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बच्चे की हायर स्टडीज में लग रहे लाखों रुपये, निवेश तोड़ें या लें एजुकेशन लोन? जानिए एक्सपर्ट की राय

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Source :- LIVE HINDUSTAN

बच्चों की पढ़ाई के लिए बड़ी रकम जुटाना आज कई परिवारों के सामने बड़ी चुनौती है। खासकर जब बच्चा प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से MBBS करना चाहता हो, तो फीस करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है। एक ऐसे ही मामले में 48 साल के एक व्यक्ति ने एक्सपर्ट से सलाह मांगी है। उनके बेटे की MBBS की फीस करीब ₹21 लाख सालाना है और कोर्स 5 साल का है, यानी पूरी पढ़ाई पर करीब ₹1.05 करोड़ खर्च हो सकता है। उनके पास पर्याप्त बचत है और म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो का करीब 90% हिस्सा इक्विटी में लगा है। सवाल यह है कि फीस भरने के लिए निवेश बेच देना बेहतर होगा या एजुकेशन लोन लेना?

म्यूचुअल फंड निवेश का रास्ता

एक्सपर्ट के मुताबिक सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि मौजूदा म्यूचुअल फंड निवेश किस लक्ष्य के लिए बनाया गया था। अगर यह पैसा पहले से बच्चे की शिक्षा के लिए रखा गया है, तो जरूरत के हिसाब से इसे धीरे-धीरे निकालकर फीस भरना समझदारी हो सकती है। लेकिन, अगर यही निवेश रिटायरमेंट जैसे किसी बड़े भविष्य के लक्ष्य के लिए है, तो पूरा पैसा निकालना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसी स्थिति में निवेश और एजुकेशन लोन का संतुलित इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे एक तरफ पढ़ाई का खर्च पूरा होगा और दूसरी तरफ लंबे समय का वित्तीय लक्ष्य भी पूरी तरह प्रभावित नहीं होगा।

इक्विटी म्यूचुअल फंड से पैसा निकालने पर टैक्स का भी ध्यान रखना जरूरी है। एक्सपर्ट के अनुसार लंबी अवधि के इक्विटी निवेश पर तय सीमा से ऊपर हुए कैपिटल गेन्स पर LTCG टैक्स लागू हो सकता है। इसलिए पूरा पैसा एक साथ निकालने के बजाय फीस की जरूरत के मुताबिक अलग-अलग सालों में रिडीम करना टैक्स के लिहाज से फायदेमंद हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर हर साल करीब ₹21-22 लाख की जरूरत के हिसाब से निवेश निकालने पर उपलब्ध वार्षिक टैक्स छूट का अलग-अलग सालों में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, वास्तविक टैक्स देनदारी निवेश की खरीद कीमत, होल्डिंग अवधि और लाभ पर निर्भर करेगी।

एजुकेशन लोन लेने का विकल्प

दूसरी तरफ एजुकेशन लोन लेने का विकल्प भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सुरक्षित एजुकेशन लोन की ब्याज दर आम तौर पर निवेश से मिलने वाले संभावित रिटर्न से तुलना करके देखी जानी चाहिए। यहां एक बड़ा फायदा टैक्स डिडक्शन का भी हो सकता है। एक्सपर्ट ने बताया कि पात्रता होने पर पुराने टैक्स रिजीम में एजुकेशन लोन के ब्याज पर सेक्शन 80E के तहत टैक्स लाभ मिल सकता है। इससे लोन की वास्तविक लागत कम हो सकती है। हालांकि, लोन लेने से पहले ब्याज दर, प्रॉसेसिंग फीस, मोरेटोरियम और कुल पुनर्भुगतान राशि जरूर जांचनी चाहिए।

लोन की अवधि चुनते समय भी केवल EMI नहीं देखनी चाहिए। लंबी अवधि में EMI कम रहती है, लेकिन कुल ब्याज ज्यादा चुकाना पड़ सकता है। वहीं, छोटी अवधि में EMI अधिक होगी, लेकिन ब्याज का बोझ कम हो सकता है। इसलिए ऐसा टेन्योर चुनना बेहतर है, जिसमें परिवार की मासिक आय पर बहुत ज्यादा दबाव न पड़े और कुल ब्याज भी कंट्रोल में रहे। अगर आय स्थिर और बढ़ने की संभावना वाली है, तो कुछ हिस्सा लोन से और कुछ निवेश से जुटाने का विकल्प वित्तीय रूप से संतुलित हो सकता है।

ज्यादा रिटर्न मिलेगा या लोन पड़ेगा सस्ता?

₹1 करोड़ से ज्यादा की संभावित MBBS लागत को देखते हुए फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि निवेश से ज्यादा रिटर्न मिलेगा या लोन सस्ता पड़ेगा। परिवार को बेटे की पढ़ाई के साथ अपनी रिटायरमेंट जरूरत, आपातकालीन फंड, टैक्स, लोन की ब्याज दर और भविष्य की आय सभी को ध्यान में रखना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि शिक्षा के लिए निवेश बेचने या कर्ज लेने का फैसला व्यक्तिगत फाइनेंशियल स्थिति के अनुसार होना चाहिए। किसी एक विकल्प को सभी परिवारों के लिए सबसे बेहतर नहीं माना जा सकता।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN