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गांधीजी की डाइट और आज की इंटरमिटेंट फास्टिंग में क्या कनेक्शन है? जानें

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Source :- LIVE HINDUSTAN

आजकल इंटरमिटेंट फास्टिंग और माइंडफुल ईटिंग जैसे हेल्थ ट्रेंड काफी चर्चा में हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गांधी जी भी खाने और उपवास को लेकर कई तरह की चीजें आजमाते थे?

आजकल फिट रहने के लिए लोग सिर्फ एक्सरसाइज पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी ध्यान दे रहे हैं कि कब खाना है, कितना खाना है और क्या खाना है। इंटरमिटेंट फास्टिंग, माइंडफुल ईटिंग और सिंपल डाइट जैसे ट्रेंड इसी वजह से काफी पॉपुलर हो रहे हैं। लेकिन खाने की आदतों को लेकर इतना सोचना कोई नई बात नहीं है। महात्मा गांधी भी अपने खाने को लेकर काफी सजग रहते थे। उन्होंने अलग-अलग समय पर अपने खाने में बदलाव किए और कई बार उपवास भी रखा। वह यह समझना चाहते थे कि खाने की अलग-अलग आदतों का उनकी रोज की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है। उनके लिए कम खाना या उपवास रखना सिर्फ वजन से जुड़ी बात नहीं थी।

गांधी जी खाने को लेकर इतना ध्यान क्यों देते थे?

गांधी जी के लिए खाना सिर्फ भूख मिटाने की चीज नहीं था। वह इस बात पर ध्यान देते थे कि वह क्या खा रहे हैं और कितना खा रहे हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी में कई तरह की डाइट आजमाई। कभी खाने को बहुत सादा रखा, तो कभी कुछ चीजों को अपनी डाइट से हटा दिया। वह यह भी देखते थे कि किसी खाने के बाद उन्हें कैसा महसूस होता है और उनकी रोज की रूटीन पर इसका क्या असर पड़ता है।

गांधी जी के लिए उपवास का मतलब क्या था?

आज जब हम फास्टिंग की बात करते हैं, तो अक्सर दिमाग में वजन कम करने वाली डाइट आती है। लेकिन गांधी जी के लिए उपवास का मतलब सिर्फ खाना छोड़ना नहीं था। वह कई बार उपवास को अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल रखने और खुद को रोकने की कोशिश से जोड़ते थे।

क्या यह आज की इंटरमिटेंट फास्टिंग जैसा था?

थोड़ी समानता जरूर नजर आती है। आज इंटरमिटेंट फास्टिंग में कुछ घंटे खाने का समय होता है और बाकी समय खाना नहीं खाया जाता। गांधी जी ने भी अलग-अलग समय पर लंबे समय तक खाना छोड़ने और दिन में एक बार खाने जैसे तरीके आजमाए थे। लेकिन दोनों बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं।

आज इंटरमिटेंट फास्टिंग को आमतौर पर खाने के टाइम और वजन या हेल्थ मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाता है। वहीं, गांधी जी के उपवास के पीछे अलग-अलग वजहें होती थीं। इनमें धार्मिक सोच, अपनी आदतों पर कंट्रोल और सामाजिक मुद्दे भी शामिल थे।

आज के हेल्थ ट्रेंड से क्या कनेक्शन है?

गांधी जी की खाने की आदतों को आज की इंटरमिटेंट फास्टिंग या किसी दूसरी डाइट का सबूत नहीं माना जा सकता। लेकिन उनकी सोच में कुछ ऐसी बातें जरूर थीं, जो आज के हेल्थ ट्रेंड से मिलती-जुलती लगती हैं। जैसे खाने पर ध्यान देना, जरूरत से ज्यादा न खाना, सादा खाना पसंद करना और अपनी रोज की आदतों को समझना। आज भी हेल्थ एक्सपर्ट अक्सर खाने को लेकर जागरूक रहने और अपनी जरूरत के हिसाब से डाइट चुनने की बात करते हैं।

क्या हर किसी को फास्टिंग करनी चाहिए?

सिर्फ सोशल मीडिया पर कोई फास्टिंग ट्रेंड कर रहा है, इसलिए उसे शुरू कर देना सही नहीं है। हर व्यक्ति की बॉडी और हेल्थ अलग होती है। डायबिटीज, प्रेग्नेंसी या किसी दूसरी हेल्थ कंडीशन में फास्टिंग शुरू करने से पहले डॉक्टर से बात करना जरूरी है। कुछ लोगों के लिए लंबे समय तक खाना न खाना परेशानी बढ़ा सकता है। इसलिए गांधी जी की जिंदगी से यह सीख लेना ज्यादा जरूरी है कि खाने को लेकर जागरूक रहें, न कि उनके पुराने रूटीन को आज की डाइट की तरह कॉपी करें।

गांधी जी की सोच से आज क्या सीखें?

गांधी जी खाने को लेकर जो सोच रखते थे, उसमें एक बात आज भी काम की लगती है- जो भी खाएं, उसके बारे में थोड़ा सोचें। क्या हमें सच में भूख लगी है या सिर्फ मन कर रहा है? हम जरूरत से ज्यादा तो नहीं खा रहे? हमारी डाइट हमारी रोज की लाइफ के हिसाब से सही है या नहीं? आज के समय में जब सोशल मीडिया पर हर दिन कोई नया हेल्थ ट्रेंड सामने आता है, ऐसे में अपनी बॉडी को समझना और बिना सोचे कोई डाइट फॉलो न करना ज्यादा जरूरी है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN