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हेलीकॉप्टर सीधे ज्वालामुखी में जा गिरा, उबलते लावे के बीच कैसे बिताई पूरी रात?

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Source :- BBC INDIA

ये घटना 1992 की है

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हवा में उड़ते हुए किसी विमान का सीधे धधकते ज्वालामुखी में गिर जाना अपने आप में एक भयावह हादसा है. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या उस विमान में सवार लोगों के साथ इससे भी ज़्यादा डरावनी घटना हो सकती है?

हाँ, बिल्कुल हो सकती है.

कल्पना कीजिए कि हादसे के बाद पूरी रात आपको उसी ज्वालामुखी के क्रेटर में बितानी पड़े, जहां आपके पैरों के ठीक नीचे उबलता हुआ लावा बह रहा हो. यह किसी भी विमान दुर्घटना से कहीं ज़्यादा भयावह और रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव होगा.

यह कहानी नवंबर 1992 की है.

हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्मों ‘टाइटैनिक’ और ‘टर्मिनेटर 2’ के विजुअल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) टीम के सदस्य क्रिस डट्टी अमेरिका के हवाई राज्य के ‘बिग आइलैंड’ पर एक नई हॉलीवुड फ़िल्म की शूटिंग के लिए हेलीकॉप्टर से उड़ान भर रहे थे.

हेलीकॉप्टर में उनके साथ पायलट ग्रेग हॉस्किंग और कैमरा असिस्टेंट माइक बेनसन भी मौजूद थे.

घने भाप के बादलों के बीच उड़ान भरते समय उनका हेलीकॉप्टर बदकिस्मती से एक चट्टान से टकरा गया. अगले ही पल इंजन पूरी तरह बंद हो गया और नियंत्रण खो चुका हेलीकॉप्टर सीधे धधकते ज्वालामुखी के क्रेटर में जा गिरा.

हेलीकॉप्टर धधकते ज्वालामुखी में गिरा था

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क्रिस डट्टी ने बाद में उस पल को याद करते हुए कहा, “हम हेलीकॉप्टर से फिल्म ‘सिल्वर’ के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग कर रहे थे. नज़़ारा बेहद शानदार था. किलाउएआ ज्वालामुखी से निकलता उबलता हुआ लावा सीधे समंदर के पानी से मिल रहा था और उससे उठने वाला सफेद धुएं का विशाल गुबार आसमान तक फैल रहा था.”

उन्होंने कहा, “उस वक्त मैंने मन ही मन सोचा था, ‘यकीन नहीं होता कि मुझे इस शानदार काम के लिए पैसे मिलते हैं. दुनिया में इससे बेहतरीन नौकरी शायद ही कोई होगी.'”

क्रिस डट्टी ने बताया, “वह शनिवार की सुबह थी. एक बड़ा तूफान तेजी से हमारी ओर बढ़ रहा था, इसलिए हमारे पास शूटिंग पूरी करने के लिए सिर्फ़ दो-तीन घंटे का समय था.”

उन्होंने कहा कि फिल्म के उस दृश्य में मुख्य कलाकारों को ज्वालामुखी के ऊपर से उड़ते हुए धीरे-धीरे दृश्य से गायब होते दिखाना था.

क्रिस के मुताबिक, “माइक कैमरे में रिकॉर्ड हुए शॉट को स्क्रीन पर देखकर बोला, ‘हम इससे भी बेहतर शॉट ले सकते हैं.’ और ठीक उसी पल सब कुछ हमारे नियंत्रण से बाहर हो गया.”

क्रिस डट्टी बताते हैं, “जब हम दोबारा ज्वालामुखी की ओर बढ़े तो उससे धुएं के बड़े-बड़े गुबार निकल रहे थे. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, धुआं इतना घना होता गया कि हमारे सामने कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया. तभी अचानक हेलीकॉप्टर का पिछला हिस्सा जोर-जोर से हिलने लगा.”

“हे भगवान!” पायलट ग्रेग हॉस्किंग घबराकर चिल्लाए.

“जब मैंने ऊपर देखा तो चारों तरफ सिर्फ़ सफेदी ही सफेदी थी, जैसे हम बादलों के भीतर हों. तभी ग्रेग फिर चिल्लाए, ‘हम गिरने वाले हैं!'”

क्रिस बताते हैं कि हेलीकॉप्टर के रोटर ब्लेड एक सीधी खड़ी चट्टान से टकरा गए और टूटकर बिखर गए. इसके बाद हेलीकॉप्टर पूरी तरह नियंत्रण खो बैठा और तेजी से नीचे गिर गया.

क्रिस डट्टी एक अभिनेत्री के साथ

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टक्कर इतनी भीषण थी कि ग्रेग और कैमरा असिस्टेंट माइक बेनसन अपनी सीटों से उछल गए. हेलीकॉप्टर ने उन्हें जोरदार टक्कर मारी और वे बाहर की ओर जा गिरे. ग्रेग के सिर में गंभीर चोट लगी थी और आंख के पास गहरा घाव होने के कारण लगातार खून बह रहा था.

हम किसी तरह हेलीकॉप्टर से बाहर निकले और चारों ओर देखा. हेलीकॉप्टर के रोटर ब्लेड गायब थे और उसका पिछला हिस्सा टूटकर अलग हो चुका था.

वहां जहरीली गैसों की मात्रा इतनी अधिक थी कि सांस लेना बेहद मुश्किल हो रहा था. सल्फर की तीखी गैस से सीने में जकड़न और आंखों में तेज जलन हो रही थी.

कुछ देर बाद जब शुरुआती सदमे से उबरे तो मैंने चारों ओर देखा और पूछा, “क्या हम किसी ज्वालामुखी के अंदर फंस गए हैं?”

ग्रेग ने जवाब दिया, “हां।”

मैंने अगला सवाल किया, “क्या किसी को पता है कि हमारे साथ हादसा हो गया है?”

ज्वालामुखी के भीतर कैद जिस क्रेटर में हम गिरे थे, वह किसी फुटबॉल मैदान से कई गुना बड़ा और बेहद गहरा था.

हम ज्वालामुखी की ऊपरी सतह से करीब 100 मीटर नीचे फंसे हुए थे. किसी भी तरह वहां से बाहर निकलना ज़रूरी था.

हमने ऊपर चढ़ने की कोशिश शुरू की, लेकिन यह बेहद कठिन था. लावा के ठंडा होकर बने पत्थर हल्का-सा दबाव पड़ते ही टूटकर नीचे गिर जाते थे. उनकी धार चाकू की तरह तेज थी. उन पर चलना ऐसा था मानो टूटे हुए कांच के टुकड़ों पर रेंग रहे हों.

मैं करीब आधी चढ़ाई तक पहुंच गया, लेकिन उसके बाद आगे बढ़ना लगभग असंभव लगने लगा.

मैंने नीचे खड़े माइक और ग्रेग से जोर से कहा, “मैं यहीं रुक रहा हूं. अब और ऊपर नहीं चढ़ सकता. यह बहुत खतरनाक है.”

सभी हेलीकॉप्टर वहाँ से चले गए

आखिरकार मैं मुश्किल से करीब एक मीटर चौड़ी चट्टान की एक छोटी-सी जगह पर टिक पाया.

ग्रेग ने कहा, “घबराओ मत. पहले हमें कोई योजना बनानी होगी.”

मैंने पूछा, “क्या किसी को पता है कि हमारा एक्सीडेंट हुआ है? क्या किसी को इसकी ख़बर मिली होगी?”

दोनों ने जवाब दिया, “नहीं… किसी को कुछ पता नहीं होगा।”

ग्रेग बोले, “थोड़ी देर आराम करते हैं, फिर यहां से निकलने का रास्ता सोचेंगे.”

मदद के लिए ‘मे-डे’ कॉल

ग्रेग ने फ़ैसला किया कि वह वापस हेलीकॉप्टर तक जाएंगे, रेडियो ठीक करने की कोशिश करेंगे और मदद के लिए संदेश भेजेंगे.

रेडियो चालू करते ही उन्होंने लगातार पुकारना शुरू किया, “मे-डे… मे-डे… मे-डे…”

संभावित हवाई हादसे की स्थिति में आपातकालीन सहायता संकेत के लिए इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाता है.

लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें तेज खांसी आने लगी.

वह बार-बार कह रहे थे, “मैं सांस नहीं ले पा रहा… बिल्कुल सांस नहीं ले पा रहा…”

इसके बाद उन्हें उल्टियां होने लगीं और लगातार खांसी आने लगी. उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वे लगभग बेहोश होने की स्थिति में पहुंच गए.

इसी दौरान हमें ऊपर आसमान में कुछ हेलीकॉप्टरों की आवाज सुनाई दी. उनमें से एक तो काफी करीब भी आ गया था.

लेकिन थोड़ी देर बाद सभी हेलीकॉप्टर वहां से चले गए.

ग्रेग की ओर से भी कोई जवाब नहीं आ रहा था. हमें लगा कि उनके साथ शायद कुछ बहुत बुरा हो गया है.

100 मीटर गहरी खाई में उम्मीद की किरण

उस समय ऐसा लग रहा था कि अब बच निकलने की लगभग सारी उम्मीद खत्म हो चुकी है. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम मौत के दरवाजे तक पहुंच चुके हों.

फिर भी मेरे और माइक के मन में उम्मीद की एक छोटी-सी किरण बाकी थी, क्योंकि बचाव दल को यह पता था कि हम किस इलाके में शूटिंग कर रहे थे. कुछ समय बाद जमीन के रास्ते खोजबीन कर रही एक रेस्क्यू टीम ज्वालामुखी के ऊपरी किनारे तक पहुंच गई.

ऊपर से उन्होंने जोर से आवाज लगाई, “हम आपको बचाने की कोशिश कर रहे हैं!”

उनकी आवाज सुनकर हमारे मन में फिर उम्मीद जागी. उन्होंने कहा, “हम आपके पास रस्सी नीचे फेंकने की कोशिश कर रहे हैं.”

लेकिन तेज हवा के कारण रस्सी उड़कर हमसे काफी दूर गिर गई.

मैंने ऊपर चिल्लाकर कहा, “उसे छह मीटर दाईं ओर फेंकिए!”

वे बार-बार रस्सी ऊपर खींचते और दोबारा नीचे डालते रहे.

हर बार रस्सी हमारे थोड़ा और करीब आती, लेकिन इतनी नहीं कि हम उसे पकड़ सकें.

अगर मुझे उसे पकड़ना होता, तो मुझे हवा में छलांग लगानी पड़ती…

और मेरे ठीक नीचे 100 मीटर गहरी खाई थी.

इसी दौरान ज्वालामुखी के क्रेटर में घने बादल उतर आए और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. बारिश इतनी तेज थी कि रस्सी हमारी नज़रों से ओझल हो गई. उसके बाद बचाव दल ने दोबारा रस्सी नीचे नहीं डाली.

आधा घंटा बीत गया…

फिर एक घंटा बीत गया…

लेकिन ऊपर से न कोई आवाज़ आई, न कोई जवाब.

हमें बिल्कुल नहीं पता था कि ऊपर आखिर हो क्या रहा था.

चारों ओर धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा. एक और घंटा बीत गया और मेरा डर लगातार बढ़ता जा रहा था.

मैंने मन ही मन कहा, “हे भगवान! यह सच नहीं हो सकता. कुछ बहुत गलत हो रहा है.”

तभी ऊपर खड़े बचाव दल के लोगों ने हमें आवाज़ लगाई.

“हम आज के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन रोक रहे हैं. सुबह फिर आएंगे और आपको बाहर निकालेंगे. चिंता मत कीजिए.”

मैं सन्न रह गया.

“क्या? हमें पूरी रात इस धधकते ज्वालामुखी के अंदर ही बितानी पड़ेगी?”

बचाव दल ने ज्वालामुखी के किनारे अपने टेंट लगा लिए. उन्होंने बताया कि वे हर घंटे हमारी स्थिति जानने की कोशिश करेंगे. वे सीटी बजाएंगे और हमें जवाब में सीटी बजाकर बताना होगा कि हम अभी भी ज़िंदा हैं.

मैं और माइक उसी संकरी चट्टान पर बैठे रहे.

मैंने अपना स्वेटर सिर तक खींच लिया, बेसबॉल कैप पहन ली और दोनों को इस तरह लगाया कि सिर के ऊपर एक छोटी-सी ढाल बन जाए. मैं जितनी देर हो सके आंखें बंद रखने और धीरे-धीरे सांस लेने की कोशिश कर रहा था.

हमारे पास इंतज़ार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. बस यही दुआ कर रहे थे कि जिस छोटी-सी चट्टान पर हम बैठे हैं, वह टूटकर नीचे न गिर जाए.

मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था- “आख़िर हम यहां अगले 12 घंटे कैसे जिंदा रहेंगे?”

वहां ताज़ी हवा बिल्कुल नहीं थी. सल्फर डाइऑक्साइड से भरी जहरीली गैस हमारी सांसों के साथ शरीर में जा रही थी और आंखों में असहनीय जलन हो रही थी.

एक पल ऐसा भी आया जब मुझे लगा- “बस… अब सब खत्म हो गया. शायद मेरी ज़िंदगी का अंत यहीं होने वाला है.”

मेरे मन में पूरी तरह निराशा भर चुकी थी, लेकिन माइक लगातार मेरा हौसला बढ़ाता रहा.

वह बार-बार कहता, “मैं तुम्हारे साथ हूं. हम दोनों बात करते रहेंगे… एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहेंगे.”

वह रात बेहद काली और डरावनी थी.

मूसलाधार बारिश हो रही थी. तेज़ हवाएं चल रही थीं. मैं पूरी तरह भीग चुका था. कड़ाके की ठंड से मेरा शरीर कांप रहा था और उस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था.

मैं किसी भी हालत में आराम से बैठ नहीं पा रहा था. उस रात मैं एक पल के लिए भी नहीं सोया.

डर था कि अगर आंख लग गई या शरीर ज़रा-सा भी ढीला पड़ा, तो मैं सीधे 100 मीटर गहरी खाई में गिर जाऊंगा.

मैंने मन ही मन अपने परिवार से बातें कीं. सबको अलविदा कहा.

मुझे बिल्कुल भी भरोसा नहीं था कि मैं इस भयावह रात से बचकर निकल पाऊंगा.

धुएं और भाप के बीच नीचे उबलते लावे का रंग लगातार बदल रहा था- कभी लाल, कभी केसरिया और कभी चमकीला पीला.

इसी बीच मुझे एक अजीब-सी आवाज़ सुनाई देने लगी.

आज तक मुझे नहीं पता कि वह क्या थी, लेकिन वह आवाज़ ऐसी लग रही थी जैसे कोई भारी विशाल जानवर अपना विशाल जबड़ा चटका रहा हो.

वह आवाज़ ज्वालामुखी की गहराइयों से बार-बार गूंज रही थी. हर बार उसे सुनकर रूह कांप उठती थी.

मेरे चारों ओर लगातार बड़े-बड़े पत्थर गिर रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं.

डर के मारे मेरी दोनों मुट्ठियां कसकर भींची हुई थी.

उस समय मेरे सामने सिर्फ़ एक ही लक्ष्य था- किसी भी तरह अपनी जान बचानी है.

इसी उम्मीद और जिद के सहारे मैं पूरी रात उसी संकरी चट्टान से चिपका बैठा रहा- ठंड से कांपते हुए, मौत को अपने बेहद करीब महसूस करते हुए.

सुबह होते ही बचाव दल फिर लौट आया. लेकिन बारिश पहले से भी तेज़ हो चुकी थी और घने कोहरे के कारण कुछ मीटर आगे तक भी दिखाई नहीं दे रहा था.

दोपहर हो गई, लेकिन हम अब भी वहीं फंसे हुए थे. ऊपर हेलीकॉप्टरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी और नीचे से रेस्क्यू टीम की पुकार भी सुनाई पड़ रही थी. लेकिन चट्टान के किनारे बड़ी दरार पड़ चुकी थी. उन्हें डर था कि अगर वे आगे बढ़े, तो मिट्टी और चट्टान धंस सकती है.

मेरी हालत लगातार बिगड़ रही थी. मेरा गला इतना सूज चुका था कि मैं अपनी लार तक नहीं निगल पा रहा था. आंखों में असहनीय जलन हो रही थी.

फिर भी मैंने खुद ही बाहर निकलने की कोशिश करने का फैसला किया.

मैंने माइक से कहा, “अगर मुझे ऊपर जाने का कोई रास्ता मिल गया, तो मैं खुद निकलने की कोशिश करूंगा. मैं यहां एक और रात नहीं बिता सकता.”

लेकिन माइक ने मुझे शांत करते हुए कहा, “नहीं… ऊपर मत जाओ. बचाव दल हमें निकाल ही लेगा.”

ज्वालामुखी

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उसी समय अचानक बादल कुछ देर के लिए हट गए और सूरज की रोशनी सीधे खड़ी चट्टान पर पड़ी.

मुझे ऊपर जाने का एक रास्ता दिखाई दिया. मैंने तुरंत चढ़ाई शुरू कर दी.

काफी मुश्किल से मैं लगभग सबसे ऊपर पहुंच गया, लेकिन आखिरी डेढ़ मीटर पर पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था.

वह हिस्सा सिर्फ ढीली बजरी और महीन रेत से भरा था.

मैंने नीचे देखा…

फिर ऊपर देखा…

और मन ही मन कहा,

“हे भगवान… अब क्या करूं?”

मैं न ऊपर जा सकता था, न नीचे लौट सकता था.

एक पल के लिए मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं अभी ज़िंदा हूं या मर चुका हूं.

मैं खड़ी चट्टान के किनारे लटका हुआ था.

तभी मुझे एहसास हुआ कि ऊपर चढ़ने का सिर्फ़ एक ही तरीका है- मुझे दोनों हाथ पूरी ताकत से चट्टानों में गड़ा देने होंगे.

लेकिन ऐसा करना ऐसा था जैसे टूटे हुए कांच के ढेर में हाथ डालना.

मैंने अपना दायां हाथ कोहनी तक चट्टानों के बीच घुसा दिया.

फिर बायां हाथ भी उसी तरह फंसा दिया.

मन ही मन तीन तक गिना…

और पूरी ताकत लगा दी.

क्रिस डट्टी

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आज तक मुझे समझ नहीं आया कि मैंने वह कैसे किया लेकिन अगले ही पल मेरा पूरा शरीर घूमता हुआ ऊपर की ओर आया और मैं चट्टान के ऊपर जा गिरा.

कुछ देर तक वहीं पड़ा रहा. मेरे मन में सिर्फ़ एक सवाल था- “क्या मैं सचमुच ज़िंदा हूं… या मर चुका हूं?”

मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा था. आंखों में अब भी तेज़ जलन थी.

लेकिन आखिरकार…

मैं उस मौत के गड्ढे से बाहर निकल चुका था.

मैं दौड़ता हुआ ज्वालामुखी के दूसरी ओर गया, जहां मुझे बचाव दल की रस्सी दिखाई दी.

मेरे शरीर में इतनी ताकत नहीं बची थी कि मैं खुद माइक को ऊपर खींच सकूं.

इसलिए मैंने रस्सी वहीं छोड़ दी, ताकि बचाव दल समझ जाए कि माइक अभी भी नीचे फंसा हुआ है.

इसके बाद मैं रेस्क्यू कैंप तक पहुंचा.

वहां कुछ टेंट, पानी की बोतलें और ऑक्सीजन सिलेंडर तो थे, लेकिन कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था.

मैंने फैसला किया कि जब तक कोई मुझे देख न ले, मैं चलता रहूंगा.

मैं लगातार चलता रहा.

तभी मैंने आसमान में एक हेलीकॉप्टर देखा.

कुछ ही क्षणों बाद हेलीकॉप्टर में बैठे लोगों की नज़र मुझ पर पड़ गई.

वे तेजी से मेरी ओर दौड़े. उनमें से एक ने जैसे ही मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरा पूरा शरीर अचानक ढीला पड़ गया.

ऐसा लगा जैसे शरीर की सारी ताकत एक पल में खत्म हो गई हो. मैं सीधे ज़मीन पर गिर पड़ा.

मेरे शरीर में अब तक एड्रेनालिन का स्तर इतना अधिक था कि मैं किसी तरह खुद को संभाले हुए था. लेकिन सुरक्षित होने का एहसास होते ही वह अचानक कम हो गया और मेरा शरीर जवाब दे गया.

बचाव दल ने मुझे सावधानी से हेलीकॉप्टर में बैठाया और बेस कैंप ले गया.

वहां एक व्यक्ति ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा, “अब आप सुरक्षित हैं. आप मौत के मुंह से लौट आए हैं.”

इतने में हेलीकॉप्टर की ओर दौड़ता हुआ एक शख्स दिखाई दिया. वह कोई और नहीं, बल्कि हमारे पायलट ग्रेग थे.

मैं उन्हें देखकर चौंक गया. “ग्रेग! तुम ज़िंदा हो? हमें लगा था कि तुम नहीं बचे.”

दरअसल, ग्रेग किसी तरह ज्वालामुखी की ढलान तक पहुंच गए थे और वहां पहुंचे एक हेलीकॉप्टर की मदद से अपनी जान बचाने में सफल रहे.

अगले दिन बचाव दल ने माइक को भी सुरक्षित बाहर निकाल लिया. जब रेस्क्यू टीम उसके पास पहुंची, तब वह एक चट्टान पर अपनी पत्नी के लिए एक संदेश उकेर रहा था-

“आई लव यू”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS