजनीतिक नक्शे को अपने पक्ष में बदलना चाहते हैं। ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान से शांति वार्ता तभी अंतिम रूप ले सकेगी, जब अरब और मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड्स पर दस्तखत कर इजरायल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करेंगे। इससे एक तरह से ईरान पर अप्रत्यक्ष दबाव बन सकेगा।

ट्रंप का असली मकसद क्या?

दूसरी तरफ ट्रंप इस समझौते की व्यापकता के जरिए अपने ही देश में यानी वॉशिंगटन में यहूदी लॉबी और विरोधी रिपब्लिकन्स का मुंह बंद कराना चाहते हैं। बता दें कि अमेरिका में ही मार्क डुबोविट्स, टेड क्रूज और लिंडसे ग्राहम जैसे प्रभावशाली नेता ईरान के साथ किसी भी कूटनीतिक समझौते के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि ईरान कूटनीति की आड़ में समय बर्बाद कर रहा है। इसके अलावा एक और खास बात यह है कि ट्रंप ईरान के साथ शांति वार्ता को अब्राहम समझौते का विस्तारित रूप मान रहे हैं। वह चाहते हैं कि इसके जरिए वह पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र और मुस्लिम वर्ल्ड में इजरायल को मान्यता दिलाएं, ताकि क्षेत्र में शांति स्थापना हो सके। ट्रंप की नजर शांति दूत बनने पर भी है, साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत और आर्थिक महाशक्ति बनने पर भी ट्रंप की निगाहें हैं।

पाकिस्तान क्यों कर रहा मना?

अब तक अमेरिका के इशारों पर दुम हिलाने वाले पाकिस्तान ने ट्रंप के प्रस्ताव को मानने से साफ इनकार कर दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने दो टूक कहा है कि अब्राहम समझौते पर दस्तखत करने का मतलब इजरायल को मान्यता देना है, जो पाकिस्तान की मूल विचारधारा के खिलाफ है। दरअसल, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इज़रायल के निर्माण का कड़ा विरोध करते हुए इसे “अरब जगत के दिल में खंजर घोंपने” जैसा बताया था। पाकिस्तान टू स्टेट पॉलिसी और स्वतंत्र फिलिस्तीन का समर्थक रहा है। पाकिस्तान आज भी उसी नीति पर कायम है लेकिन वह अमेरिका को खुलकर ना तो मना कर सकता है और कोई सख्त स्टैंड ले सकता है और ना ही वह ट्रंप के कहने पर अब्राहम समझौते पर दस्तखत कर सकता है। इस वजह से पाकिस्तान टेंशन में है।

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