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दो साल के सुस्त प्रदर्शन के बाद विश्लेषकों और बाज़ार विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि 2026 भारतीय शेयर बाज़ार में वापसी का साल होगा.
भारत का शेयर बाज़ार कभी तेज़ी से बढ़ रहा था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निवेशकों का भरोसा कम होता दिख रहा है. भारत का शेयर बाज़ार इस साल एशिया के दूसरे बाज़ारों से पिछड़ गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी एक बड़ी वजह यह है कि एआई में निवेश के अवसर तलाश रहे निवेशक भारत में ऐसी कंपनियों की कमी से निराश हैं.
सिक्योरिटीज़ डिपॉज़िटरी एनएसडीएल के अनुसार, इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 26.4 अरब डॉलर से ज़्यादा की निकासी की है. इसके चलते इसी साल मई महीने में स्टॉक मार्केट वैल्युएशन के लिहाज़ से भारत वैश्विक स्तर पर पांचवें स्थान से गिरकर सातवें स्थान पर आ गया था.
लेकिन चीज़ें यहीं तक स्थिर नहीं रहीं. अब बैंक ऑफ़ अमेरिका के फ़ंड मैनेजरों के सर्वे में भारत इंडोनेशिया से भी पिछड़ गया है. भारत अब इंडोनेशिया से भी ज़्यादा एशिया का सबसे कम पसंदीदा शेयर बाज़ार बन गया है.
यह ऐसे समय में हुआ है, जब भारतीय शेयर बाज़ार इस साल दुनिया के सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले बाज़ारों में शामिल है और निवेशकों की चिंता बढ़ रही है.
सर्वे के मुताबिक़, भारतीय शेयरों को लेकर सबसे बड़ी चिंता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ी अच्छी कंपनियों का अभाव है. इसके बाद कमज़ोर आर्थिक वृद्धि सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है.
सर्वे में शामिल 32% फ़ंड मैनेजरों ने भारतीय शेयर बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी घटाने का रुख़ जताया है. इसके अलावा सुधारों की कमी और शेयरों की ऊंची क़ीमत भी निवेशकों के नकारात्मक रुख़ की प्रमुख वजहों में शामिल हैं.
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इंडोनेशिया भारत की तुलना में ज़्यादा पसंदीदा
इसके उलट, इंडोनेशिया को लेकर निवेशकों का रुख़ सुधरा है. जुलाई में जहाँ 32% फ़ंड मैनेजर इंडोनेशियाई बाज़ार में हिस्सेदारी कम करने की बात कर रहे थे, वहीं अगस्त में यह आंकड़ा घटकर 27% रह गया.
ताइवान और जापान अब भी निवेशकों के सबसे पसंदीदा बाज़ार बने हुए हैं. सात से 13 अगस्त के बीच हुए इस सर्वे में 272 अरब डॉलर की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले कुल 98 फ़ंड मैनेजरों ने हिस्सा लिया.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”सर्वे के नतीजे पिछले दो हफ़्तों में भारतीय शेयरों में आई गिरावट से भी मेल खाते हैं. यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब कंपनियों की कमाई के अनुमान में सुधार हुआ है. इससे संकेत मिलता है कि मज़बूत होते फंडामेंटल्स के बावजूद निवेशक भारतीय बाज़ार को लेकर सतर्क हैं.”
ब्लूमबर्ग के आँकड़ों के अनुसार, पहली छमाही में रिकॉर्ड निकासी के बाद इस तिमाही में वैश्विक फ़ंडों ने भारतीय शेयरों में चार अरब डॉलर से अधिक निवेश किया है, जो क्षेत्र के उभरते बाज़ारों में सबसे ज़्यादा है. एनएसई निफ़्टी 50 में शामिल कंपनियों की कमाई हाल के तीन महीने की अवधि में पिछले साल की तुलना में 18% बढ़ी जबकि मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज का अनुमान 10% वृद्धि का था.
बैंक ऑफ अमेरिका के सर्वे में भारतीय शेयर बाज़ार को आख़िरी बार मई में सबसे कम पसंदीदा बाज़ार बताया गया था. उस समय अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद वैश्विक कच्चे तेल की क़ीमतों में तेज़ी से भारत की आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ा था. संघर्ष के समाधान के कोई संकेत नहीं मिलने के कारण ऊर्जा की क़ीमतें एक बार फिर बढ़ रही हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा प्रभावित हो रहा है.
हालांकि निफ़्टी 50 मार्च के हालिया निचले स्तर से आठ फ़ीसदी चढ़ चुका है लेकिन इस साल यह अब भी एशिया के प्रमुख शेयर बाज़ारों में दूसरा सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाला बाज़ार है.
साल की शुरुआत से इसमें करीब आठ फ़ीसदी की गिरावट आई है. इसके साथ ही भारतीय बाज़ार के लगातार 10 साल की वार्षिक बढ़त के ऐतिहासिक सिलसिले के टूटने की संभावना भी बढ़ गई है.
दूसरी ओर, इंडोनेशिया को लेकर बेहतर होते निवेशक सेंटीमेंट की वजह उसके जकार्ता कंपोज़िट इंडेक्स में जून के निचले स्तर से 20% से अधिक की तेज़ी है.
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एआई की रेस में पिछड़ रहा है भारत
क्वांटम एडवाइज़र्स इंडिया के चीफ़ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटिजिस्ट अरविंद चारी ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से जून में कहा था, “वैश्विक निवेशक थीम के आधार पर निवेश करते हैं. अगर आप एआई को एक निवेश थीम के तौर पर खेलना चाहते हैं, तो भारत में ऐसा करने के लिए वास्तव में कुछ है ही नहीं.”
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ”विदेशी निवेशकों ने इस साल की शुरुआत से भारत के विशाल आईटी सर्विसेज़ सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी एक-तिहाई से अधिक घटा दी है. यह इस बात का संकेत है कि निवेशक इस चिंता को लेकर सतर्क हैं कि एआई उस इंडस्ट्री को किस तरह प्रभावित कर सकता है, जो भारत में सबसे बड़ा व्हाइट-कॉलर रोज़गार देने वाला सेक्टर है.”
”भारत की चैटजीपीटी या क्लाउड जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल्स में कोई बड़ी मौजूदगी नहीं है और देश में चिप निर्माण की भी कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है. इसके अलावा, भारत अपनी क़रीब 90 प्रतिशत ऊर्जा का आयात करता है.”
मॉर्गन स्टैनली के विश्लेषकों ने जून में लिखा था कि भारत में “एआई से सीधे जुड़े कोई बड़े निवेश का अवसर नहीं होना” शेयर बाज़ार के लिए लगातार बनी हुई सबसे बड़ी चुनौती है. इसके अलावा, एआई के कारण भारतीय सर्विसेज़ एक्सपोर्ट पर संभावित असर स्थिति को और मुश्किल बना रहा है.”
एनएसडीएल के आँकड़ों के अनुसार, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (टीसीएस), इंफ़ोसिस जैसी बड़ी कंपनियों वाले भारतीय आईटी सेक्टर में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 2026 की शुरुआत के 60 अरब डॉलर से घटकर 15 मई तक 38 अरब डॉलर रह गई है, यानी 36% से ज़्यादा की गिरावट. इसकी तुलना में, इसी अवधि में भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी निवेशकों की कुल हिस्सेदारी 15% घटकर 701 अरब डॉलर रह गई.
भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने पर गर्व है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने का लक्ष्य रखा है.
लेकिन दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश में युवा अवसरों की कमी से जूझ रहे हैं. पिछले महीने बड़ी संख्या में युवाओं ने सड़कों पर उतरकर अपना असंतोष ज़ाहिर किया था.
जेन ज़ी के इन प्रदर्शनों की शुरुआत पेपर लीक के एक मामले को लेकर ग़ुस्से से हुई थी. लेकिन कुछ ही हफ़्तों में यह आंदोलन व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति बन गया था. युवाओं को लगता है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व उनकी चिंताओं और आकांक्षाओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है.

समस्या गंभीर है. भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है. अनुमान के मुताबिक़, 15 से 29 साल की उम्र के क़रीब 37 करोड़ युवा देश में हैं.
पहले की तुलना में अब ज़्यादा युवा पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन इनमें से कई को यह अहसास हो रहा है कि मुश्किल से हासिल की गई और अक्सर महंगी डिग्री भी अच्छी नौकरी की कोई गारंटी नहीं देती.
20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने भी लिखा था कि भारत टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ रहा है.
सुब्बाराव ने लिखा था, ”विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर मौक़ों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर दूसरे बाज़ारों की ओर बढ़ गए. वैश्विक स्तर पर पूँजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपये पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.”
सुब्बाराव ने लिखा था, ”भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आस-पास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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