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पहले फिल्मों में सोचे गए थे ये आविष्कार, बाद में वैज्ञानिकों ने हकीकत में किया ईजाद

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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आज हमारी दुनिया में ऐसे कई आविष्कार मौजूद हैं, जिन्हें पहले फिल्मों में सोचा गया था। बाद में वैज्ञानिकों ने इन्हें हकीकत का रूप दिया।

पहले फिल्मों में सोचे गए थे ये आविष्कार, बाद में वैज्ञानिकों ने बना दिया हकीकत।

ऐसे दर्जनों आविष्कार आज मौजूद हैं, जिन्हें असल जिंदगी में किए जाने से पहले फिल्मों में सोचा गया था। कल्पना की उड़ान कितनी ऊंची हो सकती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि ये इनवेंशन पहले फिल्ममेकर्स के द्वारा सोचे गए थे। सिनेमा के लेखकों और निर्देशकों की कल्पना ने कई बार भविष्य की सटीक भविष्यवाणी की है। बाद में फिल्मों में सोचे और दिखाए गए इन आविष्कारों पर वैज्ञानिकों ने काम किया, और आज शायद ही किसी को याद हो, कि इन्हें पहले पर्दे पर सोचा गया था।

स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच

साल 1996 में आई ‘स्टार ट्रेक: द ओरिजिनल सीरीज’ और 1946 में आई ‘डिक ट्रेसी’ में वैज्ञानिक ‘कम्यूनिकेटर’ नाम के एक डिवाइस का इस्तेमाल करते थे। इसमें दिखाया गया था कि इस डिवाइस के जरिए एक फ्लैप खोलकर बात की जाती थी। यह बिल्कुल बाद में आने वाले मोटोरोला के ‘फ्लिप फोन’ जैसा दिखता था। वहीं फिल्मों में डिक ट्रेसी नाम का कैरेक्टर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी से वीडियो कॉल करता था। आपको जानकर हैरानी होगी कि पहला फोन 1983 में आया और स्मार्टवॉच 2010 के दशक में लोकप्रिय हुईं।

सेल्फ ड्राइविंग कार

साल 1990 में आई फिल्म ‘टोटल रिकॉल’ में ‘जॉनी कैब’ नाम की एक टैक्सी दिखाई गई थी। इस गाड़ी में कोई ड्राइवर नहीं होता था। इसे एक रोबोटिक ड्राइवर चलाता था और यात्री सिर्फ अपनी मंजिल का नाम बताते थे। आज ‘टेस्ला’ और ‘गूगल’ जैसी कंपनियां फुली ऑटोमैटिक और सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियों का सफल ट्रायल कर चुके हैं और इन्हें कमर्शियली इस्तेमाल भी कर रहे हैं।

वीडियो कॉलिंग

आज इंस्टाग्राम से लेकर व्हाट्सएप तक दर्जनों एप्लिकेशन्स वीडियो कॉलिंग का फीचर दे रही हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी शुरुआत सिर्फ एक कल्पना के तौर पर हुआ था। साल 1927 में आई फिल्म ‘मेट्रोपोलिस’ और 1982 में आई ‘ब्लेड रनर’ में यह कॉन्सेप्ट पहली बार सोचा गया। आज स्काइप, जूम, WhatsApp और फेस टाइम के जरिए वीडियो कॉलिंग हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।

VR और AR ग्लास

साल 1989 में आई फिल्म ‘बैक टू फ्यूचर पार्ट-2’ में दिखाया गया था कि फ्यूचर में बच्चे डाइनिंग टेबल पर बैठकर चश्मे जैसी एक स्क्रीन पहनते हैं, जिससे वो टीवी देखते हैं और फोन कॉल रिसीव करते हैं। आज हमारे पास Apple Vision Pro, Google Glass और Meta Quest जैसे वर्चुअल रियलिटी और ऑगमेंटेड रियलिटी हेडसेट्स मौजूद हैं। इनके जरिए बिलकुल यही अनुभव मिलता है।

टैबलेट कंप्यूटर और आईपैड

साल 1968 में ‘2001: ए स्पेस ओडिसी’ नाम की फिल्म आई थी और इसमें पहली बार अंतरिक्ष यात्रियों को खाना खाते वक्त एक पतली, फ्लैट इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन पर खबरें देखते दिखाया गया। जिसे फिल्म में ‘न्यूजपैड’ कहा गया था। बाद में टैबलेट और टच स्क्रीन के अलग-अलग मीडियम्स में हमने ईजाद होते दिखा। जब एप्पल ने अपना पहला iPad लॉन्च किया, तो वह दिखने और काम करने में बिल्कुल इसी न्यूजपैड जैसा था।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN