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दुनिया की अर्थव्यवस्था आगे किस दिशा में जाएगी, इसे लेकर इस समय एक तरह की खींचतान चल रही है. दो ताक़तें एक-दूसरे के बिल्कुल उलट काम कर रही हैं.
एक तरफ़ ऊर्जा संकट, व्यापारिक टकराव और असली युद्ध जैसे बार-बार सामने आने वाले संकट आर्थिक विकास को रोक रहे हैं. इसका सबसे साफ़ असर दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है, जहां ब्याज का ख़र्च तेज़ी से बढ़ा है.
दूसरी तरफ़ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पर बड़े पैमाने पर हो रहा ख़र्च अर्थव्यवस्था को रफ़्तार दे रहा है.
इसके साथ ही ख़ास तौर पर छोटी अर्थव्यवस्थाओं ने मुश्किल हालात का जिस तरह सामना किया है, वह हैरान करने वाला है. ज़रूरत के कारण तेल और गैस समेत व्यापार के नए रास्ते भी बनाए गए हैं.
आईएमएफ की बैठकों में चीन का डर साफ दिखा
इस हफ़्ते बैंकॉक में हुई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ की बैठकों में इन मुद्दों की चर्चा बार-बार हुई. दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़े बड़े फ़ैसले लेने वाले लोग भी इन पर बात करते रहे.
लेकिन उन्हें भी नहीं पता कि आगे हालात किस दिशा में जाएंगे.
फ़िलहाल यह अंदाज़ा लगाना किसी दांव से कम नहीं है कि बॉन्ड बाज़ार की नज़र अगली बार किस देश पर पड़ेगी. अभी उसका ध्यान अमेरिका और फ़्रांस पर दिखाई दे रहा है.
हालांकि, फ़्रांस के वित्त मंत्री रोलां लेस्क्योर दुनिया को बता रहे हैं कि उन्हें क़र्ज़ जुटाने में कोई परेशानी नहीं हुई. इसके लिए उन्हें पहले से ज़्यादा क़ीमत ज़रूर चुकानी पड़ी, लेकिन उनका कहना था कि उनके बजट को कोई परेशानी नहीं होगी.
उन्होंने यह भी कहा कि शायद उन्होंने विकसित देशों के समूह जी-7 को बचाने में मदद की है. एक साल पहले डोनाल्ड ट्रंप के कारण पैदा हुए तनाव के बीच इस समूह के टूटने का ख़तरा था.
एक तरह से यह चमत्कार ही है कि दुनिया में आर्थिक मंदी नहीं आई और न ही किसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था में क़र्ज़ का संकट पैदा हुआ.
थाईलैंड के वित्त मंत्री तो मेरे सामने इस बात पर गर्व कर रहे थे कि उनके देश के लिए क़र्ज़ लेने का ख़र्च बहुत कम बढ़ा है, ख़ास तौर पर अमेरिका की तुलना में.
एक और हैरान करने वाली बात यह है कि बॉन्ड बाज़ार ने ब्रिटेन को अब ‘शरारती छात्र’ मानना बंद कर दिया है. इसके उलट आईएमएफ उसे एक आदर्श छात्र बता रहा है.
आईएमएफ ने ब्रिटिश सरकार की बजट योजनाओं को उसी रूप में स्वीकार किया है, जिस रूप में उन्हें पेश किया गया. उसने इन योजनाओं पर भरोसा किया है.
असलियत यह है कि जी-7 के बाक़ी देशों को इतना भरोसा भी हासिल नहीं है. कौन बेहतर दिखाई देता है, यह तुलना पर निर्भर करता है और क़र्ज़ के मामले में तो यह बात ख़ास तौर पर लागू होती है.
ब्रिटेन के आंकड़े उम्मीद से बेहतर
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इस मौक़े ने ब्रिटेन के चांसलर जॉन हीली को अपनी बात रखने का अवसर दिया.
उन्होंने बताया कि ब्रिटेन की आर्थिक वृद्धि के वास्तविक आंकड़े लगातार उम्मीद से बेहतर रहे हैं. साल 2026 में अब तक की वृद्धि को मज़बूत कहा जा सकता है.
हीली ने मुझसे कहा कि वह इन आंकड़ों को इस बात का पहला संकेत मानते हैं कि एआई और टेक्नोलॉजी में होने वाला निवेश ब्रिटेन की आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने लगा है.
आईएमएफ की बैठकों में घूम रहे बॉन्ड बाज़ार के बड़े निवेशक भी कई वर्षों के संकट के बाद ब्रिटेन को एक बार फिर नए नज़रिए से देखते दिखाई दे रहे हैं.
लेकिन भू-राजनीतिक अस्थिरता और बॉन्ड बाज़ार को लेकर बनी अनिश्चितता के अलावा एक तीसरी बड़ी चुनौती भी सामने है.
यह चुनौती बैंकॉक की सड़कों पर भी दिखाई दी, जहां ड्राइवर इस हफ़्ते होने वाली बैठक के लिए बैंकरों और वित्त मंत्रियों को लेकर पहुंच रहे थे.
दूसरे देशों की तरह थाईलैंड ने भी चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री में आई ज़बरदस्त तेज़ी को सीधे महसूस किया है.
गाड़ियां बनाने की अपनी मज़बूत विरासत के कारण थाईलैंड को कभी-कभी ‘एशिया का डेट्रॉइट’ कहा जाता है. लेकिन अब वहां बिकने वाली लगभग एक-तिहाई गाड़ियां चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियां हैं.
इसे ‘चाइना शॉक टू’ यानी चीन से आया दूसरा बड़ा झटका कहा जा रहा है. इसका सबसे साफ़ उदाहरण उन्नत मैन्युफ़ैक्चरिंग में चीन का बहुत तेज़ी से दबदबा बनाना है.
चीन से आया पहला ऐसा झटका साल 2000 के दशक में देखने को मिला था. उस समय चीन ने बुनियादी मैन्युफ़ैक्चरिंग में अपनी जगह बनाई थी.
दुनिया चिंतित क्यों?
बदलाव की इस दूसरी बड़ी लहर के कारण पिछले कुछ महीनों में इस बात पर नए सिरे से विचार होने लगा है कि दुनिया का व्यापार किस तरह चल रहा है और आगे उसे कैसे संभाला जाएगा.
यूरोपीय संघ में इसे लेकर ख़ास चिंता है. वह चीन और यूरोप के बीच व्यापार को लेकर अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करने में जुटा है, क्योंकि फ़िलहाल यह व्यापार एकतरफ़ा रास्ते जैसा दिखाई देता है.
यूरोपीय संघ ‘मेड इन यूरोप’ उत्पादों को अतिरिक्त सुरक्षा देने के लिए जो नियम तैयार कर रहा है, उनका ब्रिटेन पर भी गहरा असर पड़ेगा.
अगर ब्रिटेन इन नए नियमों से बाहर रहता है, तो चीन अपनी ज़रूरत से ज़्यादा कारों का उत्पादन ब्रिटेन भेज सकता है. थाईलैंड की तरह ब्रिटेन में भी इस समय आयात शुल्क कम हैं और सब्सिडी भी मिलती है.
दूसरी संभावना यह है कि यूरोपीय संघ ब्रिटेन को इन नियमों में शामिल होने का न्योता दे. लेकिन इसके बदले वह ब्रिटेन से अपना आयात शुल्क बढ़ाकर यूरोपीय संघ के बराबर करने को कह सकता है.
इसके साथ ही ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के रिश्तों की एक अलग कहानी भी चल रही है.
इस हफ़्ते बैंकॉक में उम्मीद से कहीं ज़्यादा इस रिश्ते की चर्चा हुई. इसने बैठक में मौजूद लोगों का कुछ मनोरंजन भी किया.
यूरोपीय संघ के साथ ‘फ़्लर्ट’
आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा यह कहते हुए ज़ोर से हंस पड़ीं कि ब्रेग्ज़िट के बाद अलग हुए “दोनों तलाक़शुदा लोग अब फिर एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं.”
फ़िनलैंड के वित्त मंत्री ने मुझसे कहा कि ब्रिटेन, यूरोपीय संघ के साथ “फ़्लर्ट” कर रहा है.
बड़े बैंक भी ब्रिटेन की यूरोपीय संघ में वापसी की संभावना पर रिपोर्ट जारी कर रहे थे. इस संभावित वापसी को वे ‘ब्रिटर्न’ कह रहे हैं.
हालांकि, दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक साथ चल रहे कई संकटों के इस दौर से बाहर निकालने के लिए सबसे ज़्यादा भरोसा एआई में आई तेज़ी पर किया जा रहा है.
उम्मीद है कि एआई उस ट्रैम्पोलिन की तरह काम करेगा, जिसकी मदद से दुनिया की अर्थव्यवस्था इन संकटों से उछलकर बाहर निकल सकेगी.
इनमें से कई संकट राष्ट्रपति ट्रंप के फ़ैसलों से जुड़े हैं.
लेकिन एआई को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह साफ़ नहीं है.
एक कमरे में वित्त मंत्री एआई के कारण अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों की तारीफ़ करते हैं.
वहीं अगले कमरे में केंद्रीय बैंकों के अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं कि एआई बैंकिंग व्यवस्था के ज़्यादातर हिस्से की साइबर सुरक्षा को तोड़ने की ताक़त रखता है.
एआई के इर्द-गिर्द वित्तीय बाज़ार में आया उछाल हमेशा जारी नहीं रह सकता.
दुनिया के वित्तीय दिग्गज बस इस बात से राहत महसूस कर रहे हैं कि अब तक यह उछाल बना हुआ है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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