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एक ऐसा गीतकार जिसने राज कपूर को स्टार बनाया। खुद गुलजार भी उनके फैन रहे। उस गीतकार को एक फिल्म के सदमे ने मार दिया। मौत के बाद उनकी इस फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड जीता।

गीतकार और फिल्में बनाने वाले गुलजार की दुनिया फैन रही है। उनके लिखे गीतों में अलग दर्द, रोमांस झलकता है। जावेद अख्तर खुद को भी गुलजार का मुरीद मानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हो खुद गुलजार किसके फैन रहे हैं? उस शख्स का नाम है शैलेंद्र। 40 से लेकर 60 के दशक तक शैलेंद्र नाम का गीतकार इंडस्ट्री पर राज कर रहा था। इस गीतकार ने एक्टर राज कपूर के लिए कई ऐसे गाने लिखे जो आज अमर हो गए। लेकिन इस सफल करियर में शैलेंद्र को एक ऐसा सदमा लगा कि वो दुनिया से ही चल बसे।

राज कपूर और शैलेंद्र की हिट जोड़ी

राज कपूर की अधिकतर फिल्मों के लिए शैलेंद्र ने कई यादगार गीत लिखे। ‘जीना यहां मरना यहां’, ‘आवारा हूं’, ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’, ‘मेरा जूता है जापानी’ ‘दिल का हाल सुने दिल वाला’ जैसे कई खूबसूरत गाने लिखे। इन्हीं गानों की वजह से राज कपूर ग्लोबल स्तर पर भी नाम बनाने में कामयाब हुए। शैलेंद्र अपने काम में सफल हो रहे थे। 50 के दशक की कई सुपरहिट फिल्मों के गाने शैलेंद्र ने लिखे थे। लेकिन फिर शैलेंद्र ने गाने लिखने के साथ फिल्म बनाने के बारे में भी सोचा। उन्होंने अपने दोस्त राज कपूर से कहा कि वो फिल्म बनाना चाहते हैं जिनके हीरो के लिए वो उन्हें कास्ट करना चाहते हैं।

शैलेंद्र ने बनाई फिल्म

राज कपूर ने पहले बात मजाक में उड़ा दी। लेकिन फिर शैलेंद्र ने उन्हें फिल्म की कहानी सुनाई। ये कहानी फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मारे गए गुलफाम पर बेस्ड थी। राज कपूर ने कहानी सुनी तो उन्हें बहुत पसंद आई। उन्होंने फिल्म करने के लिए अपनी मंजूरी दे दी थी। लेकिन उन्होंने अपने इतने पुराने दोस्त के सामने एक शर्त रखी कि वो फिल्म शुरू होने से पहले एडवांस में फी लेंगे। शैलेंद्र हैरान हो गए कि देश के सबसे महंगे एक्टर में से एक राज कपूर की फीस एडवांस में कैसे देंगे। लेकिन तभी राज कपूर ने शैलेंद्र से एक का सिक्का मांगा और उनसे कहा कि यही उनकी एडवांस फीस है। ये सुनकर शैलेंद्र को अपनी दोस्ती पर गर्व हुआ होगा।

फिल्म तीसरी कसम

शैलेंद्र इस फिल्म के प्रोड्यूसर थे। उन्होंने फिल्म का नाम उपन्यास मारे गए गुलफाम से बदलकर तीसरी मंजिल कर दिया। इस फिल्म में राज कपूर को हीरो के किरदार में ले चुके थे। अब हीरोइन की बारी थी। शैलेंद्र चाहते थे कि मीना कुमारी ये रोल निभाए। लेकिन वो उस वक्त बिजी चल रही थीं। ऐसे में वहीदा रहमान इस फिल्म की हीरोइन बनीं। फिल्म को बासु भट्टाचार्य ने डायरेक्ट किया। लेकिन फिल्म की एंडिंग को लेकर सभी परेशान चल रहे थे। दरअसल, प्रोड्यूसर शैलेंद्र और कहानी के असली लेखक रेणु एंडिंग में कोई बदलाव नहीं चाहते थे। कहानी के अंत में दोनों किरदार अलग हो जाते हैं। उस समय हैपी एंडिंग का जमाना था। फिल्म तीसरी कसम बनकर तैयार हुई और साल 1966 में थिएटर पर रिलीज हुई।

फ्लॉप होने का सदमा नहीं हुआ बर्दाश्त

लेकिन अफसोस ये रहा कि इतनी शानदार कहानी और परफॉरमेंस के बाद भी दुखद एंडिंग ऑडियंस को खास पसंद नहीं आई है। ये फिल्म कमर्शियली फ्लॉप साबित हुई। इस फिल्म के फ्लॉप होने का सदमा शैलेंद्र बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने इस फिल्म पर मोटे पैसे लगाए थे। शैलेंद्र सदमे में चले गए। उन्होंने फिल्मों के लिए गाने लिखना छोड़ दिया। शराब की लत में खुद को डुबो लिया और साल 1966 में ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। शैलेंद्र की मौत के अगले साल 1967 में फिल्म तीसरी कसम ने नेशनल अवॉर्ड जीता। शैलेंद्र अगर उस समय तक जीवित होते तो समझ पाते कि उन्होंने एक ऐसा सिनेमा बनाया था जो दशकों तक याद किया गया।

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