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‘चुनाव आयोग को स्वतंत्र दिखना भी चाहिए’: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर क्या कुछ हुआ?

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Source :- BBC INDIA

जस्टिस दीपांकर दत्ता

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केंद्रीय चुनाव आयोग और उसके चुनाव आयुक्तों की चर्चा बुधवार को सुर्ख़ियों में रही.

इसकी दो वजहें थीं- पहली अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट, और दूसरी- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट का एक फ़ैसला.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने बीते कुछ महीनों के दौरान कई मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से असहमति जताई थी.

वहीं सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने साल 2023 में लाए गए मोदी सरकार के क़ानून को एक बड़ी बेंच को भेजने को लेकर केंद्र सरकार की याचिका पर बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया.

साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने संसद से क़ानून बनने तक चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक कमिटी का गठन किया था.

इसको लेकर केंद्र की मोदी सरकार ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 बनाया था.

इसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की ओर से नामिक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं.

वर्तमान तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मोदी सरकार के कार्यकाल में 2023 के क़ानून के तहत हुई थी. नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शामिल थे.

मार्च 2024 में जब सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, तब समिति में विपक्ष के सदस्य कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज की थी.

फ़रवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी असहमति दर्ज की थी.

सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या फ़ैसला सुनाया?

2023 में केंद्र सरकार की ओर से लाए गए इसी क़ानून के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं.

केंद्र सरकार की मांग थी कि इन याचिकाओं को एक बड़ी बेंच को भेजा जाए.

इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने बंटा हुआ फ़ैसला दिया.

जस्टिस दीपंकार दत्ता ने जहां केंद्र सरकार की मांग ख़ारिज कर दी वहीं जस्टिस शर्मा का कहना था कि इसमें क़ानून को लेकर अहम सवाल शामिल हैं जिस पर एक बड़ी बेंच को फ़ैसला करना चाहिए.

क़ानूनी मामलों को कवर करने वाली वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक़, बंटी हुई राय को देखते हुए, बेंच ने आदेश दिया कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए ताकि वे विचार कर सकें कि क्या इस मुद्दे पर फ़ैसले लेने के लिए एक संविधान पीठ का गठन किया जाना चाहिए.

चुनाव आयोग

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जस्टिस दीपांकर दत्ता ने क्या कहा?

बार एंड बेंच के मुताबिक़, जस्टिस दत्ता ने कहा, “हमने इन याचिकाओं को पांच दिन से ज़्यादा सुना, एक सुर में बोलने से संस्थागत एकजुटता की आवाज़ को बल मिलता है. बदकिस्मती से, हमारी राय बंटी हुई है. यह संवैधानिक स्कीम का एक बुनियादी सिद्धांत है कि शासक क़ानून से बंधे होते हैं, उससे ऊपर नहीं.”

जस्टिस दत्ता ने कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पूरी तरह से स्वतंत्र केंद्रीय चुनाव आयोग पर निर्भर करते हैं. केंद्रीय चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है, उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए.”

उन्होंने कहा कि चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित किए गए मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो अपने नामित करने वाले (प्रधानमंत्री) की बात न माने, क्योंकि सामूहिक ज़िम्मेदारी का सिद्धांत उन्हें प्रधानमंत्री का विरोध करने से रोकेगा.

जस्टिस दत्ता ने कहा, “यह उम्मीद करना बहुत दूर की कौड़ी है कि कैबिनेट का कोई मंत्री अपने नेता या सरकार से अलग राय रखेगा. कैबिनेट मंत्रियों को शामिल करने से वह स्वतंत्र संतुलन नहीं बन पाता जो एक निष्पक्ष चयनकर्ता बना सकता था.”

क़ानूनी मामलों को कवर करने वाली एक अन्य वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक़, जस्टिस दत्ता ने यह सवाल उठाया कि क्या चयन समिति में कैबिनेट मंत्रियों को शामिल करने से कार्यपालिका के सामने कोई स्वतंत्र संतुलन बन पाता है.

जस्टिस दत्ता ने कहा, “ऐसे हालात में स्वतंत्र संतुलन एक निष्पक्ष चयनकर्ता बना सकता था. कैबिनेट मंत्री तो बस अपने नेता की बात ही दोहराएंगे. नतीजतन, सिलेक्शन कमिटी में विपक्ष के नेता की मौजूदगी का मकसद पूरा नहीं हो पाता और उनकी भूमिका बस दिखावे की रह जाती है.”

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

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जस्टिस शर्मा की क्या थी राय

वहीं जस्टिस दत्ता के उलट जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की राय रही. जस्टिस शर्मा ने कहा कि चूंकि संविधान की व्याख्या से जुड़ा एक अहम सवाल उठा है, इसलिए संविधान के आर्टिकल 145(3) के तहत एक संविधान पीठ को ही इस मामले पर आधिकारिक तौर पर फैसला करना होगा.

भले ही इस बात पर मतभेद था कि मामले की सुनवाई संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए या नहीं, लेकिन दो जजों की बेंच ने आखिरकार निर्देश दिया कि देरी से बचने के लिए मामले को मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए ताकि वे संविधान पीठ का गठन कर सकें.

बेंच ने अपने सर्वसम्मत आदेश में कहा, “दो में से कौन सी राय सही है, इस पर तीन जजों की बेंच का कोई फ़ैसला बहुत काम का नहीं होगा और इससे सिर्फ़ उन अहम मुद्दों पर फ़ैसले में देरी होगी जो उठाए गए हैं.”

इस मामले की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि साल 2023 के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल क़ानूनी कमी को पूरा किया था.

उन्होंने कहा कि एक बार क़ानून बन जाने के बाद, अस्थायी न्यायिक फ़ैसले के बजाय विधायी समझ को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

ज्ञानेश कुमार

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर हंगामा

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने बीते कुछ महीनों के दौरान कई मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से असहमति जताई है.

इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक हंगामा शुरू हो गया और विपक्ष के नेताओं ने सरकार और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के कदमों को लेकर ’10 महीने में 14 बार आपत्ति’ दर्ज कराई.

रिपोर्ट के मुताबिक़, “ये आपत्तियां चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने, खुद को अंधेरे में रखने से लेकर नए मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने को लेकर दर्ज कराईं और ‘अनधिकृत, गैरकानूनी’ कदमों पर सवाल उठाए.”

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया, जून 2025 में बिहार में शुरू हुई थी लेकिन अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं.

हालांकि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं उन्हें इसके ख़िलाफ़ अपील करके अपना जवाब देने का विकल्प दिया गया है. चुनाव आयोग की भूमिका पर विपक्षी दल पहले से सवाल उठाते रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS