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बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन से हर कोई निराश है। 8 अक्टूबर को नाना पाटेकर का निधन हो गया है। नाना का निधन गोवा स्थित उनके घर पर कार्डियक अरेस्ट के कारण हुआ। एक्टर के निधन से उनके फैंस बुरी तरह सदमे में हैं। नाना के निधन के बाद अब हर कोई उनसे जुड़ी यादें शेयर कर रहे हैं। ऐसे में दिग्गज अभिनेता शिवाजी साटम ने नाना पाटेकर के सम्मान में आयोजित एक शोक सभा में उन्हें याद किया। इस दौरान CID के मशहूर ACP प्रद्युमन यानी शिवाजी साटम ने नाना को याद करते हुए ऐसे किस्से सुनाए हैं, जिन्हें सुनकर आप भी भावुक हो जाएंगे।
नाना संग 40 साल पुरानी दोस्ती को किया याद
‘अठवणीतले नाना’ (हमारी यादों में नाना) नाम की यह सभा मुंबई के प्रभादेवी स्थित पी.एल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी परिसर में आयोजित की गई थी। इस सभा में फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग इकट्ठा हुए, जिन्होंने दिवंगत एक्टर को याद किया और बताया कि उनके जीवन पर नाना पाटेकर का क्या प्रभाव पड़ा था। CID के मशहूर ACP प्रद्युमन यानी शिवाजी साट ने नाना संग अपनी 40 साल पुरानी दोस्तों और अनगिनत यादों को ताजा किया। साथ ही बताया कि उनके जीवन के मुश्किल दौर में नाना ने उनका कैसे साथ दिया। शिवाजी ने बताया कि कैसे नाना ने उन्हें हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया और जब उन्हें लगा कि उनके दोस्त को उसकी मेहनत के हिसाब से सही फीस नहीं मिल रही है, तो नाना ने खुद आगे आकर उनके लिए बात की।
शिवाजी साटम ने क्या कहा
प्रार्थना सभा में बोलते हुए, शिवाजी साटम ने कहा, ‘नाना इतनी अचानक चले गए। जब मैंने यह खबर सुनी, तो सच कहूं तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। नाना के साथ मेरी अनगिनत यादें जुड़ी हैं। हम लगभग 40 सालों से एक-दूसरे को जानते थे और उन्हीं की वजह से मुझे हिंदी सिनेमा में अपनी जगह मिली। वही मुझे हिंदी फिल्मों में लेकर आए थे। उन्होंने मुझे मनाते हुए कहा था, ‘तुम्हें यह करना चाहिए। तुम्हें यह जरूर करना चाहिए।”
नाना की वजह से मिली थी पहली हिंदी फिल्म
शिवाजी साटम ने बताया कि उन्हें अपनी पहली हिंदी फिल्म ‘यशवंत’ दिलाने में नाना पाटेकर का अहम रोल था। उन्होंने कहा, ‘मेरी पहली फिल्म ‘यशवंत’ थी। फिल्म के प्रोड्यूसर ने मुझे बुलाया क्योंकि इसमें एक पुलिस ऑफिसर का रोल था, लेकिन उस समय मैं इसे करने के लिए तैयार नहीं था। प्रोड्यूसर ने मुझे बताया कि मेरे दोस्त नाना पाटेकर ने मेरा नाम सुझाया है। जब मैंने मना कर दिया, तो प्रोड्यूसर ने नाना को फोन किया। नाना ने अपने ही अंदाज में मुझसे बात की और मुझे मना लिया। आखिरकार, कई बार मना करने के बाद, मैं मान गया।’
प्रोड्यूसर्स को किया फोन
शिवाजी ने आगे बताया कि जब नाना को पता चला कि साटम को कितनी फीस मिली है, तो वे इस बात से नाराज हो गए कि उनके दोस्त ने यह रकम तय करने से पहले उनसे सलाह क्यों नहीं ली। अभिनेता ने आगे बताया, प्रोड्यूसर्स को शूट खत्म होने के बाद फोन किया, मैं फिर से नाना से मिला और उन्होंने मुझसे मेरी फीस के बारे में पूछा। जब मैंने उन्हें रकम बताई, तो वे बहुत नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘तुम्हें कम से कम एक बार मुझसे पूछ तो लेना चाहिए था!’ उन्होंने मुझे डांटा और पूछा कि फीस स्वीकार करने से पहले मुझसे सलाह क्यों नहीं ली। इसके बाद, उन्होंने खुद प्रोड्यूसर्स को फोन किया।’ शिवाजी ने आगे बताया, ‘मैंने उनसे साफ कहा था कि वे प्रोड्यूसर्स से इस बारे में कोई सवाल न करें या उनसे बात न करें, लेकिन नाना नहीं माने। उन्होंने प्रोड्यूसर्स को दो घंटे तक खड़ा रखा, ठीक वैसे ही जैसे स्कूल में टीचर हमें खड़ा रखते थे। बेचारे प्रोड्यूसर बिना एक शब्द बोले वहां खड़े रहे।’
पत्नी के कैंसर से जूझने के दौरान नाना साथ खड़े रहे
शिवाजी और नाना की यादें सिर्फ उनके साथ काम करने तक ही सीमित नहीं थीं। नाना, शिवाजी के जीवन का सबसे मुश्किल दौर में भी उनके साथ खड़े रहे। ये वो वक्त था जब शिवाजी की पत्नी को कैंसर हो गया था और उस समय वे ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ की शूटिंग कर रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे परिवार के इस मेडिकल संकट के बीच फिल्म की शूटिंग कैसे संभालेंगे, इसलिए उन्होंने इस प्रोजेक्ट से अलग होने के बारे में सोचा, लेकिन नाना ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सब कुछ अकेले न झेलना पड़े। साटम ने बताया कि कैसे नाना ने फिल्म से जुड़े लोगों से बात की और शूटिंग का शेड्यूल इस तरह सेट करवाया कि वे सही समय पर घर लौट सकें।
नाना ने जो किया उतना कोई सगा भाई भी न कर पाता
साटम ने कहा, ‘मैं नाना को बहुत मानता हूं क्योंकि उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया, जितना शायद मेरा अपना सगा भाई भी नहीं कर पाता। जब हम फिल्म ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ की शूटिंग कर रहे थे, तब मेरी पत्नी को कैंसर होने का पता चला। मैंने नाना से कहा कि मैं अब इस फिल्म में काम नहीं कर पाऊंगा, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। उन्होंने डायरेक्टर और फिल्म से जुड़े बाकी सभी लोगों से बात की। अगले दिन, हमारे डायरेक्टर पार्थो घोष ने मुझसे कहा, ‘दोपहर 12 बजे आ जाना, और मैं तुम्हें रात 8 बजे तक जाने दूंगा।’ यह सब नाना की वजह से ही मुमकिन हो पाया। उन्होंने मेरा पूरा ख्याल रखा और एक सगे भाई की तरह मेरा साथ दिया। ऐसी कई कहानियां हैं। वे सच में बहुत प्यारे इंसान थे। कभी-कभी, वे अचानक मुझे फोन करके पूछते, ‘क्या कर रहे हो? तुरंत फार्म पर आ जाओ!’ नाना बस ऐसे ही इंसान थे।’
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