Source :- LIVE HINDUSTAN
इसका जवाब दशकों पुराने ऐतिहासिक विवाद में छिपा है, जो 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन और कलात की रियासत के भाग्य से जुड़ा है, जो कभी वर्तमान बलूचिस्तान के एक बड़े हिस्से पर राज करती थी।
जब भी भारत और पाकिस्तान की आजादी की बात होती है, तो 14 और 15 अगस्त की तारीखें दिमाग में आती हैं। लेकिन पाकिस्तान के सबसे बड़े और अशांत सूबे बलूचिस्तान के इतिहास में एक और तारीख बेहद अहम है- 11 अगस्त। बलूच नागरिक और आजादी समर्थक गुट हर साल 11 अगस्त को अपना ‘स्वतंत्रता दिवस’ (Independence Day) मनाते हैं। आखिर 1947 में उस दिन ऐसा क्या हुआ था और क्यों बलूचिस्तान आज भी इस दिन को अपनी आजादी के प्रतीक के रूप में देखता है?
इसका जवाब दशकों पुराने ऐतिहासिक विवाद में छिपा है, जो 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन और कलात की रियासत के भाग्य से जुड़ा है, जो कभी वर्तमान बलूचिस्तान के एक बड़े हिस्से पर राज करती थी।
11 अगस्त 1947: जब कलात की रियासत बनी ‘आजाद मुल्क’
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बलूचिस्तान आज के पाकिस्तान जैसा कोई एक एकीकृत राज्य नहीं था। तब यह चार प्रमुख रियासतों में बंटा हुआ था- कलात, खरान, लसबेला और मकरान। इनमें सबसे बड़ी और प्रभावशाली रियासत थी ‘कलात’, जिसके शासक को ‘खान ऑफ कलात’ कहा जाता था।
ब्रिटिश राज से भारत की आजादी का खाका तैयार हो रहा था, तब कलात के खान, मीर अहमद यार खान ने साफ कर दिया था कि वे पाकिस्तान या भारत में शामिल होने के बजाय एक स्वतंत्र देश के रूप में रहना चाहते हैं।
4 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना और कलात के खान के बीच एक बैठक हुई। 4 अगस्त 1947 की दिल्ली बैठक में यह तय हुआ कि कलात को अलग और स्वतंत्र रहने दिया जाएगा।
इसके बाद एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट जैसी व्यवस्था बनी, यानी तत्कालीन हालात में कलात और भविष्य के पाकिस्तान के बीच कुछ समय के लिए यथास्थिति रखी जाए। इस समझौते के तहत कलात रियासत की संप्रभुता और आजादी को मान्यता दी गई। 11 अगस्त को कलात ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया।
आजाद कलात ने अपना संविधान बनाया और दो सदनों वाली संसद (दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम) का गठन भी किया।
सिर्फ 227 दिनों की आजादी और फिर जबरन विलय
बलूच आवाम के लिए आजादी की यह खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं सकी। 11 अगस्त को मिली यह आाजादी महज 227 दिनों तक ही कायम रह सकी।
मोहम्मद अली जिन्ना ने शुरुआत में भले ही समझौते पर दस्तखत किए थे, लेकिन जल्द ही पाकिस्तान की नियत बदल गई। कराची से कलात पर पाकिस्तान में विलय का दबाव बनाया जाने लगा। जब कलात की संसद ने सर्वसम्मति से पाकिस्तान में शामिल होने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया, तो पाकिस्तान ने सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने का फैसला किया।
27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में दाखिल हुई और खान ऑफ कलात से जबरन विलय पत्र पर दस्तखत करवा लिए। बलूच लोग इसे अपनी संप्रभुता पर हमला और जबरन कब्जा मानते हैं।
11 अगस्त आज क्यों है बलूच राष्ट्रवाद का प्रतीक?
पाकिस्तानी कब्जे के बाद से ही बलूचिस्तान में विरोध की चिंगारी सुलग रही है, जो बीते दशकों में एक सशस्त्र उग्रवाद और राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
आज जब बलूच कार्यकर्ता या संगठन 11 अगस्त को ‘आजादी दिवस’ के रूप में मनाते हैं, तो उनका मकसद दुनिया को यह याद दिलाना होता है कि उनका एक स्वतंत्र इतिहास रहा है। यह दिन उनके लिए सिर्फ एक पुरानी तारीख नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय पहचान, स्वायत्तता और पाकिस्तान के खिलाफ जारी उनके संघर्ष का एक बड़ा सियासी प्रतीक बन चुका है।
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