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श्रीलंका के समुद्र में तेल और गैस की खोज, क्या भारत भी करेगा निवेश?

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Source :- BBC INDIA

गहरे समुद्र का यह क्षेत्र क़रीब 33,964 वर्ग किलोमीटर में फैला है.

श्रीलंका के पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में मौजूद मन्नार बेसिन में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज तेज़ करने की तैयारी चल रही है.

श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण ने गहरे समुद्र में मौजूद चार प्रमुख क्षेत्रों के लिए ‘एसएल2026-01’ नाम से अंतरराष्ट्रीय नीलामी की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू कर दी है.

गहरे समुद्र का यह क्षेत्र क़रीब 33,964 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इस नीलामी का मुख्य मक़सद यहां अंतरराष्ट्रीय निवेश लाना है. हालांकि, श्रीलंका सरकार फ़िलहाल अपने पैसे से गहरे समुद्र में कोई नई ड्रिलिंग नहीं कर रही है.

इसके बजाय 1967 से 2019 के बीच अलग-अलग चरणों में जुटाए गए 2डी और 3डी भूकंपीय आंकड़ों का दोबारा अध्ययन किया गया है.

इसके साथ ही, 2011 में केयर्न कंपनी की ओर से कुओं से जुटाए गए आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया गया.

इस इलाक़े में क़रीब दो अरब बैरल कच्चा तेल

आधुनिक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और बेहतर सॉफ़्टवेयर की मदद से इन पुराने आंकड़ों की दोबारा जांच की गई. इसके आधार पर ऐसे चार प्रमुख क्षेत्रों की पहचान कर नक़्शा तैयार किया गया है, जहां हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना है.

इस इलाक़े में क़रीब दो अरब बैरल कच्चा तेल और नौ ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस होने का अनुमान है.

ये क्षेत्र समुद्र में 100 मीटर से लेकर 3,000 मीटर तक की गहराई में हैं.

श्रीलंका सरकार की योजना लंदन और कुआलालंपुर में निवेशकों के लिए सम्मेलन आयोजित करने की है. इसके ज़रिए सरकार अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों से करोड़ों डॉलर का निवेश लाना चाहती है.

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के लिए समुद्र में मौजूद ये संसाधन नई उम्मीद बनकर सामने आए हैं.

लेकिन कई सवाल भी हैं.

क्या पुराने आंकड़ों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित किया जा सकेगा?

इस क्षेत्र में चल रही भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्या असर पड़ेगा?

और तेल तथा गैस की खोज से पर्यावरण को कितना ख़तरा हो सकता है?

‘कामयाबी की दर 50 प्रतिशत’

मन्नार बेसिन में छिपा तेल-गैस: 9 ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट तक पहुंच पाएगा श्रीलंका?

पेरादेनिया यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और जाने-माने भूवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अतुल सेनारत्ने ने बीबीसी तमिल से कहा, “दुनिया भर में तेल और गैस की खोज के लिए खोदे जाने वाले कुओं में केवल 10 से 15 प्रतिशत ही सफल होते हैं.”

“लेकिन श्रीलंका के मन्नार बेसिन में चार परीक्षण कुएं खोदे गए थे. इनमें से दो में अच्छी गुणवत्ता वाली प्राकृतिक गैस मिली. इस हिसाब से यहां कामयाबी की दर 50 प्रतिशत रही.”

उन्होंने कहा, “1960 और 1970 के दशक में की गई ड्रिलिंग केवल 700 मीटर की गहराई तक पहुंच पाई थी. लेकिन अब यह पुष्टि हो चुकी है कि तीन हज़ार मीटर यानी तीन किलोमीटर की गहराई में अरबों साल पुरानी चट्टानों की परतों के बीच बहुत अच्छी गुणवत्ता वाली गैस मौजूद है.”

“यह न केवल देश के ऊर्जा संकट का घरेलू समाधान दे सकती है, बल्कि अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने का भी बहुत बड़ा मौक़ा बन सकती है.”

प्रोफ़ेसर अतुल सेनारत्ने ने यह भी कहा कि श्रीलंका में पेट्रोलियम क्षेत्र के लिए ज़रूरी प्रशिक्षण हासिल कर चुके भूवैज्ञानिक और तकनीकी अधिकारी मौजूद हैं. पेरादेनिया यूनिवर्सिटी ने ऐसे पेशेवर तैयार किए हैं.

केयर्न कंपनी की खोज और वैज्ञानिक प्रमाण

श्रीलंका की मन्नार खाड़ी में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज 1960 के दशक में ही शुरू हो गई थी.

लेकिन गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करके प्राकृतिक गैस की मौजूदगी खोजने और उसकी पुष्टि करने वाली पहली कंपनी ‘केयर्न लंका’ थी.

केयर्न लंका, भारत की केयर्न इंडिया कंपनी की सहयोगी कंपनी थी.

केयर्न ने अगस्त 2011 में मन्नार बेसिन में गहरे समुद्र में परीक्षण कुएं खोदने शुरू किए थे.

कंपनी ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि समुद्र की सतह से क़रीब 4,300 मीटर यानी 14 हज़ार फ़ीट की गहराई में प्राकृतिक गैस मिली है.

इस खोज के बाद ‘डोराडो’ और ‘बाराकुडा’ नाम के कुओं में परीक्षण किए गए.

इन परीक्षणों में हर दिन 28 लाख क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस का बहाव दर्ज किया गया.

इससे पहली बार वैज्ञानिक रूप से यह पुष्टि हुई कि श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र में इस्तेमाल के लायक़ हाइड्रोकार्बन मौजूद है.

हालांकि, उस समय वहां मिली गैस की मात्रा सीमित थी. यह अनुमान लगाया गया कि उस गैस को निकालकर बाज़ार में बेचना फ़ायदेमंद नहीं होगा.

इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत भी तेज़ी से गिर गई थी.

क़रीब 15 करोड़ डॉलर का निवेश करने के बाद केयर्न ने 2015 में अपना लाइसेंस छोड़ दिया और श्रीलंका से बाहर चली गई.

साल 2017 में भूवैज्ञानिक रत्नायके और उनकी टीम ने मन्नार बेसिन को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट प्रकाशित की.

इस शोध में 2011 में खोदे गए डोराडो और बाराकुडा कुओं से मिले समुद्र तल की चट्टानों के नमूनों का अध्ययन किया गया था.

इसमें वैज्ञानिक रूप से यह पुष्टि हुई कि इन चट्टानों की परतें हाइड्रोकार्बन और कच्चा तेल बनने के लिए ज़रूरी ‘तापीय परिपक्वता’ के स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

रिपोर्ट में ख़ास तौर पर कहा गया कि क्रिटेशियस काल के आख़िरी दौर की मिट्टी वाली चट्टानों में बड़ी मात्रा में ऐसे जैविक पदार्थ मौजूद हैं, जिनसे अच्छी गुणवत्ता वाली प्राकृतिक गैस और तेल बन सकता है.

पुरानी कोशिशें क्यों नाकाम रहीं?

श्रीलंका के मन्नार की खाड़ी वाले समुद्री क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन और तेल खोजने की कोशिशों का इतिहास काफ़ी पुराना है.

शुरुआती अध्ययन 1967-68 और फिर 1973-74 में किए गए थे.

इसके बाद 1975 से 1985 तक, फिर साल 2000 में और आख़िर में 2007 से 2011 के बीच अलग-अलग चरणों में गहरे समुद्र में खोज का काम किया गया.

लेकिन साफ़ नीतियां न होने और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण ये अभियान लगातार आगे नहीं बढ़ पाए और इन्हें छोड़ दिया गया.

श्रीलंका के पूर्व ऊर्जा मंत्री चंपिका रणवका ने बीबीसी तमिल से कहा कि केयर्न के जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने के लिए नीलामी और निमंत्रण जारी किए गए थे.

लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी ने श्रीलंका में निवेश करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

उन्होंने कहा कि उनकी सरकारों के कार्यकाल में भी इन खोज अभियानों को आगे बढ़ाने की कोशिश हुई थी, लेकिन कोई कोशिश सफल नहीं हुई.

अब मौजूदा नेशनल पीपुल्स पावर सरकार ने इस मामले पर फिर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है.

सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सही तरीक़े से प्रचार करके निवेश आकर्षित करने की नई कोशिश कर रही है.

‘क्या यह वही पुरानी कहानी है?’

केयर्न के श्रीलंका से जाने के बाद मन्नार बेसिन में खोज का काम कई साल तक रुका रहा.

अब अंतरराष्ट्रीय नीलामी की नई प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और इस क्षेत्र के विशेषज्ञ कई सवाल उठा रहे हैं.

पूर्व बिजली ढांचा और ऊर्जा मंत्री उदय गम्मनपिला ने बीबीसी तमिल से कहा, “मन्नार बेसिन में गैस होने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है.”

“लेकिन समुद्र तल के नीचे से इसे निकालने और बिजली बनाने या कारख़ानों में इस्तेमाल करने लायक़ ढांचा तैयार करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करना होगा.”

“दुनिया अब हरित ऊर्जा की तरफ़ बढ़ रही है. ऐसे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कंपनियां गहरे समुद्र में हाइड्रोकार्बन से जुड़ी परियोजनाओं में इतना बड़ा निवेश करने के लिए तैयार होंगी.”

उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य कोयले के बजाय गैस का इस्तेमाल करके देश की ऊर्जा क्षमता को मज़बूत करना था. लेकिन वह इस योजना को लगातार आगे नहीं बढ़ा पाए.

श्रीलंका की नौसेना के रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी और समुद्री नक़्शे के विशेषज्ञ रियर एडमिरल वाई. एन. जयरत्ने ने बीबीसी तमिल से कहा, “श्रीलंका में तेल और प्राकृतिक गैस होने की संभावना पर 1960 के दशक से ही ध्यान दिया जा रहा है.”

“तब से कई पक्षों ने इसकी जांच की है, लेकिन किसी ने भी इस पर पूरा भरोसा नहीं जताया.”

उन्होंने कहा, “शुरुआत में सोवियत संघ ने बड़े स्तर पर अध्ययन किया था. चार परीक्षण कुओं में खनिज होने की संभावना मिलने के बाद भारत के दख़ल से आगे का अध्ययन किया गया.”

“संसाधनों की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद भी यह सवाल बना रहा कि इनका व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल कितना फ़ायदेमंद होगा. इसी वजह से कोई भी सकारात्मक फ़ैसला लेने के लिए आगे नहीं आया.”

“सरकार ने अब अंतरराष्ट्रीय नीलामी की घोषणा की है, लेकिन इसे किस तरह की प्रतिक्रिया मिलेगी, इसे लेकर अभी भी संदेह है.”

“इसके लिए बहुत बड़े निवेश की ज़रूरत है. साथ ही, यह सवाल भी बना हुआ है कि क्या इससे व्यावसायिक फ़ायदा मिलेगा.”

सरकार का क्या कहना है?

श्रीलंका सरकार के कैबिनेट प्रवक्ता मंत्री नलिंदा जयतिस्सा.

कैबिनेट के प्रवक्ता और मंत्री नलिंदा जयतिस्सा ने बीबीसी तमिल से सरकार का पक्ष रखते हुए कहा, “श्रीलंका की मन्नार खाड़ी में तेल होने की संभावना पर लगातार ध्यान दिया जाता रहा है.”

“कुछ मौक़ों पर अध्ययन भी किए गए, लेकिन इसके लिए सही तरीक़े से योजना बनाकर काम नहीं किया गया.”

उन्होंने कहा, “हमारी सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दे रही है.”

“पहले चरण के तहत हमने सीलोन पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय नीलामी की प्रक्रिया घोषित की है.”

“यह नीलामी अगले साल फ़रवरी के पहले सप्ताह तक खुली रहेगी.”

“इस साल के आख़िर तक लंदन और कुआलालंपुर में निवेशकों के लिए विशेष सम्मेलन आयोजित करने की भी योजना है. इन सम्मेलनों का मक़सद अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करना है.”

मंत्री नलिंदा जयतिस्सा ने आगे कहा, “हमने इस बात पर ज़ोर दिया है कि खोज का काम बहुत सावधानी से होना चाहिए.”

“यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस इलाक़े के प्राकृतिक वातावरण को किसी भी तरह का नुक़सान न हो. ख़ास तौर पर मन्नार क्षेत्र के मछुआरा समुदाय पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए.”

“सरकार पर्यावरण के अनुकूल फ़ैसले लेने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.”

उन्होंने कहा, “मन्नार ज़िला युद्ध से प्रभावित इलाक़ों में शामिल रहा है. यहां मछली पकड़ने के अलावा रोज़गार का कोई दूसरा बड़ा साधन नहीं है. इसलिए मछुआरों से जुड़े मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.”

उन्होंने कहा, “तेल की खोज शुरू करने से पहले इसके लिए एक मज़बूत क़ानून तैयार किया जाना चाहिए. उसके बाद ही खोज की अनुमति दी जानी चाहिए.”

“सरकार इस बारे में न्याय मंत्रालय से बातचीत करेगी और सही फ़ैसला लेगी.”

हिंद महासागर की नई ‘शतरंज’

श्रीलंका नेवी से रिटायर हुए सीनियर अफ़सर और समुद्री नक्शों के जानकार रियर एडमिरल वाई. एन. जयरत्ने.

विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका की ओर से गहरे समुद्र के क्षेत्रों की नीलामी केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है.

यह हिंद महासागर में बड़ी ताक़तों के बीच चल रही भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से भी क़रीबी रूप से जुड़ी हुई है.

मन्नार के जिन क्षेत्रों में खोज होनी है, वे भारत की सीमा के बहुत पास हैं.

रियर एडमिरल जयरत्ने का कहना है कि भारत अपनी दक्षिणी सीमा की सुरक्षा और इस क्षेत्र में दूसरे देशों की सैन्य मौजूदगी रोकने पर गंभीरता से ध्यान देगा.

उन्होंने कहा कि भारत इस पूरे मामले पर नज़र रखेगा.

रियर एडमिरल जयरत्ने ने कहा, “हालांकि, यह तय नहीं है कि भारत सीधे तेल और गैस निकालने की गतिविधियों में शामिल होगा.”

“अगर दूसरी कंपनियां यहां खोज और तेल शोधन का काम करती हैं, तो भारत उन पर नज़र रखेगा और दूसरे विकल्पों पर विचार करेगा.”

“भारत के सीधे तौर पर बहुत बड़ा निवेश करने की संभावना कम है.”

“इसके अलावा, भारत दक्षिण चीन सागर और वियतनाम पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है. इसलिए यहां उसका सीधा दख़ल कम रह सकता है.”

चीन के प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा, “चीन पहले ही हंबनटोटा बंदरगाह और कोलंबो पोर्ट सिटी में अपनी मौजूदगी बना चुका है.”

“लेकिन उत्तरी क्षेत्र में उसके सीधे प्रवेश की संभावना कम है.”

“ऐसा नहीं लगता कि चीन तुरंत यहां के संसाधनों पर नियंत्रण करने की कोशिश करेगा.”

“अगर चीन यहां प्रवेश करता है, तो भारत की निगरानी और दबाव बढ़ जाएगा. इसलिए चीन तुरंत यहां अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए आगे नहीं आएगा.”

उन्होंने कहा, “हिंद महासागर के समुद्री व्यापार मार्ग को नियंत्रित करने में दिलचस्पी रखने वाले अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी इन गतिविधियों पर नज़र रखेंगे.”

“लेकिन सटीक अध्ययन और प्रमाणित आंकड़ों के बिना कोई भी देश या अंतरराष्ट्रीय कंपनी इतना बड़ा निवेश करने के लिए आगे नहीं आएगी. फ़िलहाल स्थिति यही है.”

मन्नार की प्रवाल भित्तियों और मछुआरों के रोज़गार को ख़तरा

आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदे-नुक़सान से अलग, मन्नार की खाड़ी का इलाक़ा समुद्री जैव विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है.

पर्यावरण कार्यकर्ता चेतावनी देते हैं कि गहरे समुद्र में ड्रिलिंग या किसी दुर्घटना की वजह से तेल का रिसाव हुआ, तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं.

इससे मन्नार की खाड़ी में मौजूद दुर्लभ प्रवाल भित्तियां, डुगोंग यानी समुद्री गाय, व्हेल और समुद्र में रहने वाले हज़ारों दूसरे जीव नष्ट हो सकते हैं.

उत्तरी हिंद महासागर में ब्लू व्हेल पर रिसर्च की राह दिखाने वाली श्रीलंकाई मरीन बायोलॉजिस्ट डॉ. आशा डी वोस.

श्रीलंका की समुद्री जीवविज्ञानी और उत्तरी हिंद महासागर की ब्लू व्हेल पर शोध करने वालों में अग्रणी डॉक्टर आशा डी वोस ने बीबीसी तमिल से कहा, “जलवायु परिवर्तन की वजह से बदलते मौसम का असर मन्नार के समुद्री क्षेत्र पर पहले ही पड़ रहा है.”

“ऐसे में गहरे समुद्र में ड्रिलिंग की गतिविधियां बहुत बड़ी आपदा का कारण बन सकती हैं.”

मन्नार ज़िले के समुद्री मज़दूर सहकारी संघ के प्रतिनिधियों ने भी इस बारे में अपनी चिंता जताई.

उन्होंने कहा, “सीमा पार से आने वाले ट्रॉलर की समस्या के कारण हमारे रोज़गार पर पहले ही गंभीर असर पड़ा है.”

“अब अगर गहरे समुद्र में ड्रिलिंग और जहाज़ों की आवाजाही बढ़ती है, तो मछली पकड़ने का हमारा क्षेत्र और छोटा हो जाएगा.”

“अगर पर्यावरण से जुड़ी कोई बड़ी आपदा आती है, तो हमारा पूरा भविष्य सवालों के घेरे में आ जाएगा.”

सपना या हक़ीक़त?

श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण के महानिदेशक नील डी सिल्वा ने कहा, “हमें भरोसा है कि पुराने अध्ययनों से मिले आंकड़ों और आधुनिक तकनीक की मदद से हम अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित कर पाएंगे.”

“इससे श्रीलंका ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर देश बन सकता है.”

मन्नार बेसिन में मौजूद नौ ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस एक ऐसा बड़ा संसाधन है, जिसमें श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालने की क्षमता हो सकती है.

लेकिन इस कोशिश का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि श्रीलंका सरकार कई बड़ी चुनौतियों से कैसे निपटती है.

इनमें अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करना, बड़ी ताक़तों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को संभालना और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है.

इन चुनौतियों को पार करके श्रीलंका इस प्राकृतिक संसाधन का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कैसे करेगा, इसी से तय होगा कि यह योजना हक़ीक़त बनेगी या केवल सपना रह जाएगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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