Source :- LIVE HINDUSTAN
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की बढ़त का श्रेय अपने समर्थन को दिया है। करीब 55 फीसदी वोटों की गिनती के बीच उनके दावे की चर्चा तेज है। इससे पहले ट्रंप भारत-पाकिस्तान संघर्ष में युद्धविराम कराने का श्रेय भी कई बार ले चुके हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के चुनावी प्रदर्शन का श्रेय अपने समर्थन को दिया है। इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के शुरुआती नतीजों में नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। बुधवार सुबह करीब 55.4 फीसदी मतों की गिनती के बाद उनके समर्थक गठबंधन को 56 सीटें मिलने का अनुमान था, जबकि विपक्षी गठबंधन 49 सीटों पर आगे था। अरब दलों को 15 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया। हालांकि, इन शुरुआती आंकड़ों से किसी भी गठबंधन की सरकार बनाने की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक संदेश शेयर करते हुए दावा किया कि नेतन्याहू के समर्थन में उनके उतरने के बाद चुनाव का रुख बदल गया। उन्होंने इसे नेतन्याहू की संभावित बड़ी हार से उबरकर मुकाबले में लौटने या जीत हासिल करने की स्थिति से जोड़कर पेश किया।
ट्रंप ने क्या दावा किया?
ट्रंप ने अपने पोस्ट में एक संदेश क्वोट किया, जिसमें कहा गया था कि उनके नेतन्याहू का समर्थन करने के बाद चुनावी माहौल बदल गया। संदेश के मुताबिक, नेतन्याहू को जिस चुनाव में निर्णायक हार का सामना करना पड़ सकता था, उसमें अब मुकाबला बराबरी का हो गया है या उनकी जीत की संभावना बन गई है।
यह संदेश ट्रंप के 18 अक्टूबर को नेतन्याहू के पक्ष में खुलकर समर्थन जताने के नौ दिन बाद आया। ट्रंप ने उस समय नेतन्याहू को मजबूत नेता और ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका का अहम सहयोगी बताया था। उन्होंने इजरायल के मतदाताओं से नेतन्याहू को दोबारा चुनने की अपील की थी। ट्रंप ने 25 अक्टूबर को भी नेतन्याहू के समर्थन में संदेश जारी किया था। उन्होंने दोनों देशों के बीच ईरान को लेकर जारी अभियान को आगे बढ़ाने के लिए नेतन्याहू की वापसी को जरूरी बताया था।
शुरुआती नतीजों में बढ़त, लेकिन सरकार बनाना चुनौती
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और बहुमत के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। बुधवार सुबह 55.4 फीसदी मतों की गिनती के बाद नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 56 सीटें मिलने का अनुमान था। विपक्षी गठबंधन 49 सीटों पर था, जबकि अरब दलों को 15 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया।
इसका अर्थ है कि शुरुआती बढ़त के बावजूद नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के आंकड़े से पांच सीट दूर था। दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिख रहा था।
चुनाव से पहले आए प्रमुख सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन को 61 सीटों के बहुमत से दूर रहने का अनुमान लगाया गया था। ऐसे में शुरुआती नतीजे उनके लिए अपेक्षा से बेहतर जरूर थे, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ट्रंप के समर्थन के कारण ही उनके प्रदर्शन में सुधार हुआ।
इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। इसके बाद दलों के बीच गठबंधन बनाकर सरकार तैयार होती है। इसलिए किसी दल या गठबंधन का सबसे बड़ा राजनीतिक समूह बनना और सरकार बना लेना दो अलग-अलग बातें हैं।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष का भी श्रेय ले चुके हैं ट्रंप
ट्रंप क्रेडिट लेने के पुराने शौकीन हैं। वह पहले भी अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में अपनी भूमिका को प्रमुखता से पेश करते रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में सैन्य टकराव के बाद युद्धविराम की घोषणा को लेकर भी उन्होंने कई बार इसका श्रेय लेने की कोशिश की थी।
मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई के बाद 10 मई को दोनों देशों ने सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई थी। इसके बाद ट्रंप ने दर्जनों बार दावा किया कि अमेरिकी हस्तक्षेप और टैरिफ की चेतावनी ने दोनों देशों को संघर्ष रोकने के लिए तैयार किया।
जुलाई 2025 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बैठक के दौरान भी ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा था कि उनके प्रशासन ने व्यापार के मुद्दे का इस्तेमाल करके लड़ाई रुकवाई।
हालांकि, भारत सरकार ने अमेरिकी मध्यस्थता के दावे को खारिज किया था। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई रोकने के संबंध में दोनों देशों के बीच बातचीत सीधे स्थापित सैन्य माध्यमों से हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रंप से बातचीत में स्पष्ट किया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते और भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई थी।
कई संघर्षों को रुकवाने का दावा कर चुके हैं ट्रंप
इसके अलावा भी ट्रंप ने कई बार दावा किया था कि उन्होंने अपने कूटनीतिक प्रयासों से छह या सात संघर्षों को समाप्त कराया। उनके दावों में भारत-पाकिस्तान, इजरायल-ईरान, थाईलैंड-कंबोडिया और आर्मेनिया-अजरबैजान जैसे संघर्ष शामिल थे। हालांकि, इन सभी मामलों में उनकी भूमिका और परिणाम एक जैसे नहीं थे।
विदेशी चुनावों में भी खुलकर समर्थन दे रहे हैं ट्रंप
ट्रंप का रुख केवल इजरायल तक सीमित नहीं है। अपने दूसरे कार्यकाल में वह दूसरे देशों के चुनावों में भी पसंदीदा नेताओं के पक्ष में खुलकर बोलते रहे हैं। उन्होंने हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान का समर्थन किया और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची सहित कई विदेशी नेताओं के पक्ष में सार्वजनिक बयान दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके प्रशासन के अधिकारियों ने दूसरे देशों के चुनावों से पहले राजनीतिक समर्थन जताने की रणनीति अपनाई है।
क्या नेतन्याहू की बढ़त का कारण ट्रंप का समर्थन है?
ट्रंप के समर्थन ने नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मजबूती और प्रचार का अवसर जरूर दिया। लेकिन शुरुआती चुनावी आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि नेतन्याहू के बेहतर प्रदर्शन की मुख्य वजह ट्रंप का समर्थन ही था।
इजरायल में मतदाताओं के फैसले पर सुरक्षा, ईरान के साथ संघर्ष, 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद सरकार की जवाबदेही, गाजा युद्ध और नेतन्याहू के नेतृत्व को लेकर घरेलू बहस जैसे कई मुद्दों का प्रभाव रहा है। नेतन्याहू भ्रष्टाचार के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं, जिन्हें वह खारिज करते हैं। फिलहाल, शुरुआती नतीजे नेतन्याहू के लिए राहत का संकेत हैं, लेकिन बहुमत का आंकड़ा हासिल करना और सरकार बनाना अब भी चुनौती है।
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