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मोहन भागवत ने सत्ता परिवर्तन पर कहा- हमें सतर्क रहने की ज़रूरत

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Source :- BBC INDIA

मोहन भागवत

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पढ़ने का समय: 6 मिनट

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि भारत को ‘तोड़ने’ की कोशिशें सफल नहीं होंगी.

उन्होंने कहा कि यह सोचना ग़लत है कि सत्ता बदलने से परिस्थितियां बदल जाएंगी. उन्होंने कहा, “ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है और आगे भी ऐसा नहीं होगा.”

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) में कथित अपारदर्शिता को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच भागवत ने यह भी कहा कि आंदोलनों से बदलाव नहीं आता और समस्याओं का समाधान समाज के भीतर से ही निकलता है.

उन्होंने नागपुर में विजयादशमी के वार्षिक संबोधन में कहा, “भारत उनका मुख्य निशाना है, क्योंकि भारत प्रगति कर रहा है. इन ताक़तों को पता है कि पिछले कुछ दशकों में निर्णायक नीतियों के साथ भारत जिस तरह आगे बढ़ा है, उसे वे बाधित नहीं कर सकते… इसलिए वे भारत और संघ को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.”

भागवत ने यह भी आगाह किया कि जब विरोध प्रदर्शन राजनीतिक होते हैं या उन्हें उकसाया जाता है, तो उनका इस्तेमाल तनाव, अराजकता और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए किया जाता है.

आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी. संघ की औपचारिक शुरुआत हेडगेवार के घर से हुई थी.

आरएसएस हर साल दशहरे में स्थापना दिवस मनाता है और इस दिन सरसंघचालक स्वसंसेवकों को संबोधित करते हैं.

इस समारोह में किसी शख़्स को मुख्य अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया जाता है. इस बार दैनिक जागरण के मुख्य संपादक संजय गुप्त को आमंत्रित किया गया था. समारोह में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी मौजूद थे.

‘पश्चिम से आ रहा तूफ़ान’

मोहन भागवत

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारतीयों को सतर्क रहने की ज़रूरत है, क्योंकि कुछ ताक़तें देश को विकसित राष्ट्र बनने के रास्ते से भटकाना चाहती हैं.

उन्होंने कहा, “यह स्पष्ट है… दुनिया में कई ऐसी ताक़तें हैं जो चाहती हैं कि भारत हार जाए.”

उन्होंने कहा, “पश्चिम से एक तूफ़ान आ रहा है, जो संस्कृति, व्यवस्था और सुरक्षा से नफ़रत करता है. यह सब कुछ नष्ट करना चाहता है.”

भागवत ने फ़्रांस, बांग्लादेश और नेपाल का भी उदाहरण दिया. इन देशों में हाल के वर्षों में सरकारों के ख़िलाफ़ आंदोलन हुए हैं.

नेपाल में जेन-ज़ी के विरोध प्रदर्शन के बाद सितंबर 2025 में केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई थी. इससे एक साल पहले, बांग्लादेश में छात्रों का विरोध प्रदर्शन एक बड़े आंदोलन में बदल गया था, जिसके बाद अगस्त 2024 में शेख़ हसीना की अवामी लीग सरकार सत्ता से हट गई थी.

हाल ही में फ़्रांस में बढ़ती जीवन-यापन की लागत और सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें 1,000 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया.

भागवत ने कहा कि भारत में भी कुछ लोग ऐसी ताक़तों के विचारों को दोहराते दिखाई देते हैं.

उन्होंने कहा, “भारत में भी कुछ लोग उनके विचारों से सहमत हैं…जिनकी बुद्धि कम है और जिन्हें सत्ता की लालसा है.”

समाज को सतर्क रहने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समस्याओं का समाधान विरोध प्रदर्शनों के बजाय समाज के भीतर से निकले.

भागवत ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को बंगाल में एकता के प्रतीक के तौर पर पेश किया. उन्होंने कहा कि जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश की, तो समाज ने इसका मज़बूती से विरोध किया और ब्रिटिश सरकार को अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ा. हालांकि, 1947 में ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि लोग नफ़रत में उलझ गए और राष्ट्रीय एकता को भूल गए.

