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महिलाओं को पुरुषों की तुलना में माइग्रेन के दौरे ज़्यादा क्यों पड़ते हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है?

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Source :- BBC INDIA

माइग्रेन

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अंधेरे कमरे में लेटे रहना, माथे में ऐसा तेज़ दर्द जैसे कि कोई ड्रिल कर रहा हो… माइग्रेन से जूझने वाले कई लोगों के लिए ये बहुत ही तकलीफ़देह और जानी-पहचानी स्थिति है.

यह परेशान करने वाली बीमारी रिश्तों, नौकरी और मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा असर डाल सकती है.

इसका असर ख़ास तौर पर महिलाओं पर पड़ता है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं में माइग्रेन के दौरे पड़ने की आशंका तीन गुना ज़्यादा होती है.

लेकिन माइग्रेन क्यों होता है और इसे कैसे मैनेज किया जा सकता है?

माइग्रेन के लक्षण क्या हैं?

ब्रिटेन की माइग्रेन ट्रस्ट नाम की संस्था के मुताबिक़, दुनियाभर में लगभग हर सात में से एक व्यक्ति माइग्रेन से प्रभावित है. यानी एक अरब से ज़्यादा लोग.

यह एक आनुवंशिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें दिमाग़ बदलावों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है.

ब्रिटेन की संस्था नेशनल माइग्रेन सेंटर की माइग्रेन विशेषज्ञ डॉ. कैटी मुनरो कहती हैं कि कुछ लोगों में माइग्रेन से जुड़े जीन मौजूद होते हैं, लेकिन वे कभी सक्रिय नहीं होते और ऐसे लोग “ज़िंदगी आराम से गुज़ार देते हैं.”

लेकिन कुछ दूसरे लोगों में अलग-अलग बाहरी कारण दिमाग़ में कुछ ख़ास पाथवे एक्टिव कर सकते हैं. इससे न्यूरोकेमिकल्स निकलते हैं, जो माइग्रेन के लक्षण पैदा करते हैं.

इनमें सिरदर्द के साथ-साथ उल्टी, चक्कर और दिमाग़ी धुंधलापन यानी ब्रेन फ़ॉग भी शामिल हो सकते हैं.

माइग्रेन पर ‘हेड्स अप’ नाम का पॉडकास्ट चलाने वाली डॉ. मुनरो कहती हैं, “कभी-कभी लोगों में लक्षणों का एक समूह होता है और अगली बार कुछ अलग हो सकता है. यह परिवार के अलग-अलग सदस्यों में अलग हो सकता है और निश्चित रूप से पूरी ज़िंदगी के दौरान भी बदल सकता है.”

माइग्रेन के दौरे किस वजह से पड़ते हैं?

माइग्रेन के लक्षणों में सिरदर्द, उल्टी, चक्कर आना और सोचने-समझने की क्षमता में कमी शामिल हो सकते हैं

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इस बात की संभावना कम है कि सिर्फ़ एक चीज़ ही माइग्रेन के दौरे को शुरू करे. छोटे-छोटे कारण मिलकर असर डाल सकते हैं और आख़िरकार माइग्रेन से जूझ रहे व्यक्ति की सहनशीलता की सीमा पार हो जाती है. इनमें हॉर्मोन में बदलाव, ब्लड शुगर का अनियमित होना और कम या लंबे समय तक सोना शामिल हो सकते हैं.

तनाव की इसमें बड़ी भूमिका होती है. लेकिन तनाव भरे समय के बाद आने वाला शांति का दौर भी माइग्रेन के दौरे को शुरू कर सकता है.

डॉ. मुनरो कहती हैं कि महिलाओं में ऐसा ख़ास तौर पर होता है. वह कहती हैं, “अक्सर हम ही वे लोग होते हैं जो बहुत सारे काम एक साथ संभाल रहे होते हैं, सब कुछ व्यवस्थित रख रहे होते हैं और परिवार के सभी लोगों की दिनचर्या का हिसाब रखते हैं.”

मौसम में बदलाव, जैसे तापमान, वायुमंडलीय दबाव और नमी में बदलाव, भी माइग्रेन के दौरे को शुरू कर सकते हैं. ऐसा या तो शरीर पर मौसम में बदलाव के सीधे असर से हो सकता है, जैसे हवा के दबाव में बदलाव, या उससे जुड़े प्रभावों से, जैसे शरीर में पानी की कमी होना.

कम आयरन का स्तर, सीलिएक बीमारी या थायरॉयड का कम सक्रिय होना जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी माइग्रेन को बढ़ा सकती हैं.

हॉर्मोन का कितना असर होता है?

लगभग 10 फ़ीसदी बच्चों को माइग्रेन होता है और इसका असर लड़कों और लड़कियों पर बराबर होता है. लेकिन यौवनावस्था में पहुंचने पर यह सब बदल जाता है, जब लड़कियों में मेनस्ट्रुएल साइकल शुरू होता है.

डॉ. मुनरो कहती हैं, “यही एक वजह है कि इसके बाद लड़कियों में माइग्रेन के मामले बढ़ जाते हैं और पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाओं को माइग्रेन के दौरे पड़ते हैं. और यह स्थिति पूरी ज़िंदगी, मेनोपॉज़ तक, बनी रहती है.”

हॉर्मोन में उतार-चढ़ाव माइग्रेन का एक बड़ा कारण है. और महिलाओं में मेनस्ट्रुएल साइकल शुरू होने से ठीक पहले एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट की वजह से इस समय माइग्रेन के दौरे ख़ास तौर पर परेशान करने वाले हो सकते हैं.

पेरिमेनोपॉज़ के दौरान हॉर्मोन के स्तर में तेज़ बदलाव भी माइग्रेन को और बढ़ा सकते हैं. पेरिमेनोपॉज़, किसी महिला के पीरियड्स पूरी तरह बंद होने से पहले का दौर होता है.

वह कहती हैं, “हॉर्मोन पूरी तरह अस्थिर हो जाते हैं. पेरिमेनोपॉज़ में माइग्रेन बहुत बड़ी समस्या है और बहुत-सी महिलाओं के लिए यह एक बड़ा मुद्दा है.”

लेकिन यह सिर्फ़ हॉर्मोन की बात नहीं है. वह कहती हैं, “हो सकता है कि आप किशोर बच्चों और बुज़ुर्ग माता-पिता, दोनों की ज़िम्मेदारियां संभाल रही हों और यह भी हो सकता है कि मेनोपॉज़ के लक्षणों की वजह से आपकी नींद ठीक से नहीं हो रही हो.”

मेनोपॉज़ के बाद माइग्रेन के दौरे कम गंभीर और कम बार पड़ सकते हैं, क्योंकि हॉर्मोन का स्तर ज़्यादा स्थिर हो जाता है.

कैसे पता चलेगा कि आपको माइग्रेन का दौरा पड़ रहा है?

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माइग्रेन चार फेज़ेस में होता है. पहला फेज़ प्रोड्रोमल या शुरुआती चेतावनी का दौर होता है. इस दौरान दिमाग़ में बदलाव धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं. कुछ लोगों में जम्हाई लेना, बहुत ज़्यादा थकान या गर्दन में दर्द जैसे चेतावनी वाले लक्षण दिखाई देते हैं.

अगला फेज़ ऑरा होता है, जो एक घंटे तक रह सकता है. इसमें आम तौर पर ज़िगज़ैग जैसी इमेजेस या सफ़ेद धब्बे दिखाई देने जैसी देखने से जुड़ी परेशानियां होती हैं. इसका असर लगभग एक-तिहाई मरीजों पर होता है.

इसके बाद सिरदर्द या सबसे अधिक असर वाला फेज़ आता है, जो चार से 72 घंटे तक रह सकता है. कुछ लोगों को इस दौरान मितली और उल्टी भी हो सकती है.

आख़िरी फेज़ को पोस्ट-ड्रोमल या हैंगओवर फेज़ कहा जाता है. सिरदर्द काफ़ी हद तक कम हो जाने के बाद भी यह एक या दो दिन तक रह सकता है.

डॉ. मुनरो कहती हैं, “ऐसा लगता है जैसे आपके ऊपर से भाप से चलने वाला भारी रोलर गुज़र गया हो.”

वह कहती हैं, “आप ख़ुद को धीरे-धीरे संभालकर वापस काम पर लाते हैं. और यही वह समय होता है जब लोग अक्सर काम पर लौट जाते हैं, लेकिन हो सकता है कि वे पूरी तरह सामान्य तरीके से काम न कर पा रहे हों.”

लाइफ़स्टाइल में कौन-से बदलाव माइग्रेन को मैनेज करने में मदद कर सकते हैं?

माइग्रेन से जूझने वाले लोगों को पारंपरिक रूप से कैफ़ीन या चॉकलेट जैसे संभावित कारणों से बचने की सलाह दी जाती रही है. लेकिन डॉ. मुनरो कहती हैं कि इसके बजाय हमें अपनी दिनचर्या को जितना संभव हो सके, नियमित रखने पर ध्यान देना चाहिए.

वह बताती हैं कि माइग्रेन डिटेक्टिव बनना और यह सोचना मददगार हो सकता है कि माइग्रेन का दौरा शुरू होने से पिछले दो या तीन दिनों में क्या-क्या बदला था. इससे आप उन चीज़ों से बचने की कोशिश कर सकते हैं.

लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजना के मुताबिक़ नहीं चलती. डॉ. मुनरो कहती हैं, “हम सभी पूरी तरह सही नहीं हो सकते. इसलिए ख़ुद को दोष देकर परेशान न हों. अपना बेस्ट देने की कोशिश करें.”

समय पर खाना और ब्लड शुगर को गिरने न देना महत्वपूर्ण है. इसी तरह अच्छी नींद लेने की कोशिश करना भी ज़रूरी है. जितना संभव हो सके, हर दिन एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करनी चाहिए.

व्यायाम हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे माइग्रेन का दौरा भी शुरू हो सकता है. इसलिए माइग्रेन से जूझने वाले लोगों को यह देखना चाहिए कि वे पर्याप्त खाना खा रहे हैं और शरीर में पर्याप्त पानी बनाए रख रहे हैं या नहीं.

डॉ. मुनरो कहती हैं कि यह तरीक़ा यह समझाने में मदद कर सकता है कि हमारे लिए वीकेंड क्यों जोखिम भरा हो सकता है. आख़िर शुक्रवार को हम ऐसा क्या अलग कर रहे होते हैं?

वह कहती हैं, “हो सकता है कि आप काम ख़त्म करने की जल्दी में हों. हो सकता है कि शाम को आप आराम कर रहे हों और शायद एक ग्लास वाइन पी रहे हों, जो आप आम तौर पर सप्ताह के दौरान नहीं पीते. हो सकता है कि आप थोड़ी देर से सोने जाएं.”

वह कहती हैं, “सोचने की बात यह है कि क्या बदल रहा है और आप किस चीज़ को ज़्यादा नियमित बना सकते हैं.”

कौन से सप्लीमेंट और दवाएं मददगार हैं?

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यह सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है कि माइग्रेन के दौरे का इलाज असरदार दवा से बहुत शुरुआती स्टेज में ही किया जाए. डॉ. मुनरो कहती हैं कि अक्सर लोग यह देखने के लिए बहुत देर तक इंतज़ार करते रहते हैं कि यह दौरा कितना गंभीर होने वाला है.

वह कहती हैं, “तब तक इसका असर स्नोबॉल की तरह इतना बढ़ चुका होता है कि आप चाहे जो करें, उसे रोक नहीं पाएंगे. जल्दी दवा लेने से उस स्नोबॉल को बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है.”

डॉ. मुनरो कहती हैं कि मितली रोकने वाली गोली और दर्द निवारक दवा, जैसे आइबुप्रोफ़ेन या एस्पिरिन, ली जा सकती है. पैरासिटामॉल कम असरदार है और डॉ. मुनरो कोडीन के इस्तेमाल से बचने की चेतावनी देती हैं, क्योंकि इससे सिरदर्द और बढ़ सकता है.

ट्रिप्टान भी एक विकल्प है. ये माइग्रेन के लिए ख़ास तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाएं हैं, जिन्हें डॉक्टर दे सकते हैं.

डॉ. मुनरो कहती हैं कि कुछ सबूत हैं कि मैग्नीशियम और विटामिन बी2 जैसे सप्लीमेंट माइग्रेन के दौरों को कम करने में मदद कर सकते हैं.

पीरियड्स के दौरान माइग्रेन से जूझने वाली महिलाओं को अक्सर लगता है कि गर्भनिरोधक गोली हॉर्मोन में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है. वहीं, पेरिमेनोपॉज़ के दौरान एचआरटी भी मदद कर सकती है.

वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि कौन से न्यूरोकैमिकल महत्वपूर्ण हैं. कुछ लोगों के लिए सीजीआरपी नाम का एक पेप्टाइड महत्वपूर्ण है. अब ऐसे इलाज उपलब्ध हैं जो इसके असर को रोकते हैं.

दूसरे इलाजों में बोटॉक्स भी शामिल है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह दर्द पैदा करने वाले रसायनों को रोक सकता है. वहीं, एक्यूपंक्चर, योग, ताई ची और दर्द को दोबारा समझने वाली थेरेपी जैसे ट्रीटमेंट भी मदद कर सकते हैं.

डॉ. मुनरो कहती हैं कि लोगों को सबसे महत्वपूर्ण काम यह करना चाहिए कि वे इसके बारे में ज़्यादा जानकारी हासिल करें.

वह कहती हैं, “उम्मीद की बहुत गुंजाइश है. इसलिए हार न मानें और यह न सोचें कि आपने सब कुछ आज़मा लिया है, क्योंकि ऐसा नहीं होगा.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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