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टाटा संस लिस्टिंग मामला: RBI ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल किया केविएट, क्या हैं इसके मायने?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने टाटा संस की अनिवार्य लिस्टिंग से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट में पहले ही केविएट दाखिल कर दिया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इस मामले को लेकर अगर कोई कोर्ट जाता है, तो अदालत कोई भी आदेश पारित करने से पहले RBI को सुनवाई का मौका दे।

यह कदम आरबीआई द्वारा 11 सितंबर को टाटा संस की उस अर्जी को खारिज किए जाने के बाद उठाया गया है, जिसमें कंपनी ने स्वेच्छा से अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करके खुद को अनरजिस्टर्ड कोर इनवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC के रूप में वर्गीकृत कराने की मांग की थी। इससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के इस फैसले ने देश के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप की होल्डिंग कंपनी की सार्वजनिक लिस्टिंग का रास्ता साफ कर दिया है।

नोएल टाटा और ट्रस्टी की क्या है मंशा

द इनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा और ज्यादातर ट्रस्टी चाहते हैं कि टाटा संस एक निजी कंपनी बनी रहे। उनकी कोशिश है कि शापूरजी पल्लोनजी यानी एसपी समूह के साथ हिस्सेदारी के मोनेटाइजेशन के लिए कोई आपसी सहमति वाला समाधान खोजा जाए, बजाय इसके कि होल्डिंग कंपनी को सार्वजनिक किया जाए।

केविएट का कानूनी अर्थ क्या है

कानून के जानकारों के मुताबिक सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 148A के तहत अगर टाटा संस या उससे जुड़ा कोई पक्ष नियामक के खिलाफ कोई राहत पाने के लिए अदालत जाना चाहता है, तो उसे पहले आरबीआई को सूचना देनी होगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी आदेश पारित करने से पहले केविएट दाखिल करने वाले की सुनवाई हो। केविएट का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि बिना सुनवाई के कोई एकपक्षीय अंतरिम आदेश पारित न हो।

क्या है आरबीआई का फैसला और क्या कहते हैं नियम

पिछले सप्ताह आरबीआई ने कहा था कि 28 मार्च 2024 की टाटा संस की अर्जी और उसके बाद के पत्राचार पर विचार करने के बाद वह CoR के स्वेच्छा से समर्पण के अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकती। आरबीआई ने टाटा संस को सलाह दी है कि वह NBFC-अपर लेयर यानी NBFC-UL इकाइयों पर लागू सभी दिशानिर्देशों और निर्देशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए। इसका मतलब है कि टाटा संस आगे भी NBFC-UL इकाइयों पर लागू नियामकीय ढांचे के दायरे में बनी रहेगी।

लिमिट के दोगुनी से भी ज्यादा है एसेट्स

केंद्रीय बैंक का यह फैसला जून 2026 में उसके स्केल-आधारित नियामकीय ढांचे में संशोधन के बाद आया है। उस समय आरबीआई ने किसी इकाई को अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की एसेट्स लिमिट तय की थी। 31 मार्च 2026 तक टाटा संस की कुल संपत्ति 2.01 लाख करोड़ रुपये थी, जो इस सीमा से दोगुनी से भी ज्यादा है।

कंपनी ने पंजीकरण रद्द कराने और लिस्टिंग से बचने के लिए अपना सारा कर्ज चुका दिया था, लेकिन आरबीआई की पात्रता शर्तों के मुताबिक, केवल वे इकाइयां जो सार्वजनिक फंड नहीं रखतीं, जिनका ग्राहक इंटरफेस नहीं है और जिनकी संपत्ति 1,000 करोड़ रुपये से कम है, 31 दिसंबर तक रजिस्ट्रेशन कैंसिल कराने के लिए पात्र हो सकती हैं।

टाटा ट्रस्ट और एसपी ग्रुप की कितनी हिस्सेदारी

टाटा ट्रस्ट, सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के जरिए टाटा संस के 66% हिस्से को नियंत्रित करता है। उसने जुलाई 2025 में एक प्रस्ताव पारित कर यह इच्छा जताई थी कि होल्डिंग कंपनी निजी स्वामित्व में ही रहे। शापूरजी पल्लोनजी समूह टाटा संस का सबसे बड़ा माइनॉरिट शेयरहोल्डर है और उसके पास 18.37% हिस्सेदारी है। उसका मानना है कि लिस्टिंग ही मूल्य निकालने का सबसे व्यावहारिक तरीका है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN