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साल 1995 में लतीफ़ के शार्पशूटर शरीफ़ और एक अन्य साथी को पकड़ने के बाद पुलिस अधिकारी गीता जौहरी तीन पुलिसकर्मियों के साथ लतीफ़ के घर के बाहर खड़ी थीं.
उन्होंने अतिरिक्त सहायता के लिए पुलिस कंट्रोल रूम को फ़ोन किया. मदद के लिए दरियापुर के पोपटियावाड़ के पास एक पुलिस वैन आई, यह लतीफ़ के घर का इलाक़ा था.
लेकिन वह अंदर नहीं गई, पुलिसकर्मी अंदर जाने को तैयार नहीं थे. कारण यह था कि पुलिसकर्मियों को यकीन नहीं हो रहा था कि उन्हें सचमुच लतीफ़ के घर जाना है.
इस घटना का ज़िक्र गुजरात के जाने-माने पत्रकार प्रशांत दयाल ने अपनी पुस्तक ‘लतीफ़’ में किया है. इससे लतीफ़ के प्रभाव और पुलिस में भी उसके फैले ख़ौफ़ का अंदाज़ा लगता है.
1980 के दशक में अहमदाबाद के ‘डॉन’ अब्दुल लतीफ़ के साम्राज्य से शायद ही कोई अपरिचित होगा.
लेकिन जब लतीफ़ की बात आती है, तो ज़्यादातर लोग उनके अपराध, हत्याओं और अवैध शराब व्यापार के साम्राज्य के बारे में बात करते हैं.
लतीफ़ राजनीति में भी सक्रिय थे. उनके कई नेताओं से संबंध थे. लतीफ़ और उनके साम्राज्य का गुजरात के समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है. इस रिपोर्ट में हम इसी पर रोशनी डालने की कोशिश करेंगे.
गुजरात में ‘ध्रुवीकरण की नींव’ और लतीफ़
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गुजरात में बीजेपी पिछले 30 सालों से सत्ता में है और वहां हिंदुत्व की राजनीति हावी है.
इसके अनुसार, इन 45 सालों में हिंदू-मुस्लिम दंगों की सबसे अधिक घटनाएं गुजरात में दर्ज की गईं, जिसकी फ़्रीक्वेंसी 241 प्वाइंट दर्ज की गई.
उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा, जिसकी फ़्रीक्वेंसी 199 प्वाइंट दर्ज की गई. महाराष्ट्र में ये फ़्रीक्वेंसी 187 पॉइंट दर्ज की गई थी.
इस दौरान, हिंदू-मुस्लिम दंगों में गुजरात में शहरी आबादी में प्रति दस लाख लोगों पर 120 मौतें दर्ज की गईं, जो देश में सबसे अधिक हैं. बिहार में 80 मौतें दर्ज की गईं.
लेकिन गुजरात में धार्मिक ध्रुवीकरण में बढ़ोतरी के पीछे दंगे ही एकमात्र कारण नहीं थे.
फ़्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक प्रो. क्रिस्टोफ़ जेफ़रलो को भारत के लोकतंत्र और हिंदू राष्ट्रवाद पर अपने शोधों के लिए जाना जाता है.
उन्होंने अपनी किताब ‘गुजरात अंडर मोदी: द ब्लूप्रिंट ऑफ़ टुडेज़ इंडिया’ में गुजरात के उस दौर के बारे में लिखा है-
“शराब की अवैध बिक्री में शामिल मुस्लिम माफ़ियाओं का भी इसमें योगदान है. गुजरात में शराबबंदी के कारण शराब का अवैध व्यापार फला-फूला. पुलिस की ओर से की जाने वाली जबरन वसूली ने इस व्यापार को और बढ़ावा दिया.”
जेएनयू के प्रोफ़ेसर रहे 86 वर्षीय घनश्याम शाह गुजरात के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास के प्रतिष्ठित अकादमिक हैं.
साल 1969 के दंगों के बाद घनश्याम शाह ने लिखा था, “गुजरात में यह व्यापक रूप से माना जाता था कि राज्य के ‘अधिकतर गुंडे’ मुस्लिम समुदाय से थे.”
उन्होंने यह भी लिखा, “कहा जाता है कि ‘ये गुंडे’ आम नागरिकों को परेशान करते थे, लेकिन सरकार ने उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उन्हें कुछ कांग्रेसी नेताओं का संरक्षण प्राप्त था और ये गुंडे उनके लिए वोट ला रहे थे.”
“इन गुंडों के पुलिस से भी संबंध होने के कारण आम हिंदुओं के मन में यह भावना पैदा हो गई थी कि वे मुस्लिम समुदाय से आने वाले ऐसे तत्वों के खिलाफ़ असहाय हैं.”
इसी संदर्भ में अक्सर अब्दुल लतीफ़ का नाम लिया जाता है. लतीफ़ का जन्म 1951 में अहमदाबाद के पुराने शहर (ओल्ड सिटी) क्षेत्र में एक गरीब परिवार में हुआ था.
लतीफ़, दाऊद इब्राहिम के गिरोह का सदस्य भी था. उस पर तस्करी, हत्या और अपहरण जैसे कई मामले दर्ज थे.
उसका मूल धंधा अवैध शराब की बिक्री और सप्लाई का था, जिससे वह खूब पैसा कमाता था. 1980 के बाद के वर्षों में लतीफ़ का प्रभाव और बढ़ गया.
उस समय गुजरात में कांग्रेस की सरकार थी.
1985 के दंगों के दौरान, उसने मुस्लिम समुदाय के गरीब लोगों को आवश्यक भोजन और सहायता प्रदान की. इसके अलावा, उसने कई और चैरिटी वर्क शुरू किए थे.
प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़ जेफ़रलॉ लिखते हैं, “अहमदाबाद ओल्ड सिटी के मुसलमानों के लिए वह एक लोकल रॉबिनहुड बन गया था. उसके प्रति मुसलमानों के बीच सहानुभूति थी.”
“उस समय कहा जाता था कि पुलिस, सरकारी व्यवस्था और कुछ हद तक सरकार भी लतीफ़ के खिलाफ़ कुछ नहीं कर सकती थी.”
लतीफ़ ने जेल से ही पांच सीटों पर चुनाव जीता
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1987 में अहमदाबाद नगर निगम के चुनाव हुए. तब तक लतीफ़ का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि उन्होंने पांच वार्डों दरियापुर, कालूपुर, दानीलीमड़ा, जमालपुर और रायखड़ से स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा. तब वह जेल में थे.
नतीजे आने पर लतीफ़ पांचों सीटों पर विजयी थे, फिर नियमानुसार उसने बाकी चार सीटें छोड़ दीं.
गुजरात के खोजी वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल अपनी किताब ‘लतीफ़’ में लिखते हैं, “सार्वजनिक रूप से लतीफ़ को भला-बुरा कहने वाले बीजेपी नेताओं ने लतीफ़ के साथ समझौते किए और ऐसी सीटें खाली करवाईं, जिससे बीजेपी को लाभ हो सके. कालुपुर से बीजेपी की भामिनी पटेल और रायखड़ से बीजेपी के गुरुप्रसाद नायडू जीते. इस तरह, नगर निगम बोर्ड में बीजेपी के नंबर बढ़े.”
इसी चुनाव में बीजेपी ने पहली बार अहमदाबाद नगर निगम में सत्ता हासिल की थी.
प्रोफ़ेसर जेफ़रलो लिखते हैं, “बीजेपी ने लतीफ़ की राजनीतिक सक्रियता का इस्तेमाल गुजरात की राजनीति को ध्रुवीकृत करने में किया, और यह सब कांग्रेस की कीमत पर हुआ. क्योंकि कई मुसलमानों को कांग्रेस पर भी भरोसा नहीं था. इस रणनीति को पहली बार 1987 के नगरपालिका चुनावों में आज़माया गया था.”
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार और गुजरात की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लंबे समय से लिखते रहे विष्णु पंड्या इस बात से असहमत हैं.
उनका मानना है कि गुजरात की राजनीति में अब्दुल लतीफ़ का अध्याय उतना निर्णायक या बड़ा नहीं था, जितना अक्सर प्रस्तुत किया जाता है.
वो कहते हैं, “गुजरात की राजनीति में गुंडों, माफिया सरगनाओं और शराब तस्करों का प्रभाव काफी पहले से रहा है. 1985 के आसपास अहमदाबाद की स्थिति ऐसी थी कि शहर के प्रमुख इलाकों में खुलेआम माफिया गिरोहों के बीच गोलीबारी होती थी. हालांकि, पिछले कुछ सालों में गुजरात में अपेक्षाकृत शांति स्थापित हुई है.”
पंड्या का मानना है कि यह कहना उचित नहीं होगा कि लतीफ़ की चुनावी उम्मीदवारी से भारतीय जनता पार्टी को कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ मिला.
उनके अनुसार, लतीफ़ ने चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था, इसलिए यह तर्क कि उसकी उम्मीदवारी से बीजेपी को फायदा हुआ, उन्हें तार्किक नहीं लगता.
वो इस दावे से भी सहमत नहीं हैं कि लतीफ़ की मौजूदगी या गतिविधियों के कारण समाज में ध्रुवीकरण हुआ और बीजेपी ने उसका राजनीतिक लाभ उठाया.
विष्णु पंड्या कहते है, “किसी एक माफिया को ख़त्म कर देने से ध्रुवीकरण नहीं हो सकता है. ध्रुवीकरण दंगों से होता है. गुजरात में 1969 और 2002 में बड़े दंगे हुए थे. गुजरात के लोगों में इसी वजह से ध्रुवीकरण हुआ. इसमें राजनीतिक पार्टियों का रोल नहीं था.”
उन्होंने लिखा, “बीजेपी ने लतीफ़ को और इस तरह पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना शुरू कर दिया और चुनावों में ‘रामराज’ के मुकाबले ‘लतीफ़राज’ का मॉडल पेश करने की कोशिश की. यही 1987 के चुनावों में बीजेपी की जीत का एक प्रमुख कारण था.”
चुनाव परिणाम आए और अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने 127 में से 67 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 30 सीटें मिलीं.
पत्रकार प्रशांत दयाल लिखते हैं, “लतीफ़ के खिलाफ़ कार्रवाई करने में कांग्रेस नेताओं की ढिलाई को लेकर जनता का असंतोष बढ़ता जा रहा था. कांग्रेस नेताओं को लगा कि कार्रवाई से मुसलमान नाराज़ होंगे. वे राजनीतिक गणना करने में विफल रहे और यह नहीं समझ पाए कि इससे हिंदू मतदाता उनसे दूर हो रहे हैं. उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि बीजेपी जो कि सिर्फ पांच-सात साल पहले 1980 में अस्तित्व में आई थी, इसका फायदा उठा ले जाएगी.”
फिर, 1989 के अंत तक बीजेपी ने शहरी क्षेत्रों में इतनी मज़बूत पकड़ बना ली थी कि उसने सूरत, राजकोट और वडोदरा नगर निगम के चुनाव भी जीत लिए थे.
प्रशांत दयाल लिखते हैं, “अहमदाबाद में सांप्रदायिक दंगों के दौरान, बीजेपी के सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने अहमदाबाद ओल्ड सिटी क्षेत्र (पूर्वी अहमदाबाद) में अपनी पकड़ मज़बूत करना शुरू कर दिया था. बीजेपी को इससे लाभ मिल रहा था.”
“हालांकि, बीजेपी के नेताओं को भी विश्वास नहीं था कि बीजेपी कभी सत्ता में आएगी. लेकिन 1985 के दंगों और कांग्रेस की ग़लतियां उसे शक्तिशाली बना रही थीं.”
“एक और बात थी कि अशोक भट्ट सहित कई बीजेपी नेता यही ओल्ड सिटी इलाके में रहते थे. उनका जनता से रोज़ाना संपर्क होता था. उस समय आम मतदाताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही थी कि बीजेपी हिंदुओं की पार्टी है और कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है.”
हालांकि, कई कांग्रेस नेताओं ने भी लतीफ़ का विरोध किया था. सबसे मुखर विरोध कालूपुर में रहने वाले कांग्रेस सांसद रऊफ़ वलीउल्लाह ने किया. इस सांसद की भी एक अंडरवर्ल्ड गिरोह के सदस्यों ने हत्या कर दी थी.
प्रशांत दयाल लिखते हैं कि कांग्रेस नेता और पूर्व गृह मंत्री सीडी पटेल को भी लतीफ़ से नाराज़गी थी.
बीजेपी ने घर-घर जाकर कहा, ‘लतीफ़ को मत भूलना’
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1987 में मिली सफलता के बाद, बीजेपी ने इस मुद्दे को और अधिक प्रमुखता देना शुरू कर दिया. इसका इस्तेमाल 1990 के विधानसभा चुनावों में भी किया गया.
बीजेपी ने 182 सीटों में से 67 सीटें ही जीत पाई और बहुमत से चूक गई.
प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़ जेफ़रलो लिखते हैं, “1993 में अहमदाबाद की एलिसब्रिज सीट पर हुए उपचुनाव में भी यही ‘मोडस ऑपरेन्डी’ अपनाई गई. बीजेपी के उम्मीदवार ‘राइजिंग स्टार’ हरेन पंड्या थे और उनके चुनाव अभियान का संचालन नरेंद्र मोदी कर रहे थे. उस समय मोदी गुजरात बीजेपी के संगठनात्मक सचिव थे.”
कांग्रेस ने हरेन पंड्या के खिलाफ़ उद्योगपति लालचंद देवचंद को मैदान में उतारा.
“चीमनभाई पटेल इस चुनाव में हरेन पांड्या को हराना चाहते थे. जबकि वे खुद लतीफ़ के करीबी थे और नरेंद्र मोदी को उनकी ये ‘कमज़ोरी’ पता चल गई थी.”
जेफ़रलो लिखते हैं, “घर-घर जाकर चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी कार्यकर्ता कहते थे, ‘वोट डालने जाते समय लतीफ़ को मत भूलना.’ इस तरह वे लोगों को उसकी अवैध गतिविधियों, जबरन वसूली आदि की याद दिलाते थे.”
यह सीट जनता पार्टी के पास थी. उपचुनाव में चौंकाने वाला परिणाम आया और हरेन पांड्या ने 48 हज़ार वोटों से जीत हासिल की.
इस जीत के बाद ऐसा लगा मानो बीजेपी को गुजरात में जीत हासिल करने का एक नया मॉडल मिल गया हो, और उसके बाद भी उसके प्रयोग जारी रहे.
1995 के विधानसभा चुनावों में एक बड़ा प्रयोग
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लतीफ़ के पाकिस्तान भाग जाने के बाद, कांग्रेस के छबीलदास मेहता मुख्यमंत्री बने. 1995 के विधानसभा चुनाव बस आने ही वाले थे.
वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल लिखते हैं, “कांग्रेस के कुछ नेता लतीफ़ के खिलाफ़ कड़ा रुख अपना रहे थे, लेकिन यह सब बंद दरवाज़ों के पीछे हो रहा था. आम लोगों को यह लगने लगा था कि कांग्रेस की वजह से अहमदाबाद और गुजरात में हिंदुओं को परेशानी झेलनी पड़ रही है. मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग भी कांग्रेस से दूर होता जा रहा था.”
प्रोफ़ेसर जेफ़रलॉ लिखते हैं, “एलिसब्रिज उपचुनाव ने 1995 के विधानसभा चुनावों के लिए एक खाका प्रदान किया.”
1995 विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान, बीजेपी ने कांग्रेस नेताओं और लतीफ़ के बीच संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया.
वह लिखते हैं, “उदाहरण के लिए, कांग्रेस के मुस्लिम विधायक मोहम्मद हुसैन बारेज और लतीफ़ के बीच संबंधों को लेकर काफ़ी चर्चा हुई थी. उन्हें कांग्रेस के चिमनभाई गुट का हिस्सा माना जाता था.”
प्रशांत दयाल लिखते हैं, “विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान, अशोक भट्ट समेत बीजेपी नेता लतीफ़ के उभार के लिए कांग्रेस को दोषी ठहरा रहे थे. मुद्दा लतीफ़ था, लेकिन सीधे तौर पर कहे बिना, पूरे मुस्लिम समुदाय को दोषी ठहराया जा रहा था.”
“हिंदुओं को लग रहा था कि इस पूरी स्थिति में अगर कोई उनका तारणहार है, तो वह बीजेपी ही है. यह पहला विधानसभा चुनाव था जिसमें बीजेपी ने जनता के मन में जो धारणाएं बिठाई थीं, उनकी असली परीक्षा होने वाली थी.”
उन्होंने लिखा, “1995 के चुनावों में बीजेपी के सामने कोई वास्तविक मुद्दा नहीं था, लेकिन उनके पास लतीफ़ था. उन्होंने कांग्रेस को लतीफ़ की पार्टी के रूप में, यानी ‘मुसलमानों की पार्टी’ के रूप में पेश किया.”
लतीफ़ 1995 के चुनावों के दौरान भारत में नहीं था, और पाकिस्तान भाग गया था.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, लतीफ़ और दाऊद इब्राहिम का ‘कांग्रेस के साथ संबंधों’ का ज़िक्र किए बिना किसी भी बीजेपी नेता का चुनावी भाषण पूरा नहीं होता था.
गुजरात के एक सेवानिवृत्त डीजीपी ने यहां तक कहा, “यह कहना गलत नहीं होगा कि अब्दुल लतीफ़ ने गुजरात में बीजेपी के सत्ता में आने की नींव रखी.”
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सेवानिवृत्त आईपीएस आरबी श्रीकुमार अपनी किताब ‘ गुजरात बिहाइंड द कर्टन’ में लिखते हैं, “1984 से गुजरात में संघ परिवार के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल होती जा रही थीं. आरक्षण विरोधी आंदोलन, मुस्लिम विरोधी हिंसा में तब्दील हो गए.”
“कांग्रेस के पारंपरिक मतदाता बीजेपी की ओर आकर्षित होते रहे. 1995 में बीजेपी की जीत के बाद संघ परिवार ने अपने सांप्रदायिकरण और भगवाकरण कार्यक्रमों को तेज़ कर दिया. परिणामस्वरूप, पाटीदार जैसे आबादी के बड़े वर्ग बीजेपी की ओर आकर्षित हुए.”
वो लिखते हैं, “राम जन्मभूमि आंदोलन, आडवाणी की रथ यात्रा, कश्मीरी पंडित मुद्दा, बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद हुए दंगे, गुजरात के अहमदाबाद जैसे शहरों में अब्दुल लतीफ़ जैसे मुस्लिम अपराधियों का उदय आदि जैसी घटनाओं ने परंपरागत रूप से धर्मनिरपेक्ष आबादी के एक बड़े हिस्से को हिंदू बहुसंख्यकवाद की ओर धकेल दिया. इसका राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ा.”
1995 के चुनावों में, बीजेपी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की, 121 सीटें जीतीं और कांग्रेस 45 सीटों तक सिमट गई.
प्रशांत दयाल लिखते हैं, “इस जीत के बाद भी जनता का ध्यान बीजेपी के साइंटिस्ट नरेंद्र मोदी की ओर नहीं गया था, जिन्होंने ‘हिंदू-मुस्लिम वोटों को ध्रुवीकृत करने में’ अहम भूमिका निभाई थी.”
“मात्र पांच सालों में नरेंद्र मोदी ने राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाकर और लतीफ़ के खिलाफ़ अभियान चलाकर कांग्रेस का सफाया कर दिया था. यह उनका पहला बड़ा प्रयोग था जिसमें वे सफल रहे.”
इस दावे पर बीजेपी का पक्ष जानने के लिए गुजरात में पार्टी के मुख्य प्रवक्ता से बात की. मगर उन्होंने इन पर कोई प्रतिक्रिया देने से साफ़ इनकार कर दिया.
लतीफ़ की गिरफ्तारी, मृत्यु और उसके बाद की राजनीति
जब केशुभाई पटेल ने 1996 में लतीफ़ को गिरफ्तार किया था, तब बीजेपी ने कई ज़िलों में केशुभाई को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में सम्मानित किया था.
हालांकि, लतीफ़ के नाम पर वोट मांगकर बनाई गई सरकार ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाई और बीजेपी के भीतर आंतरिक विद्रोह के कारण शंकरसिंह वाघेला सत्ता में आए.
शंकरसिंह की राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) और कांग्रेस गठबंधन सरकार के कार्यकाल के दौरान नवंबर 1997 में एक कथित पुलिस मुठभेड़ में लतीफ़ की मौत हो गई थी.
प्रशांत दयाल लिखते हैं, “लतीफ़ की मौत के बाद अहमदाबाद में दंगे भड़कने की पुलिस की आशंका गलत साबित हुई. इसका कारण यह भी था कि सांप्रदायिक नेता के रूप में उभरे लतीफ़ ने कई मुसलमानों से भी जबरन वसूली की थी. उनके जाने से हिंदू और मुस्लिम दोनों क्षेत्रों में शांति महसूस की गई.”
“लेकिन लतीफ़ नाम के एक व्यक्ति की वजह से अहमदाबाद के हिंदू और मुसलमानों के बीच एक ऐसी खाई पैदा हो गई जिसे शायद एक सदी तक पाटा नहीं जा सकता. उस खाई को चौड़ा करने में राजनीतिक दलों ने अहम भूमिका निभाई.”
प्रोफ़ेसर जेफ़रलो लिखते हैं, “लतीफ़ की मृत्यु 1997 में हुई, लेकिन जब तक लतीफ़ के गैंग सक्रिय रहे, बीजेपी ने गुजराती समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करना जारी रखा और भय की राजनीति को कायम रखा.”
उनका कहना है कि 1990 के दशक में बीजेपी की विधानसभा चुनाव जीतने के कई कारणों में से एक गुजरात का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण था.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

SOURCE : BBC NEWS




