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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान वैश्विक कूटनीति में एक अहम देश बनकर उभरा है.

पिछले साल मई महीने में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान अमेरिका के क़रीब हुआ है, जबकि भारत और अमेरिका के संबंधों में तनाव आया है.

लेकिन ट्रंप के बारे में कहा जाता है कि अगर उनके साथ हाँ में हाँ मिलाते हुए आप क़रीबी बढ़ाते हैं तो इसके कई ख़तरे भी हैं.

पाकिस्तान ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल की जंग ख़त्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका में है और ट्रंप कई बार पाकिस्तान के फील्ड मार्शल जनरल आसिम मुनीर की प्रशंसा भी कर चुके हैं. लेकिन सोमवार को ट्रंप ने ऐसी मांग रख दी जो पाकिस्तान के लिए रेड लाइन हो सकती है.

ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका की ओर से ईरान के मामले में बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बाद कम से कम इन सभी देशों के लिए एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य होना चाहिए. इन देशों में सऊदी अरब, क़तर और पाकिस्तान भी शामिल हैं.

ट्रंप ने अपनी ट्रुथ सोशल पोस्ट में लिखा है, ”संभव है कि एक-दो देशों के पास ऐसा न करने का कोई कारण हो. उन कारणों को स्वीकार किया जाएगा, लेकिन ज़्यादातर देशों को इसके लिए तैयार होना चाहिए ताकि ईरान के साथ यह समझौता सामान्य समझौते से कहीं अधिक ऐतिहासिक बन सके.”

”इसकी शुरुआत सऊदी अरब और क़तर के तत्काल हस्ताक्षर से होनी चाहिए और बाक़ी देशों को भी उनका अनुसरण करना चाहिए. अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें इस समझौते का हिस्सा नहीं होना चाहिए क्योंकि यह ग़लत मंशा को दर्शाएगा.

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ट्रंप की असहज करने वाली मांग

ट्रंप ने लिखा है, ”इसलिए मैं अनिवार्य रूप से अनुरोध कर रहा हूं कि सभी देश तुरंत अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करें. अगर ईरान हमारे साथ अपना समझौता साइन करता है, तो उसे भी इस वैश्विक गठबंधन का हिस्सा बनाना हमारे लिए सम्मान की बात होगी. मध्य-पूर्व तब एकजुट, शक्तिशाली और आर्थिक रूप से इतना मज़बूत होगा जैसा शायद दुनिया के किसी अन्य क्षेत्र ने कभी नहीं देखा.”

दरअसल ये देश इसराइल को स्वीकार नहीं करते हैं. इनके इसराइल से कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं. अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने 2020 में अब्राहम अकॉर्ड्स के ज़रिए यूएई, बहरीन, मोरक्को, कज़ाखस्तान और सूडान से इसराइल को मान्यता दिलाई थी. लेकिन ट्रंप चाहते हैं कि इसका दायरा और बढ़े.

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लेकिन पाकिस्तान क्या ट्रंप को नाराज़ नहीं करने के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स को स्वीकार करेगा?

थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन ने एक्स पर लिखा है, ”पाकिस्तान को लेकर पहले भी कह चुका हूँ कि ट्रंप के साथ जितना ज़्यादा काम करेंगे, उतना ही जोखिम बढ़ेगा. वह आपसे कुछ ऐसी मांग कर बैठेंगे जो आप करना नहीं चाहते हैं. जैसे अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना. उनकी गुड बुक्स में रहने का यह एक तरह का अनिवार्य जोखिम है.”

कुगलमैन ने लिखा है, ”पाकिस्तान के लिए यह मांग असहज करने वाली ज़रूर है, लेकिन उसे इससे हैरान नहीं होना चाहिए. क्या भविष्य में पाकिस्तान का रुख़ बदल सकता है, ख़ासकर तब, जब अब भी फ़लस्तीनी स्टेट अस्तित्व में न आया हो? संभव है. अगर सऊदी अरब इसमें शामिल होता है, तो पाकिस्तान पर भी अपने रुख़ पर विचार का दबाव बढ़ सकता है. लेकिन मौजूदा जनमत को देखते हुए, कोई भी पाकिस्तानी सरकार अगर इस समझौते में शामिल होती है, तो वह राजनीतिक आत्महत्या का जोखिम उठाएगी.”

कुगलमैन मानते हैं, ”अतीत में पाकिस्तान के कुछ नागरिक और सैन्य अधिकारियों के इसराइल के साथ अनौपचारिक संपर्क रहे हैं. लेकिन इस्लामाबाद ने हमेशा इसराइल को मान्यता देने को फ़लस्तीनी स्टेट की स्थापना से जोड़ा है. यह पाकिस्तान की एक बेहद कठोर और स्थायी नीति रही है. इसलिए फ़िलहाल पाकिस्तान के लिए इसमें शामिल होना लगभग असंभव विकल्प है.”

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पाकिस्तान की बढ़ी अहमियत

ईरान के साथ शांति वार्ता में पाकिस्तान की केंद्रीय भूमिका ने इस परमाणु शक्ति संपन्न दक्षिण एशियाई देश को नई कूटनीतिक अहमियत दी है. लेकिन थिंक टैंक ‘काउंसिल फोर फॉरन रिलेशन’ में भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के सीनियर फेलो सदानंद धुमे मानते हैं कि पाकिस्तान इसराइल के साथ दुश्मनी करके लंबे समय तक अमेरिका का भरोसा हासिल नहीं कर सकता है.

अमेरिका अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल में सदानंद धुमे ने 22 अप्रैल को लिखा था, ”पाकिस्तान के लिए कोई भी मुद्दा इस वैचारिक आग्रह को उतना स्पष्ट नहीं दिखाता, जितना इसराइल के प्रति पाकिस्तान की गहरी शत्रुता. मुस्लिम दुनिया में इसराइल से असहमति आम बात है, लेकिन पाकिस्तान में यह कई बार उग्र और असामान्य रूप ले लेती है.”

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सदानंद धुमे ने लिखा है, ”क़रीब 80 साल बाद भी पाकिस्तान इसराइल को मान्यता नहीं देता. हर पाकिस्तानी पासपोर्ट पर लिखा होता है, “इसराइल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों के लिए मान्य. पाकिस्तान की शुरुआत से ही पैन-इस्लामिज्म की ओर झुकाव रहा है.”

सदानंद धुमे हडसन इंस्टिट्यूट के स्कॉलर और अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी का हवाला देते हुए लिखते हैं, ”धर्म के आधार पर भारत के विभाजन की मांग ने पाकिस्तान की संस्थापक अभिजात्य राजनीति को राष्ट्र-निर्माण के हिस्से के रूप में इस्लामवादी विचार अपनाने के लिए प्रेरित किया. पाकिस्तान, जिसका अर्थ पवित्र लोगों की भूमि है, जल्द ही इस्लामवादियों और मुस्लिम श्रेष्ठतावादियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया.”

”इस सदी में दो बार पाकिस्तानी नेताओं और टिप्पणीकारों ने इसराइल को मान्यता देने के विचार पर चर्चा की. पहली बार सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में, जिन्होंने न्यूयॉर्क में यहूदी समुदाय को संबोधित करते हुए इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने के रणनीतिक लाभों की बात की थी.”

ट्रंप के इस प्रस्ताव पर पाकिस्तान में काफ़ी बहस हो रही है. पाकिस्तान के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार डॉन से अमेरिका, ब्रिटेन और यूएन में पाकिस्तान की राजदूत रहीं मलीहा लोधी ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुए कहा, “इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. यह राष्ट्रपति ट्रंप की उस आलोचना का जवाब देने की कोशिश है जो ईरान के साथ संभावित समझौते को लेकर रिपब्लिकन दक्षिणपंथ और इसराइली लॉबी की तरफ़ से हो रही है.”

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पाकिस्तान में भी बहस

उन्होंने कहा, “ऐसा कोई तरीक़ा नहीं है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब या कोई अन्य मुस्लिम देश इसराइल को मान्यता दे और अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल हो जाए. इसराइल मुस्लिम देशों के ख़िलाफ़ युद्ध में शामिल रहा है, लेबनान में हमले जारी रखे हुए है, उसने व्यावहारिक रूप से वेस्ट बैंक का विलय कर लिया है और ग़ज़ा में 70,000 से अधिक फ़लस्तीनियों की मौत के लिए ज़िम्मेदार है.”

मलीहा लोधी ने कहा, ”यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि आज का माहौल 2020 से बिल्कुल अलग है, जब यूएई और बहरीन ने इसराइल के साथ संबंध सामान्य किए थे.”

शनिवार को ट्रंप ने सऊदी, यूएई, क़तर, तुर्की, पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं से बात की थी. इसी बातचीत में ट्रंप ने इन नेताओं से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के लिए कहा.

अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट एक्सिओस ने लिखा है, ”बातचीत की जानकारी रखने वाले एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, ट्रंप ने इन नेताओं से कहा कि अब वह इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को फोन करने वाले हैं और उम्मीद जताई कि निकट भविष्य में इसराइल के नेता भी इसी कॉल का हिस्सा होंगे.”

एक्सिओस के अनुसार, ”ट्रंप ने इन नेताओं से कहा कि ईरान युद्ध के बाद वह उम्मीद करते हैं कि जो देश अभी तक अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा नहीं हैं या जिनके इसराइल के साथ संबंध नहीं हैं, वे सभी इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करें. ट्रंप की इस मांग से फोन कॉल में शामिल नेता हैरान रह गए. एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा, “फोन लाइन पर कुछ पल के लिए ख़ामोशी छा गई और फिर ट्रंप ने मज़ाक में पूछा, क्या आप लोग अब भी लाइन पर हैं?” इसके बाद ट्रंप ने नेताओं से कहा कि उनके दूत जारेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ आने वाले हफ़्तों में इस मुद्दे पर आगे बातचीत करेंगे.”

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ट्रंप की इस मांग का रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम ने समर्थन किया है. ग्राहम ने एक्स पर लिखा है, ”ईरान संघर्ष के समाधान के लिए अब्राहम अकॉर्ड के विस्तार को समझौते का हिस्सा बनाने की बात कही गई है. यह बहुत ही रणनीतिक और दूरगामी है. अगर यह सफल होता है तो हज़ारों वर्षों में मध्य-पूर्व के सबसे बड़े बदलावों में से एक साबित हो सकता है.

अगर सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देश इसराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित करते हैं, तो यह क्षेत्र उस स्तर की स्थिरता देख सकता है, जिसकी कल्पना ट्रंप से पहले शायद कभी नहीं की गई थी.

आगे चलकर यह क्षेत्रीय एकीकरण का रास्ता खोल सकता है, जिससे मध्य-पूर्व संघर्ष और अस्थिरता का “बारूद का ढेर” बनने के बजाय आर्थिक अवसरों और विकास की वैश्विक शक्ति बन सकता है. मुझे उम्मीद है कि हमारे अरब सहयोगी और इसराइल में हमारे मित्र इस पहल को अपनाएंगे और इसे सफल बनाने को प्राथमिकता देंगे क्योंकि असफलता कोई विकल्प नहीं है.”

ट्रंप के इस प्रस्ताव को लेकर सऊदी अरब का रुख़ क्या होगा, इसकी भी चर्चा हो रही है. ट्रंप के क़रीबी सहयोगी माइक इवांस ने सोमवार को इसराइल यात्रा के दौरान द यरूशलम पोस्ट से बातचीत में कहा, “जब मैंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस से बात की, तो उन्होंने मुझसे कहा कि वह आज ही इसराइल को मान्यता दे देंगे. लेकिन उनके पिता तैयार नहीं हैं.”

इसराइल समर्थक समर्थक इवांस ने यरूशलम पोस्ट से कहा, ”मेरी क्राउन प्रिंस के साथ लगभग दो घंटे लंबी बैठक हुई थी, जिसमें उनके भाई और सऊदी विदेश मंत्री भी मौजूद थे. क्राउन प्रिंस के भाई ने भी इसी तरह की राय व्यक्त की थी.”

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