भागवत ने कहा, “जब लॉर्ड कर्ज़न ने हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग करने के लिए बंगाल को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश की, तो समाज ने एक ज़मीन और एक जनता को धर्म के आधार पर बाँटने के फ़ैसले का मज़बूती से विरोध किया. ब्रिटिश सरकार को बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. उसी दौर में ‘वंदे मातरम’ उस एकता और देशभक्ति का प्रतीक बनकर उभरा. विभाजन की कोशिश नाकाम हो गई.”

उन्होंने कहा, “फिर 1947 में ऐसा ही नतीजा क्यों हासिल नहीं किया जा सका? क्योंकि जो लोग हमें बाँटना चाहते थे और आपसी संघर्ष में उलझाए रखना चाहते थे, उन्होंने हमारे मन में यह धारणा बैठा दी कि चूंकि हम अलग हैं, इसलिए अलग-अलग हैं. चूंकि हम एक-दूसरे से अलग दिखाई देते हैं, इसलिए वास्तव में भी अलग और एक-दूसरे से दूर होने चाहिए.

“सांप्रदायिक और चरमपंथी विचारधाराओं के प्रभाव में आकर हम भी यह मानने लगे कि अगर हम अलग दिखाई देते हैं, तो वास्तव में हम एक नहीं, बल्कि एक-दूसरे से अलग हैं. अलगाववाद के जुनून, राजनीतिक वर्चस्व की लालसा और स्वार्थों की पूर्ति की कोशिशों के चलते हम धीरे-धीरे उन बुनियादी सिद्धांतों को ही नकारने लगे, जिन्होंने हमें एकजुट रखा था. तुष्टीकरण की मानसिकता ने इस विभाजनकारी सोच को लगातार बढ़ावा दिया. आखिरकार, देश का विभाजन हो गया.”

‘सत्ता परिवर्तन’ वाले बयान पर विवाद

प्रशांत भूषण

मोहन भागवत की यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के उस बयान के कुछ दिनों बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली में मतदाता सूची के एसआईआर में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन अब “वास्तव में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई” बन गए हैं.

उनके इस बयान से राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था.

भूषण ने पिछले सप्ताह कहा था, “सरकार आरोप लगाती है कि विपक्ष सत्ता परिवर्तन चाहता है…फ़िलहाल हम यह सुनिश्चित करने के लिए लड़ रहे हैं कि चुनाव सही तरीक़े से हों. लेकिन अगर इसी तरह की बर्बरता जारी रही, तो निश्चित रूप से सत्ता परिवर्तन होगा.”

बीजेपी ने इस बयान पर पलटवार किया. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आरोप लगाया कि कुछ समूह देश में राजनीतिक अशांति फैलाने के लिए युवाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सीआर केशवन ने भी सत्ता परिवर्तन की मांग की आलोचना की. उन्होंने कहा कि भूषण का बयान साबित करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन विपक्ष की सरकार गिराने की कथित रणनीति को छिपाने के लिए एक “बहाना” हैं.

पर्यावरण और नैतिकता के बीच संतुलन

आरएसएस कार्यक्रम

नागपुर में संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि भारत को विकास का ऐसा नया मानक तय करना चाहिए, जो मानवता के लिए प्रतिकूल परिणाम पैदा न करे.

उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक में प्रगति जारी रहेगी, लेकिन यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि पर्यावरण और नैतिकता की अनदेखी न हो. उन्होंने भारत की विविधता को सुरक्षित रखने और उसका सम्मान करने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि देश में धर्म, भाषा और खानपान के मामले में विविधता है.

भागवत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच असंतुलन का उदाहरण देने के लिए नेपाल में हाल में आई बाढ़ का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, “कोलकाता में जो हुआ (भगदड़ में मौतें), वह हमारी अपनी ग़लती के कारण हुआ… लेकिन नेपाल में जो हुआ, वह प्राकृतिक आपदा थी.”

उन्होंने भारत, नेपाल और चीन तक फैले पूरे हिमालयी क्षेत्र को लेकर आगाह किया और कहा कि विकास के कारण इस इलाके में समस्याएं पैदा हो रही हैं.

उन्होंने कहा, “बड़े पैमाने पर जान-माल का नुक़सान हुआ है. हमें विकास और यह सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना होगा कि विकास की कीमत लोगों की मौत के रूप में न चुकानी पड़े.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS