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4 दिसंबर 1929 को अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने हंगरी में सामने आए एक ऐसे मामले की ख़बर छापी थी, जिसने लोगों को हैरान कर दिया था. उन दिनों क़रीब 50 महिलाओं पर मुक़दमा शुरू हुआ था.
इन महिलाओं पर आरोप था कि उन्होंने इस यूरोपीय देश के एक दूरदराज़ गांव में रहने वाले ज़्यादातर पुरुषों को ज़हर देकर मार डाला.
रिपोर्ट छोटी थी, लेकिन उसमें चौंकाने वाली जानकारियां थीं. कहा गया था कि 1911 से 1929 के बीच बुडापेस्ट से क़रीब 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नादीरेव गांव की कई महिलाओं ने 50 से ज़्यादा पुरुषों को ज़हर देकर मार डाला.
इन महिलाओं को ‘एंजेल मेकर्स’ के नाम से जाना जाने लगा था. उन पर आरोप था कि उन्होंने आर्सेनिक वाले घोल से पुरुषों को ज़हर दिया और उनकी हत्या की.
कुछ लोग इसे आधुनिक इतिहास में महिलाओं द्वारा पुरुषों की सामूहिक हत्या का सबसे बड़ा मामला मानते हैं.
इन महिलाओं को खुली अदालत में पेश किया गया. वहां एक नाम बार-बार सामने आया- ज़ूज़ाना फ़ाज़ेकाश, जो गांव की दाई (मिडवाइफ़) थी.
उस समय यह गांव ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के अधीन था और वहां कोई डॉक्टर नहीं था. ऐसे में फ़ाज़ेकाश ही गांव की महिलाओं को इलाज से जुड़ी सेवाएं देती थीं. गांव की चिकित्सा व्यवस्था पर उनका लगभग पूरा नियंत्रण था.
गांव की रहने वाली मारिया गोनिया ने 2004 में बीबीसी की एक रेडियो डॉक्यूमेंट्री में बताया था कि फ़ाज़ेकाश को इन ज़हर देकर की गई हत्याओं की मुख्य सूत्रधार क्यों माना जाता था. उनके मुताबिक़, गांव की सभी महिलाएं अपनी परेशानियां फ़ाज़ेकाश से साझा करती थीं.
उन्होंने कहा, “उसने महिलाओं से कहा कि अगर उनके पतियों के साथ समस्या है, तो उसके पास इसका एक आसान समाधान है.”
हालांकि फ़ाज़ेकाश को इन हत्याओं का मुख्य सूत्रधार माना गया, लेकिन मामले से जुड़े दस्तावेज़ों और गांव की महिलाओं की गवाही में उनकी ज़िंदगी की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आती है. इनमें पुरुषों की ओर से महिलाओं के साथ की गई हिंसा, दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं का ज़िक्र था.
लेकिन यह मामला कई साल तक छिपा रहा. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, पहली हत्या 1911 में दर्ज हुई थी. लेकिन 1929 तक कोई जांच शुरू नहीं हुई.
आख़िर पुलिस को अभियुक्तों तक पहुंचने का सुराग कैसे मिला?
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एक अलग दौर
1911 में ज़ूज़ाना फ़ाज़ेकाश नाम की एक महिला नादीरेव गांव में आईं.
मारिया गोनिया के मुताबिक़ और अदालत में सामने आई गवाहियों के आधार पर, फ़ाज़ेकाश ने दो वजहों से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा.
पहली वजह यह थी कि दाई के तौर पर अपने काम के अलावा उन्हें दवाओं से इलाज की भी जानकारी थी. वह दवाएं बनाने के लिए कुछ रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल भी करती थीं. उस इलाक़े में इस तरह की जानकारी बहुत आम नहीं थी.
दूसरी वजह यह थी कि उनके पति के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी.
मारिया गोनिया ने बताया, “नादीरेव में न तो कोई पादरी था और न ही कोई डॉक्टर. इसलिए उनकी जानकारी और हुनर की वजह से लोग उनके पास जाने लगे और उन पर भरोसा करने लगे.”
उन्होंने आगे बताया, “धीरे-धीरे इस महिला को घरों के बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बातों की जानकारी मिलने लगी. ऐसे पुरुष जो अपनी पत्नियों को पीटते थे, उनके साथ ज़बरदस्ती करते थे और उनमें से कई अपनी पत्नियों को धोखा देते थे. दुर्व्यवहार और हिंसा बहुत ज़्यादा थी.”
इसी दौरान फ़ाज़ेकाश ने एक ऐसा काम भी किया, जो उस समय ग़ैर-क़ानूनी था. वह अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए महिलाओं का गर्भपात करती थीं. इसके लिए उन पर मुक़दमा भी चला, लेकिन उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया गया.
गोनिया के मुताबिक़, उस समय बड़ी समस्या यह थी कि बहुत सी शादियां परिवार तय करते थे. कम उम्र की लड़कियों की शादी ऐसे पुरुषों से कर दी जाती थी, जो कई बार उनसे बहुत ज़्यादा उम्र के होते थे.
उन्होंने कहा, “उस समय तलाक़ का कोई प्रावधान नहीं था. अगर आपके साथ मारपीट या दुर्व्यवहार होता था, तब भी आप अपने पति से अलग नहीं हो सकती थीं.”
हालांकि, उस दौर की रिपोर्टों में एक और बात का ज़िक्र मिलता है. इनमें से कई तयशुदा शादियों के साथ एक तरह का क़रार भी होता था. इसमें ज़मीन, विरासत और क़ानूनी ज़िम्मेदारियों जैसी बातें शामिल होती थीं.
गोनिया ने बीबीसी से बातचीत में बताया, “फ़ाज़ेकाश धीरे-धीरे महिलाओं को यक़ीन दिलाने लगीं कि वह उनकी समस्याओं का हल निकाल सकती हैं.”
ज़हर देने का पहला मामला 1911 में सामने आया. इसके बाद के वर्षों में और भी कई पुरुषों की मौत हुई. उस समय पहला विश्व युद्ध चल रहा था और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखर रहा था.
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18 साल के दौरान, पतियों और परिवार के मुखियाओं की मौत के 45 से 50 मामले सामने आए. इन सभी को गांव के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया.
धीरे-धीरे बहुत से लोग नादीरेव को ‘क़ातिलों का गांव’ कहने लगे.
इन घटनाओं ने पुलिस का ध्यान खींचा. 1929 की शुरुआत में अधिकारियों ने कब्रें खोदकर शवों की जांच शुरू की. उन्हें एक ऐसा सबूत मिला, जिसका इस्तेमाल अभियुक्तों के ख़िलाफ़ किया जा सकता था, वो था -आर्सेनिक.
महिलाओं पर मुक़दमा
फ़ाज़ेकाश गांव में एक आम, एक मंज़िला घर में रहती थीं. यह घर सड़क की ओर था. कहा जाता है कि इन हत्याओं में इस्तेमाल किए गए ज़्यादातर ज़हर इसी घर में तैयार किए गए थे.
19 जुलाई 1929 को उन्होंने इसी घर से पुलिस अधिकारियों को अपनी गिरफ़्तारी के लिए आते देखा.
मारिया गोनिया ने बताया, “जब उन्होंने देखा कि पुलिस उनके घर की ओर आ रही है, तो उन्हें समझ आ गया कि अब उनका बचना मुश्किल है. पुलिस के घर पहुंचने तक उनकी मौत हो चुकी थी. उन्होंने वही ज़हर पी लिया था, जिसे उन्होंने ख़ुद तैयार किया था.”
लेकिन इन हत्याओं के लिए सिर्फ़ फ़ाज़ेकाश को ज़िम्मेदार नहीं माना गया.
1929 से राज्य की राजधानी सेलेंक में 26 महिलाओं पर मुक़दमा चलाया गया.
इनमें से आठ को मौत की सज़ा सुनाई गई और बाकी को जेल भेज दिया गया. इनमें सात महिलाओं को उम्रक़ैद की सज़ा मिली.
लेकिन सिर्फ़ दाई ही इन हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं थीं.
इन महिलाओं में से बहुत कम ने अपना अपराध कबूल किया. इन हत्याओं के पीछे असल वजह क्या थी, यह भी कभी पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाया.
डॉक्टर और इतिहासकार गेज़ा चे ने अदालत के दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए बीबीसी को बताया कि इस मामले के कई रहस्यमय पहलू अब भी अनसुलझे हैं.
इस शोधकर्ता के मुताबिक़, “इन महिलाओं के मक़सद को लेकर कई तरह के सिद्धांत हैं. इनमें ग़रीबी और लालच से लेकर ऊब और ज़िंदगी से थक जाने तक की बातें शामिल हैं.”
इस इतिहासकार ने बताया, “कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़, जब उनके पति युद्ध के मोर्चे पर थे, तब इनमें से कुछ महिलाओं के संबंध रूसी युद्धबंदियों से बन गए थे. इन युद्धबंदियों को खेतों में काम करने के लिए उस इलाक़े में लाया गया था.”
उन्होंने कहा कि जब उनके पति युद्ध से वापस लौटे, तो इन महिलाओं के लिए अचानक मिली आज़ादी को खोना मुश्किल हो गया. इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक क़दम उठाने का फ़ैसला किया.
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1950 के दशक में इतिहासकार फ़्रेंट्स योर्गीफ़ की मुलाक़ात कम्युनिस्ट शासन के दौरान जेल में रहने के समय इस गांव के एक बुज़ुर्ग से हुई.
यह बुज़ुर्ग किसान दावा करता था कि नादीरेव की महिलाएं “बहुत पुराने समय से अपने पतियों को मारती आ रही थीं.”
इसके अलावा, हो सकता है कि ऐसा करने वाली महिलाएं सिर्फ़ इसी गांव में नहीं थीं.
इस गांव के पास स्थित तिसाकुर्ट शहर में भी कुछ कब्रें खोदी गईं और शवों में आर्सेनिक पाया गया. लेकिन इन मौतों के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया गया.
कुछ अनुमानों के मुताबिक़, इस इलाक़े में ज़हर देकर मारे गए लोगों की कुल संख्या 300 तक हो सकती है.
गोनिया का कहना है कि इन ज़हर देने की घटनाओं के बाद पुरुषों का अपनी पत्नियों के साथ व्यवहार “काफ़ी हद तक बेहतर हो गया.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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