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पैरेंट्स से रिपोर्ट कार्ड छिपाने वाले बच्चे के मन में क्या चलता है, साइकोलॉजी के अनुसार कैसे डील करें?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

बच्चे के नंबर स्कूल में कम आते हैं और वो अपनी रिपोर्ट कार्ड को पैरेंट्स से  छिपा लेता है तो गुस्साने या चिल्लाने की बजाय कैसे डील करें। साइकोलॉजी और स्टडी से समझें पूरी बात।

हर बच्चे का व्यवहार अलग-अलग होता है। खासतौर पर फेलियर को एक्सेप्ट करने का उनका लेवल, जैसे उदाहरण के लिए एक बच्चा स्कूल से आने के बाद रिपोर्ट कार्ड को बैगमें छिपा देता है। वहीं दूसरा बच्चा अपने रिपोर्ट कार्ड के बारे में कोई जानकारी नहीं देता और जब पूछा जाता है तो बात बदल देता है। जबकि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो इंतजार करते हैं कि पैरेंट्स उनके रिपोर्ट कार्ड के बारे में पूछेंगे। बच्चों के इन सारे बिहेवियर के बारे में साइकोलॉजी में कहना है कि बच्चे अपने खराब स्कोर कार्ड को दिखाना नहीं चाहते लेकिन उनके लिए नंबर कम होने से ज्यादा उस रिपोर्ट कार्ड को पैरेंट्स को दिखाने पर आने वाले रिएक्शन को लेकर

परेशानी रहती है।

बच्चे फेलियर को कैसे एक्सेप्ट करेगा ये पैरेंट्स के साथ रिलेशनशिप पर निर्भर करता है

स्कूल में बच्चे मिलने वाली असफलता से कैसे डील करेंगे ये पैरेंट्स के साथ उसके रिलेशन पर डिपेंड करता है। एक बच्चे को 48 मार्क्स मिले हैं तो उसे पता है कि ये नंबर कम है लेकिन उससे भी ज्यादा स्ट्रेस इस बात का है कि माता-पिता से क्या बोलेगा। ज्यादातर पैरेंट्स बच्चों से कम नंबर आने पर पूछते हैं तुम्हारे नंबर कम क्यों है, तुम्हारे फ्रेंड्स के नंबर ज्यादा आए हैं, तुमने ठीक से पढ़ाई नहीं की, फाइनल एक्जाम में क्या होगा। पैरेंट्स के ऐसे सवालों से बचने के लिए काफी सारे बच्चे अपने पेपर ही छिपा देता है।

बच्चे का स्कूलमार्क्स उसका पर्सनल रिपोर्ट कार्ड बन जाता है

स्कूल में पढ़ाए गए सब्जेक्ट का रिपोर्ट कार्ड कई बार बच्चे का पर्सनल जजमेंट बन जाता है। बार-बार परसेंटेज, रैंक और दूसरों के साथ कंपेयर करने से बच्चे का एकेडमिक नंबर बच्चे के लिए किसी जजमेंट की तरह काम करता है। 2019 की स्टडी के मुताबिक एक बच्चा केवल ये नहीं सोचता कि उसे 55 नंबर मिले है बल्कि वो ये भी सोचता है कि पैरेंट्स उसे क्या कहेंगे या फिर पैरेंट्स उसके बारे में अब क्या सोचेंगे।

एकेडमिक प्रेशर केवल सजा के तौर पर नहीं होता

जरूरी नहीं कि पैरेंट्स अच्छे नंबर लाने के लिए बच्चों पर चिल्ला रहे या उन्हें सजा दे रहे। बल्कि कई बार जब पैरेंट्स बार-बार बच्चे को हाई मार्क्स लाने के लिए बोलते हैं या दूसरे बच्चे से तुलना करते हैं या एक्जाम के दौरान हाई एक्सपेक्टेशन दिखाते हैं तो ये भी एक प्रेशर होता है जो बच्चों को स्ट्रेस देता है।

बच्चे को जब पता हो कि पैरेंट्स गुस्सा करेंगे

बच्चे के खराब नंबर तब समस्या बन जाते हैं जब वो अपने रिपोर्ट कार्ड को दिखाता ही नही है। उदाहरण के लिए अगर एक बच्चा मैथ के पेपर को छिपा लेता है तो ऐसा नहीं कि वो अपने नंबर की परवाह नहीं करता बल्कि वो समझ नहीं पाता कि वो पैरेंट्स के सवालों को कैसे डील करेगा।

बच्चे के रिपोर्ट कार्ड को देखकर पैरेंट्स का पहला रिएक्शन

बच्चा जब अपने खराब रिपोर्ट कार्ड को दिखा रहा हो तो पैरेंट्स का पहला रिएक्शन बेहद खास होता है। अगर माता-पिता इस तरह के सवाल करते हैं जैसे तुम्हें क्या कठिन लगता है,कौन सा चैप्टर समझ नहीं आता या फिर क्या पेपर तुम्हारे अनुमान से ज्यादा कठिन आया था, अगली बार कैसे करोगे तैयारी? बच्चे की खराब परफार्मेंस को इग्नोर करने या डांटने की बजाय जब उसकी गलतियों को समझने के लिए प्रेरित किया जाता है तो बच्चे का एकडेमिक रिकार्ड इंप्रूव होता है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN