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टूट जाएगा खैबर पख्तूनख्वा? जरदारी-नकवी की सीक्रेट मीटिंग; बैठक से पाकिस्तान में हलचल तेज

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Source :- LIVE HINDUSTAN

पाकिस्तान में सियासी और सुरक्षा संकट एक साथ गहरा गया है। खैबर पख्तूनख्वा में शासन बिगड़ने और कानून-व्यवस्था कमजोर पड़ने के बीच कराची में बड़ी बैठक हुई। गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने बिलवल हाउस पहुंचकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से बंद कमरे में लंबी बातचीत की है।

पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर तनाव में है। खैबर पख्तूनख्वा में शासन-प्रशासन बिगड़ने के कारण हालात तनावपूर्ण हो गया है। कानून-व्यवस्था कमजोर बताई जा रही है और बॉर्डर वाले इलाकों में केंद्र सरकार की पकड़ घटने की बात हो रही है। इसी माहौल में कराची में एक बड़ी बैठक हुई। खबर है कि गृह मंत्री मोहसिन नकवी, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से मिलने बिलवल हाउस पहुंचे। मुलाकात बंद कमरे में हुई। सूत्रों के अनुसार यह साधारण शिष्टाचार की बैठक नहीं थी।

दरअसल, नकवी, सेना और सरकार के बीच सेतु का काम करते हैं। इसलिए उनकी उपस्थिति को काफी अहम माना जा रहा है। बैठक में खैबर पख्तूनख्वा के हालात, कानून-व्यवस्था सुधारने के उपाय, प्रशासनिक बदलाव और सीमा क्षेत्रों में केंद्र की सत्ता फिर से मजबूत करने के संवैधानिक रास्ते पर बात हुई।

चर्चा के केंद्र में क्यों है खैबर पख्तूनख्वा?

खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का वह प्रांत है जो अफगानिस्तान से लगती सीमा पर है। यहां सुरक्षा चुनौतियां पुरानी हैं। केंद्र का आरोप है कि प्रांतीय प्रशासन केंद्र के साथ पूरा सहयोग नहीं कर रहा। पेशावर में केंद्र और प्रांत के अधिकारियों के बीच बार-बार टकराव की खबरें आ रही हैं। इससे आतंकवाद रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा के काम में तालमेल बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। केंद्र के अधिकारियों का कहना है कि अगर प्रांत की संवैधानिक मशीनरी काम करना बंद कर दे, यानी सरकार सामान्य तरीके से कानून नहीं चला पाए, तो केंद्र दखल दे सकता है। इसी वजह से अनुच्छेद 232 और 234 की चर्चा जोरों पर है।

क्या है अनुच्छेद 232 और 234?

दरअसल, अनुच्छेद 232 आपातकाल से जुड़ा है। अनुच्छेद 234 उस स्थिति से जुड़ा है जब किसी प्रांत में संवैधानिक व्यवस्था टूट जाए। तब राष्ट्रपति राज्यपाल शासन लगा सकते हैं। मतलब प्रांतीय सरकार के हाथ से सत्ता लेकर केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल के जरिए शासन चलाना। खबर है कि कराची की बैठक में इन्हीं विकल्पों पर कानूनी चर्चा की गई। केंद्र के कानूनी विशेषज्ञ यह देख रहे हैं कि प्रशासनिक असहयोग और बढ़ती सुरक्षा घटनाएं केंद्र के दखल के लिए पर्याप्त आधार देती हैं या नहीं। हालांकि अभी तक कोई अंतिम आदेश नहीं निकला है। लेकिन इस बैठक से साफ है कि केंद्र खैबर पख्तूनख्वा के हालात को सामान्य मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान रहा है।

कानून-व्यवस्था और सीमाई इलाके

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, बैठक का एक बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था सुधारने पर रहा। सूत्र बताते हैं कि अस्थिर सीमा क्षेत्रों में केंद्र की पकड़ कमजोर पड़ने की शिकायतें आई हैं। ऐसे इलाकों में प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल टूटना खतरनाक माना जा रहा है। इसलिए बात सिर्फ पेशावर की कुर्सियों तक नहीं रही। सीमा के करीब वाले इलाकों में केंद्र की भूमिका कैसे बढ़ाई जाए, यह भी चर्चा में रहा। कहा जा रहा है कि अगर प्रांतीय स्तर पर सहयोग नहीं मिलता, तो केंद्र को संवैधानिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। यही वजह है कि राज्यपाल शासन का विकल्प खुला रखा गया है।

नए प्रांत बनाने की बात भी उठी

अंदरखाने से खबर है कि संकट संभालने के साथ बड़े बदलाव पर भी चर्चा हुई। पुराने प्रशासनिक सुधार और विवादित रास्तों वाले इलाकों में बेहतर शासन के लिए नए प्रांत या नई प्रशासनिक इकाइयां बनाने का प्रस्ताव सामने आया। कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि सीमाएं बदलने से इलाके में अशांति घटेगी और केंद्र की सुरक्षा कार्रवाई आसान होगी। लेकिन संविधान में बदलाव से पहले गठबंधन दलों की सहमति जरूरी है।

आखिरी फैसला कैबिनेट के बाद

इमरजेंसी लगाने या प्रांत के इंतजाम बदलने का अंतिम फैसला संघीय कैबिनेट की बैठक के बाद होगा। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस्लामाबाद लौटने के बाद कई बड़ी बैठकें करेंगे। इनमें कैबिनेट और शीर्ष समिति की बैठक शामिल है। राष्ट्रपति जरदारी, नेता और सेना के शीर्ष अधिकारी एक साथ बैठेंगे। उसके बाद तय होगा कि आगे क्या करना है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN