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जिस चावल से भरता है पेट, वही बन रहा धरती का सबसे बड़ा दुश्मन; नई रिसर्च ने दुनिया को किया अलर्ट

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Source :- LIVE HINDUSTAN

करोड़ों लोगों का मुख्य भोजन चावल अब खुद पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने खुलासा किया है कि आधुनिक चावल उत्पादन पृथ्वी की जलवायु, मीठे पानी के संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी दबाव डाल रहा है।

दुनिया भर में अरबों लोगों के लिए चावल सिर्फ रोजाना का भोजन नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत और लाखों किसानों की आजीविका का अहम आधार है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के करोड़ों लोग इसे अपना मुख्य आहार मानते हैं। लेकिन एक ताजा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने गंभीर चेतावनी जारी की है कि वर्तमान चावल उत्पादन पद्धतियां पृथ्वी की पर्यावरणीय सहनशक्ति को पार कर चुकी हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि आधुनिक धान की खेती अब ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, मीठे पानी के अत्यधिक दोहन और पोषक तत्व प्रदूषण की सबसे बड़ी वजहों में शामिल हो गई है।

इस अध्ययन का शीर्षक है ‘क्या हम अपने ग्रह को नुकसान पहुंचाए बिना चावल का उत्पादन कर सकते हैं?’ इसमें प्लेनेटरी बाउंड्रीज फ्रेमवर्क का इस्तेमाल किया गया है, जिसे स्टॉकहोम रेजिलिएंस सेंटर के वैज्ञानिकों ने विकसित किया था। इस ढांचे के अनुसार, मानव गतिविधियां पृथ्वी के नौ प्रमुख पर्यावरणीय आयामों को प्रभावित कर रही हैं। चावल उत्पादन इनमें से कई आयामों, खासकर जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास, मीठे पानी का उपयोग और पोषक चक्र पर भारी दबाव डाल रहा है।

चावल पोषण का स्रोत, लेकिन भारी कीमत

वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक, चावल दुनिया की कुल कैलोरी जरूरत का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पूरा करता है। एशिया महाद्वीप में तो यह 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का मुख्य भोजन है। बढ़ती जनसंख्या और बदलते खान-पान की आदतों के कारण चावल की मांग लगातार बढ़ रही है। नतीजतन, बड़े पैमाने पर धान की खेती हो रही है, जिसमें रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और लगातार सिंचाई का भारी इस्तेमाल हो रहा है।

अध्ययन में आगे कहा गया है कि धान की खेती अब पर्यावरण के लिए ‘महंगा सौदा’ बन गई है। खासतौर पर बाढ़ वाले खेतों में लगातार पानी भरने से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे एनारोबिक बैक्टीरिया सक्रिय होते हैं और बड़ी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है। मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से 80 गुना अधिक गर्मी रोकने वाली गैस है, जो अल्पकालिक जलवायु परिवर्तन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।

इसके अलावा, सिंचाई के लिए हर साल अरबों घन मीटर मीठा पानी इस्तेमाल होता है, जो कई इलाकों में भूजल स्तर को तेजी से नीचे ला रहा है। रासायनिक उर्वरकों (नाइट्रोजन और फॉस्फोरस) के अत्यधिक उपयोग से नदियों, झीलों और समुद्र में पोषक तत्वों का रिसाव बढ़ा है, जिसके कारण ‘डेड जोन’ बन रहे हैं, जहां जलीय जीवन लगभग खत्म हो चुका है।

समस्याएं गंभीर, लेकिन समाधान भी मौजूद

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि चावल की खेती बंद करने या उत्पादन घटाने की कोई जरूरत नहीं है। समस्या खेती की पुरानी और गैर-टिकाऊ पद्धतियों में है। उन्होंने कई व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित समाधान सुझाए हैं, जैसे…

वैकल्पिक गीला-सूखा सिंचाई: खेतों को लगातार डूबा न रखकर 3-5 दिन के अंतराल पर गीला और सूखा रखना। इससे मीथेन उत्सर्जन में 30-50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और पानी की खपत भी 15-30 प्रतिशत कम हो जाती है।

  • सटीक उर्वरक प्रबंधन: मिट्टी परीक्षण के आधार पर सही मात्रा और सही समय पर उर्वरक लगाना। इससे नाइट्रोजन रिसाव कम होगा और नदियों-झीलों में प्रदूषण घटेगा।
  • उन्नत बीज और फसल प्रजनन: सूखा-सहिष्णु, कम पानी वाली और अधिक पौष्टिक किस्मों का विकास।
  • सटीक कृषि प्रौद्योगिकी: ड्रोन, सेंसर और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करके पानी, उर्वरक और कीटनाशकों का लक्षित इस्तेमाल।
  • फसल प्रबंधन: चावल के साथ अन्य फसलों का मिश्रण, जैविक खाद का बढ़ाया उपयोग और मिट्टी स्वास्थ्य सुधारने वाले तरीके।

प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम ने क्या कहा?

शोधकर्ताओं में एक प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम, जिन्होंने प्लेनेटरी बाउंड्रीज अवधारणा को आकार दिया, ने कहा है कि ये सीमाएं ‘मानवता के लिए सुरक्षित कार्यक्षेत्र’ हैं। इनके अंदर रहकर ही हम भविष्य की पीढ़ियों को पर्याप्त भोजन और स्वस्थ ग्रह दे सकते हैं। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर चावल उत्पादन की वर्तमान गति और तरीके जारी रहे तो जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना और जैव विविधता बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

भविष्य में क्या हो सकता है?

शोधकर्ताओं का मानना है कि चावल उत्पादन का सतत भविष्य खेतों का विस्तार या रासायनिक इनपुट बढ़ाने में नहीं, बल्कि खेती की पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव लाने में छिपा है। सरकारों, कृषि वैज्ञानिकों, किसानों और नीति-निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा। भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे प्रमुख चावल उत्पादक देशों में इन नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते सही कदम उठाए गए तो चावल न सिर्फ अरबों लोगों को पेट भरने वाला भोजन बना रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक साबित होगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN