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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के फील्ड मार्शल जनरल आसिम मुनीर की कई मौक़ों पर तारीफ़ कर चुके हैं.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद ट्रंप ने पाकिस्तानी फील्ड मार्शल को कई मौक़ों पर एक महान फाइटर, अहम शख़्सियत और असाधारण इंसान कहा था.

जून 2025 में व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी फील्ड मार्शल से पहली मुलाक़ात के बाद ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख से मिलना उनके लिए गर्व की बात है.

सबसे अहम वाक़या पिछले साल अक्तूबर का है. तब ट्रंप मिस्र के शर्म अल-शेख में शांति सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे. यह सम्मेलन ग़ज़ा में इसराइल और हमास के बीच हुए युद्धविराम समझौते के बाद आयोजित किया गया था.

युद्धविराम की कोशिशों में सहयोग के लिए विश्व नेताओं का धन्यवाद करते हुए ट्रंप ने अपने पीछे खड़े पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ का ज़िक्र किया लेकिन इसके तुरंत बाद असीम मुनीर की ओर इशारा करते हुए उन्हें ‘मेरे पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहा था.

लेकिन बात केवल तारीफ़ तक ही सीमित नहीं है. ट्रंप अहम मौक़ों पर ज़्यादा तवज्जो भी जनरल आसिम मुनीर को ही दे रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कई मुस्लिम-बहुल देशों से अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होने की अपील की. ट्रंप ने कहा है कि जो देश इसमें शामिल नहीं होंगे, वे इस शांति प्रक्रिया के हिस्सा नहीं रहेंगे.

ट्रंप ने शनिवार को फोन पर एक साथ सऊदी, यूएई, क़तर, बहरीन, तुर्की, जॉर्डन और पाकिस्तान के नेताओं से बात की थी. लेकिन जिन नेताओं से बातचीत का ट्रंप ने ज़िक्र किया, उनमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की बजाय उन्होंने फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर का नाम लिया.

आसिम मुनीर ट्रंप के विश्वसनीय कैसे बने?

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ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन का उल्लेख उनके आधिकारिक पदों के साथ किया लेकिन पाकिस्तान की ओर से उन्होंने फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर का नाम लिखा.

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ का नाम न होना इसलिए भी ध्यान खींचता है क्योंकि आसिम मुनीर को पाकिस्तान का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है जबकि वह निर्वाचित पद पर नहीं हैं.

हालांकि पाकिस्तान की सेना ऐतिहासिक रूप से देश की राजनीति और विदेश नीति तय करने में प्रमुख भूमिका निभाती रही है.

विश्लेषकों का कहना है कि आसिम मुनीर ने ऐसे समय में ट्रंप और उनके क़रीबी दायरे तक सीधी पहुंच बना ली है, जब पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद वर्षों तक तनावपूर्ण रहे संबंधों को फिर से सुधारने की कोशिश कर रहा है.

मुनीर ईरान से जुड़ी कूटनीति में भी एक अहम चेहरा बनकर उभरे हैं. पिछले हफ़्ते ही आसिम मुनीर तेहरान गए थे और युद्ध ख़त्म कराने में वह मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं.

तेहरान के बाद जनरल मुनीर चीन पहुँचे हैं, जहाँ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ पहले से ही हैं. किसी अहम विदेशी दौरे में शहबाज़ शरीफ़ के साथ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी होते हैं.

कहा जा रहा है कि ईरान से युद्ध ख़त्म कराने में पाकिस्तान भले मुखर मध्यस्थ के रूप में दिख रहा है लेकिन पर्दे के पीछे चीन भी काम कर रहा है.

पाकिस्तान में आर्मी प्रमुख का ताक़तवर होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिन के सैन्य संघर्ष मुनीर के सैन्य करियर के सबसे अहम दिन रहे हैं. इसी टकराव के बाद आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल बनाया गया था. इस टकराव में भारत और पाकिस्तान दोनों ने जीत का दावा किया था.

पाकिस्तान के पूर्व विदेश और रक्षा मंत्री खुर्रम दस्तगीर ख़ान ने क़तर के प्रसारक अल जज़ीरा से पिछले साल दिसंबर में कहा था, “भारत के साथ संघर्ष वह निर्णायक कारक था, जिसने सेना प्रमुख की अंतरराष्ट्रीय प्रोफाइल को ऊंचा उठाया.”

ईरान और अमेरिका दोनों के भरोसा हासिल

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रिटायर्ड पाकिस्तानी जनरल अहमद सईद ने फॉक्स न्यूज़ डिजिटल से इसी साल अप्रैल में कहा था आसिम मुनीर कई महीनों से वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक अनौपचारिक बैकचैनल की भूमिका निभा रहे हैं.

सईद ने कहा था, ”ऐसी विदेशी हस्तियां बहुत कम दिखाई देती हैं, जिनके संबंध एक साथ ट्रंप और ईरान की सैन्य व्यवस्था दोनों से इतने क़रीबी हों.”

यही सवाल अब चर्चा का विषय बन गया है कि आख़िर एक ही व्यक्ति ट्रंप के भी इतना क़रीब कैसे हो गया और ईरान के सबसे ताक़तवर सैन्य कमांडरों से भी उसके इतने गहरे संबंध कैसे बने.

सईद ने फॉक्स न्यूज़ से कहा था, ”मुनीर ने ईरान के साथ अपने संबंध 2016-17 के दौरान बनाना शुरू किए, जब वह पाकिस्तान की सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी के महानिदेशक थे. वह लगातार नेतृत्व से संपर्क में रहे.”

”वह ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ काम करते रहे. वह आईआरजीसी के साथ भी जुड़े रहे. मुनीर ने केवल आईआरजीसी से ही नहीं बल्कि ईरान की सेना और ख़ुफ़िया तंत्र के साथ भी संबंध बनाए. मुनीर लंबे समय तक आईआरजीसी की कुद्स फोर्स के पूर्व कमांडर कासिम सुलेमानी से भी संपर्क में रहे थे.”

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पाकिस्तानी विश्लेषक रज़ा रूमी ने फॉक्स न्यूज़ से ही कहा था कि ट्रंप का आसिम मुनीर की ओर आकर्षित होना हैरान नहीं करता है.

रूमी ने कहा था, “ट्रंप लंबे समय से ऐसे मज़बूत और निर्णायक नेताओं को पसंद करते रहे हैं. मुनीर उस छवि में फिट बैठते हैं, एक ऐसे ताक़तवर व्यक्ति जो परिणाम देने की क्षमता रखते हैं. सार्वजनिक रूप से करिश्माई सैन्य नेताओं के उलट, उनका अंदाज़ अपेक्षाकृत शांत और संयमित है. उनकी शैली खुली राजनीतिक बयानबाज़ी की बजाय ख़ुफ़िया काम और ऑपरेशनल अनुभव से आकार लेती है. मुनीर की पृष्ठभूमि ही उनके काम करने के तरीक़े और उनके बढ़ते प्रभाव दोनों को समझाती है.”

ब्रिटिश अख़बार द गर्डियन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ”पाकिस्तानी सेना प्रमुख उन गिने-चुने लोगों में शामिल थे जो अमेरिकी और ईरानी नेतृत्व को सीधे फोन पर बातचीत कराने में सक्षम रहे. उन्होंने दोनों पक्षों के बीच भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए संदेश पहुंचाए. अब व्यापक रूप से यह माना जा रहा है कि इन वार्ताओं का वास्तविक समन्वय इस्लामाबाद नहीं बल्कि रावलपिंडी से हो रहा था. यानी संसद से नहीं बल्कि सेना मुख्यालय से.”

पाकिस्तान की सत्ता का केंद्र

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संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और ब्रिटेन में पाकिस्तान की राजदूत रहीं मलीहा लोधी ने पिछले महीने द गार्डियन से कहा था, ”फील्ड मार्शल मुनीर ही इस पूरी प्रक्रिया की मुख्य ताक़त हैं. उनके बिना यह संभव नहीं होता. विदेश मंत्रालय तो केवल जूनियर पार्टनर है. ईरान और अमेरिका जैसे देशों को आसिम मुनीर पर भरोसा है. हमारे सरकारी मंत्री वास्तव में सिर्फ़ सहायक भूमिका में हैं.”

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मुनीर हमेशा से अंतरराष्ट्रीय स्तर के राजनयिक चेहरा नहीं थे.

2022 में सेना प्रमुख बनने के बाद उनका मुख्य ध्यान घरेलू राजनीति पर था. तब पाकिस्तान बहुत अस्थिर था. इमरान ख़ान के समर्थक नई सरकार को चुनौती दे रहे थे. आसिम मुनीर तब इमरान ख़ान के समर्थकों से बहुत सख़्ती से निपट रहे थे.

लेकिन पिछले डेढ़ वर्षों में पाकिस्तान की विदेश नीति में भी आसिम मुनीर का दख़ल बढ़ा है. पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख को सऊदी अरब की सरकार का भरोसा हमेशा से हासिल रहा है लेकिन आसिम मुनीर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बाक़ी सैन्य प्रमुखों की तुलना में साऊद हाउस में पहुँच ज़्यादा बनाई.

आसिम मुनीर अमेरिका-पाकिस्तान के बीच क्रिप्टो और खनन समझौतों की निगरानी कर चुके थे और सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता भी कर चुके थे.

मलीहा लोधी ने द गार्डियन से कहा था, “वह लगातार दौरे और सीधे संपर्क के ज़रिए नेताओं और देशों के साथ संबंध बनाने में काफ़ी सक्रिय रहे हैं. वह निष्क्रिय व्यक्ति नहीं हैं. वह ऐसे नहीं हैं जो किसी कॉल का इंतज़ार करें. जैसा कि उनकी कूटनीतिक सक्रियता में दिखा है, वह खुद फोन उठा लेते हैं.”

विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल के दौरान अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों को फिर से मज़बूत करने में मुनीर की भूमिका ने उन्हें एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया.

‘हाइब्रिड लोकतंत्र’

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जनवरी 2024 पाकिस्तान और ईरान ने एक दूसरे के इलाक़ों में हवाई हमले किए थे. लेकिन इन हमलों से दोनों देशों के संबंधों में भरोसा कम नहीं हुआ. पाकिस्तान ने ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई और बाद में 10 दिन के युद्ध के दौरान ईरान पर की गई बमबारी की खुलकर निंदा की थी.

पाकिस्तान भले सुन्नी मुस्लिम बहुल देश है लेकिन यहाँ के लोगों की सहानुभूति ईरान के साथ साफ़ दिखती है.

लंदन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर अविनाश पालीवाल ने द गार्डियन से कहा, ”मुनीर को बहुत मुश्किल हालात मिले थे लेकिन उन्होंने उसे बेहद कुशलता से संभाला. ख़ासकर ट्रंप प्रशासन के साथ उनके लचीले व्यवहार और व्यक्तित्व-आधारित कूटनीति की समझ के कारण.”

हालांकि पालीवाल उन विशेषज्ञों में भी शामिल हैं जो पाकिस्तान के व्यापक कूटनीतिक अभियान का पूरा श्रेय केवल एक व्यक्ति को देने के ख़िलाफ़ हैं. उनका कहना है कि इस अभियान के तहत पाकिस्तान के कई वरिष्ठ मंत्री चीन, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों के लगातार दौरे करते रहे ताकि सभी पक्षों के साथ समझौते की संभावनाएं आगे बढ़ाई जा सकें.

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पाकिस्तान में सेना प्रमुख को लंबे समय से सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता रहा है.

ऐसे देश में जहाँ लोकतंत्र कभी प्रत्यक्ष सैन्य शासन और कभी निर्वाचित सरकारों के बीच झूलता रहा है, वहाँ सरकारें अक्सर सेना के समर्थन पर निर्भर भी रही हैं.

अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने अमेरिकी अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल से कहा, “यह उस वास्तविकता को संवैधानिक वैधता देना है जो पहले से मौजूद है. मौजूदा सेना प्रमुख ने क़ानून और संविधान से निर्धारित अधिकारों से कहीं अधिक शक्ति का इस्तेमाल किया है.”

आसिम मुनीर को 2022 में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सेना प्रमुख नियुक्त किया था, तब वह कार्यवाहक भूमिका में थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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