Source :- LIVE HINDUSTAN

नई रिसर्च में दावा किया गया है कि AI टूल्स पर बढ़ती निर्भरता लोगों की सोच और फैसले लेने की क्षमता को प्रभावित कर रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI पर ज्यादा भरोसा दिमाग की क्षमताओं को कमजोर कर सकता है।

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े ढेरों टूल्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। कोई ईमेल लिखने से लेकर रिपोर्ट तैयार करने और रोज के आसान काम करने तक, AI ना सिर्फ प्रोडक्टिविटी बढ़ा रहे हैं बल्कि हमारा काम आसान भी कर रहे हैं। इसके साथ ही एक और सवाल उठने लगा है कि क्या AI का ज्यादा इस्तेमाल इंसानों को आलसी बना रहा है। नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि AI धीरे-धीरे इंसानों की सोचने समझने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

हाल ही में Microsoft Research और Carnegie Mellon University के रिसर्चर्स की ओर से की गई एक स्टडी ने इस बहस को नई दिशा दी है। इस स्टडी में सैकड़ों नॉलेज वर्कर्स के AI यूजेस का एनालिसिस किया गया है। रिसर्चर्स ने पाया कि जो लोग AI पर ज्यादा भरोसा करते हैं, वे कई मामलों में खुद गहराई से सोचने के बजाय AI की ओर से दिए गए उत्तरों को स्वीकार करने लगते हैं। इससे दिक्कत का इंडिपेंडेंट एनालिसिस करने और लॉजिकल सॉल्यूशन या परिणाम खोजने की आदत कम हो सकती है।

सोचने का तरीका बदल देता है AI

रिसर्च के मुताबिक AI का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि यह सोचने की प्रक्रिया को बदल देता है। पहले किसी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन खोजने के लिए इंसान जानकारी इकट्ठा करता था, अलग-अलग ऑप्शंस पर विचार करता था और फिर सही रिजल्ट तक पहुंचता था। अब कई लोग सीधे AI से आंसर पा कर लेते हैं और उनका काम केवल मिलने वाले उत्तर को थोड़ा बहुत चेक करने तक का रह जाता है। इससे समय तो बचता है, लेकिन दिमाग को चुनौती देने वाले कई बौद्धिक अभ्यास कम हो जाते हैं।

एक्सपर्ट्स इसे ‘कॉग्निटिव ऑफलोडिंग’ कहते हैं। इसका मतलब है कि इंसान अपने दिमाग से किए जाने वाले कुछ काम मशीनों को सौंप देता है और दिमाग उनपर काम करना बंद कर देता है। जैसे- कैलकुलेटर आने के बाद लोग छोटे-मोटे कैल्कुलेशंस कम करने लगे थे, उसी तरह AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लोग राइटिंग, रिसर्च, एनालिसिस और फैसले लेने जैसे कामों में भी मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं। दिक्कत तब पैदा होती है जब यह निर्भरता इतनी बढ़ जाए कि इंसान खुद सोचने की क्षमता का बिल्कुल इस्तेमाल ही ना करे।

यह है रिसर्चर्स की सबसे बड़ी चिंता

रिसर्चर्स को चिंता है कि AI लोगों में एक तरह का ‘क्रिटिकल थिंकिंग गैप’ पैदा कर सकता है। जब कोई व्यक्ति बार-बार AI के तैयार आंसर्स पर निर्भर रहता है, तो वह किसी टॉपिक के अलग-अलग पहलुओं पर विचार करने, तर्कों को समझने और वैकल्पिक दृष्टिकोण खोजने में कम वक्त लगाता है या फिर ऐसा करना ही नहीं चाहता। लंबे समय में यह आदत फैसले लेने की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि सभी एक्सपर्ट्स इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं कि AI इंसानों को ‘कम बुद्धिमान’ बना रहा है। कई रिसर्चर्स का मानना है कि AI एक टूल है, और उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति AI का इस्तेमाल सीखने, नए विचार खोजने और अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए करता है, तो यह उसकी क्षमता को बढ़ा भी सकता है। वहीं अगर यदि AI का इस्तेमाल केवल तैयार जवाब पाने के लिए किया जाए, तो यह सोचने के क्षमता को कमजोर कर सकता है।

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