Home मनोरंजन समाचार देवदास…एक ऐसा किरदार जिसके दुख को ऑडियंस को अपना बना लिया, 16...

देवदास…एक ऐसा किरदार जिसके दुख को ऑडियंस को अपना बना लिया, 16 साल तक डरता रहा था लेखक, बनीं 14 फिल्में

2
0

Source :- LIVE HINDUSTAN

https://www.livehindustan.com/lh-img/smart/img/2026/06/20/1200x900/ddsyd_1781977025032_1781977030875_cf4a7536-a306-4011-8760-91c921600161.jpg

इंडियन सिनेमा का एक ऐसा किरदार जिस के दर्द को लोगों ने अपना समझा। एक ऐसा किरदार जो प्यार करता है, शराब पीता है और मर जाता है। वो किरदार अपनी दुखद जिंदगी के लिए हमेशा के लिए अमर हो गया।

हिंदी फिल्मों में एक ऐसा किरदार रचा गया जिसपर कई फिल्में बनीं।उस किरदार को अलग तरह से पेश किया गया, लेकिन उसके जीवन का दुख कभी खत्म नहीं हुआ। एक ऐसा किरदार जिसे जीते जी तो किसी का साथ नहीं मिला, लेकिन मरने के बाद वो किरदार अमर हो गया। हम फिल्मों के जिस किरदार की बात कर रहे हैं उसका नाम है देवदास है। देवदास का पन्नों पर जन्म साल 1901 में हो चुका था। लेकिन इस लिखने वाले उपन्यासकार ने इस किरदार को लिखकर छोड़ दिया। इस किरदार को लेखक की असली जिंदगी मानी गई। इसलिए लिखने वाले को डर था कि कहीं उसका ये दुखद किरदार किसी को पसंद नहीं आया तो क्या होगा। लेकिन फिर 16 साल बाद उस उपन्यासकार ने हिम्मत की और 1917 में अपने लिखे इस किरदार की कहानी को छाप दिया। जिसने इस किरदार को जन्म दिया था वो थे शरत चंद्र चट्टोपाध्याय।

देवदास जिसने दुनिया को रुलाया

24-25 साल की उम्र में जब लोग सपने देखते हैं, जीवन जीते हैं। उस उम्र में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय जिंदगी के एक दर्द भरे किरदार की कहानी गढ़ रहे थे। कहा जाता है देवदास की ये कहानी उनके अपने जीवन पर बेस्ड थी। उनकी कहानी का हीरो दुख से भरा हुआ है। वो पारो से प्यार करता है, फिर शराब का सहारा लेता और फिर मर जाता है। उन्हें इसी बात का डर था कि उनका ये हीरो दूसरों के लिए प्रेरणा नहीं बन पा रहा है। इसी डर की वजह से ये किरदार 16 साल तक बंद रहा। बाद में इस पर बंगाली उपन्यास बना जिसने इतिहास रच दिया।

दिलीप कुमार से लेकर शाहरुख खान ने निभाया देवदास का किरदार

जब ये कहानी छपी तो देवदास का दर्द लोगों को अपना लगने लगा था। उस किरदार से हमदर्दी होने लगी, उसका दर्द समझ आने वाला। इस किरदार पर सबसे पह्के 1928 में एक साइलेंट फिल्म बनी। 1936 में KL सहगल ने देवदास पर बनी फिल्म में अपनी आवाज दी जैसे उपन्यास का ये किरदार जीवित हो उठा। 1955 में दिलीप कुमार ने देवदास बनकर उस किरदार कोएक ऐसा चेहरा दे दिया जिसके दर्द को ऑडियंस ने अपना दर्द समझ लिया। दिलीप कुमार देवदास बन स्क्रीन पर किरदार के जीवन की वो उदासी ले आए जैसे ये किरदार कोई उपज नहीं बल्कि जीत जागता इंसान हो। बाद में साल 2002 में यही किरदार शाहरुख खान ने संजय लीला भंसाली की फिल्म में निभाया था। फिल्म के अंतिम सीन ने ऑडियंस को रुला दिया।साल 2009 में अनुराग कश्यप ने देवदास को देव डी बना दिया।

14 फिल्में बनीं हैं

देवदास हिंदी सिनेमा का एक ऐसा किरदार बन गया जिसे अभी तक 14 से ज्यादा बार अलग कहानियों और भाषाओं की फिल्मों में दिखाया जा चुका है। देवदास को जन्म देने वाले शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने दुनियाभर में अपनी लेखनी के लिए अलग पहचान बनाई। उनका लिखा ये किरदार हमेशा के लिए अमर हो गया।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN