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ट्रंप रद्द कर सकते हैं 2026 मिडटर्म इलेक्शन? जानिए क्यों उठ रहा है यह बड़ा सवाल

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Source :- LIVE HINDUSTAN

3 नवंबर को अमेरिकी मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और फैसलों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इसी वजह से सवाल उठ रहे हैं कि क्या ट्रंप इन चुनावों को रद्द या टाल सकते हैं?

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव अब सिर्फ 19 दिन दूर हैं। 3 नवंबर को वोटिंग होनी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस वोट से जुड़ी नेशनल इमरजेंसी लगाने की संभावना खुली रखी है। साथ ही उन्होंने चुनाव नियमों पर केंद्र सरकार का और कंट्रोल बढ़ाने की कोशिशें भी जारी रखी हैं। दरअसल, अक्टूबर में टाइम मैगजीन को दिए इंटरव्यू में ट्रंप से मिडटर्म चुनाव को लेकर नेशनल इमरजेंसी लगाने का सवाल पूछा गया। उन्होंने साफ तौर पर ‘नहीं’ तो नहीं कहा। उनके प्रशासन ने वोटर रजिस्ट्रेशन और मेल-इन बैलट के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इनमें से कई बदलाव अब कोर्ट में फंसे हुए हैं।

क्या ट्रंप चुनाव रद्द या टाल सकते हैं?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप चुनाव रद्द या टाल सकते हैं? इसका सीधा और सरल जवाब है- नहीं। दरअसल, राष्ट्रपति अकेले किसी भी फेडरल चुनाव को रद्द नहीं कर सकते। चुनाव की तारीख कानून से तय होती है। 3 नवंबर की तारीख बदलने के लिए कांग्रेस का कानून चाहिए। सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश से तारीख नहीं टाली जा सकती।

चुनाव अधिकारियों और वोटिंग अधिकार के समर्थकों की असली चिंता दूसरी है। उन्हें डर है कि नियमों में अचानक बदलाव, चुनाव अधिकारियों की फेडरल जांच और बैलट या नतीजों के सर्टिफिकेशन पर विवाद पैदा हो सकते हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में (जिसमें 50 से ज्यादा चुनाव अधिकारियों, विशेषज्ञों और वकीलों से बात की गई) मिडटर्म से पहले नौ संभावित समस्या वाले पॉइंट बताए गए। इनमें फेडरल एजेंटों द्वारा चुनाव रिकॉर्ड जब्त करने से लेकर वोट गिनती और सर्टिफिकेशन को चुनौती देने तक शामिल हैं।

बता दें कि अमेरिका के लिए मिडटर्म चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इन चुनावों से अमेरिकी कांग्रेस का कंट्रोल तय होगा। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटें और सीनेट की 35 सीटें चुनी जाएंगी। यही कारण है कि अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया की इस पर नजर है।

ट्रंप की बातें चिंता क्यों बढ़ा रही?

ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि अमेरिका के चुनाव सिस्टम में धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी हैं। खासकर मेल-इन बैलट और गैर-नागरिकों के वोटिंग को लेकर। उनका प्रशासन कहता है कि ये कदम चुनाव की ईमानदारी के लिए हैं। लेकिन नए नियम लागू करने की कोशिशों से कई कानूनी लड़ाइयां शुरू हो गई हैं। मुद्दा यह है कि चुनाव चलाने का अधिकार आखिर किसके पास है।

सितंबर में एक रैली में ट्रंप ने समर्थकों से कहा था कि वे जीतने के लिए कुछ भी करेंगे। उन्होंने कहा था कि मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मैं रजिस्टर्ड हूं या नहीं, मैं भी उतनी ही कोशिश करूंगा। यह बयान 2020 के चुनाव में हार को पलटने की कोशिशों की जांच के बीच आया। ट्रंप लगातार बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का दावा करते रहे हैं, हालांकि जांच में 2020 के वोट में बड़े हेरफेर के सबूत नहीं मिले। वाइट हाउस का कहना है कि सख्त वोटर पहचान और गैर-नागरिकों को वोट से रोकने के कदम लोगों का भरोसा वापस लाने के लिए जरूरी हैं।

ट्रंप के आदेशों में क्या था?

  • पहला आदेश (25 मार्च 2025): ट्रंप ने ‘अमेरिकी चुनावों की ईमानदारी बनाए रखना’ नाम से आदेश जारी किया। इसमें मेल वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म पर अमेरिकी नागरिकता का सबूत जरूरी करने, वोटर डेटा पर फेडरल पहुंच बढ़ाने और मेल-इन बैलट के नियम सख्त करने की बात थी। राज्यों को भी धमकी दी गई कि अगर वे प्रशासन की बात नहीं मानेंगे तो फंडिंग प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर विरोधियों ने इसे कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना नए चुनाव नियम नहीं बना सकते। कोर्ट ने आदेश के मुख्य हिस्सों पर रोक लगा दी या रद्द कर दिया।

  • दूसरा आदेश (मार्च 2026): ट्रंप फिर से आए। इसमें वेरिफाइड अमेरिकी नागरिकों की फेडरल लिस्ट बनाने और पोस्टल सर्विस से मेल-इन व एब्सेंटी बैलट के लिए नए नियम लाने की बात थी। बैलट पर नए बारकोड और ट्रैकिंग सिस्टम की योजना थी। बैलट सिर्फ उन लोगों को भेजे जाने थे जो राज्य की एलिजिबिलिटी लिस्ट में हों।

चुनाव अधिकारियों ने चेतावनी दी कि नवंबर से पहले इतने बड़े बदलाव सुरक्षित तरीके से लागू करना मुश्किल है। राज्यों ने इसे चुनौती दी। कोर्ट ने जरूरी नियमों पर रोक लगा दी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। बड़े बदलावों पर रोक लगी रही, हालांकि फेडरल चुनाव शक्तियों पर बहस जारी है।

क्या कह रही कोर्ट?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव कैसे चलाए जाएं, यह कौन तय करे। अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने में राज्यों की मुख्य भूमिका होती है। कांग्रेस फेडरल चुनाव के नियम बना सकती है। राष्ट्रपति सिर्फ अपने आदेश से ये अधिकार नहीं छीन सकते। कोर्ट ने बार-बार कहा है कि ट्रंप के निर्देश उनके अधिकार से ज्यादा लग रहे हैं। नागरिकता लिस्ट और मेल-बैलट से जुड़े मुख्य नियमों पर रोक लगाई गई है। इसका मतलब यह नहीं कि केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है। केंद्र मौजूदा कानून लागू कर सकता है और आरोपों की जांच कर सकता है। लेकिन राज्यों पर नए नियम थोपना अलग बात है, खासकर जब इससे वोटरों का रजिस्टर या वोट डालने का तरीका बदल जाए।

नेशनल इमरजेंसी से कुछ बदल सकता है?

ट्रंप ने मिडटर्म से जुड़ी इमरजेंसी लगाने से मना नहीं किया है। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इमरजेंसी लगाने से उन्हें अपने आप चुनाव अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। ज्यादातर चुनाव राज्यों द्वारा मैनेज होते हैं। फिर भी, ऐसा कदम भ्रम और कानूनी उलझनें पैदा कर सकता है। इससे करीबी मुकाबलों के नतीजे या सर्टिफिकेशन में देरी हो सकती है।

आगे क्या होगा?

इन कयासों के बीच एक बात तो साफ है कि मिडटर्म चुनाव 3 नवंबर को ही होंगे। राष्ट्रपति ट्रंप अकेले चुनाव रद्द या टाल नहीं सकते। फिलहाल कानूनी और सियासी लड़ाई इस बात पर है कि चुनाव कैसे होंगे और राष्ट्रपति की शक्ति पर लगने वाले सुरक्षा उपाय चुनाव के दिन तक लागू रहेंगे या नहीं, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, फिलहाल सबकी नजर अब ट्रंप के अगले कदम पर है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN