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जिन युवा वोटर्स के दम पर बालेन शाह नेपाल के पीएम बने, वही छात्र संगठन अब उनके इस्तीफे पर अड़ गए हैं। देश में कई जगह उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए हैं। 10 छात्र संगठनों ने पीएम के बयान को राष्ट्रविरोधी बताया है।

Nepal PM Balen Shah: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के एक बयान से देश में भूचाल आ गया है। जिस जेन Z ने बालेन को सत्ता के अर्श तक पहुंचाया, अब वही उनके इस्तीफे की मांग कर रही है। नेपाल में कई जगहों पर उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। जानकारी के मुताबिक कई छात्र संगठनों ने अपने ही PM के बयान को राष्ट्रविरोधी बताया है। छात्रों ने काठमांडू में मशाल जुलूस भी निकाला है। लेकिन ऐसा हुआ क्या जिससे पिछले साल देश में हुए हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद युवाओं की पसंद बनकर उभरे बालेन को छात्रों का इतना हिस्सा झेलना पड़ रहा है?

इस विवाद को समझने के लिए पहले नेपाल के युवाओं को समझना होगा। नेपाल में पिछले साल हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए। पारंपरिक राजनीतिक दलों, भ्रष्टाचार और अस्थिरता से तंग आ चुके युवाओं और जेन-जी वोटर्स ने एक बड़ा आंदोलन खड़ा करके बालेन शाह को अपने लीडर के रूप में चुना। बालेन शाह को पारंपरिक राजनीति से हटकर एक नए ‘सिस्टम रिफॉर्मर’ के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि अब बालेन सरकार युवाओं को ही नजरअंदाज कर रही है। देश के कई छात्र इस कदर नाराज हैं कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस्तीफा मांग लिया है।

भारत पर एक बयान से फूट पड़ा गुस्सा

बालेन शाह के खिलाफ फूटे गुस्से की ताजा वजह संसद में दिया गया उनका एक बयान है। बालेन शाह ने हाल ही में भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चल रहे कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा सीमा को लेकर एक बयान दिया। बालेन शाह ने अपने भाषण में कहा कि जिस तरह भारत ने नेपाल की जमीन कब्जाई है, उसी तरह नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है। इसके साथ ही उन्होंने इस विवाद को सुलझाने के लिए ब्रिटेन और चीन जैसे देशों से मदद लेने की बात भी कह डाली। फिर क्या था नेपाल का राष्ट्रवादी खेमा भड़क उठा।

बालेन शाह के इस बयान को उनके देश में नेपाल के पारंपरिक क्षेत्रीय दावों को कमजोर करने वाला माना जा रहा है। विपक्ष ने संसद ठप कर दी है। वहीं बड़े छात्र संगठनों के गठबंधन ने एक संयुक्त बयान जारी कर प्रधानमंत्री को सीधे अल्टीमेटम दे दिया। छात्र संगठनों का कहना है कि यह केवल जुबान फिसलने का मामला नहीं है, बल्कि नेपाल के राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता के खिलाफ है। छात्रों ने काठमांडू की सड़कों पर बालेन शाह के खिलाफ जमकर नारेबाजी की, मशाल जुलूस निकाले और मांग की कि पीएम तुरंत अपने बयान को वापस लें, नेपाली जनता से माफी मांगें या अपने पद से इस्तीफा दें। ऐसा न करने पर देश भर में प्रदर्शन की चेतावनी भी दी गई है।

पहले से भी सुलग रही नाराजगी

यह पहली वजह नहीं है जिससे युवा मौजूदा PM से नाराज हैं। इस साल की शुरुआत में बालेन शाह सरकार ने अपने ‘सुधारवादी एजेंडे’ के तहत देश के शैक्षणिक संस्थानों से छात्र राजनीति और छात्र संगठनों को सीमित करने का आदेश जारी कर दिया था। सरकार के इस फैसले का छात्रों ने कड़ा विरोध किया और मामला अदालत पहुंच गया। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी, जिससे बालेन शाह की काफी किरकिरी हुई थी। तब से छात्र संगठन मौके की तलाश में थे। अब पीएम के सीमा विवाद वाले बयान ने जलती आग में घी का काम कर दिया है।

भारत ने भी दिया करारा जवाब

नेपाली PM के बयान पर भारत ने भी करारा जवाब दिया है। भारत ने बीते मंगलवार को नेपाल के साथ सीमा विवाद के समाधान में किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि दोनों पक्षों को सीमा मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाना चाहिए बता दें कि नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना सीमा विवाद है। भारत ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं।

जायसवाल ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा, ”सीमा से जुड़े सभी मुद्दों के समाधान के लिए भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है। सभी संबंधित पक्षों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच के द्विपक्षीय मामले में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, ”भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित हो चुका है, लेकिन कुछ हिस्से अभी भी अनसुलझे हैं। गंडक नदी के मार्ग में बदलाव के कारण यह स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अलावा, सीमा के कुछ चिह्नित क्षेत्रों में ‘नो-मैन्स लैंड’ पर अतिक्रमण और सीमा पार कब्जे के कुछ मामले सामने आए हैं। दोनों देश इसे सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

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