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बच्चों को कॉलेज भेज इमोशनल हुईं फराह खान, ऐसे वक्त को कैसे डील करें पैरेंट्स?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

बच्चों को कॉलेज के लिए घर से दूर भेजना और उन्हें बढ़ते, अचीव करते देखना हर पैरेंट्स के लिए गर्व की बात होती है। लेकिन साथ ही साथ वो काफी दुखी भी होते हैं क्योंकि ये समय उनके अकेलेपन और बच्चों से दूर होने का होता है, जानें इस समय को कैसे पैरेंट्स डील करें।

डायरेक्टर और कोरियोग्राफर फराह खान ने अपने तीन बच्चों को एक साथ कॉलेज भेजने के लिए विदा किया और इस वक्त की फोटोज शेयर करने के साथ कैप्शन लिखा अगर आपको लगता है कि अपने बच्चे को कॉलेज भेजना मुश्किल था.. तो इसे 3 बार करके देखो! 3 शहर, 3 कैंपस..3 अलविदा! मेरे दिल के 3 टुकड़े। अपने बच्चे को कॉलेज के लिए दूसरे शहर भेजना किसी भी पैरेंट्स के लिए सबसे मुश्किल समय होता है। एक तरफ बच्चे बड़े हो गए होते हैं तो उनके अच्छे भविष्य और पढ़ाई के लिए बाहर भेजना जरूरी हो जाता है जिससे वो लाइफ में कुछ अचीव कर सकें। वहीं दूसरी तरफ माता-पिता के लिए उन्हें खुद से दूर करना बेहद मुश्किल भरा समय होता है। ऐसे वक्त में इमोशनल होना स्वाभाविक हो जाता है क्योंकि समझ ही नहीं आता ये वक्त खुशी जताने का है या फिर दुखी होने का। लगभग हर पैरेंट्स को इस दौर से गुजरना होता है और इसे ही साइकोलॉजी में एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम बोला जाता है। जिंदगी के इस दौर में बच्चों के साथ ही पैरेंट्स के जीवन में भी काफी परिवर्तन होता है। ये बदलाव उनकी लाइफ में अकेलापन, दुख, एंजायटी और कई बार उनके जीने के उद्देश्य को ही खत्म कर देता है, यहां तक कि लाइफ में उनका रोल ही जैसे अचानक बदल गया होता है।

अभी तक हर वक्त जो महिला मां के रोल में थी और बच्चों की जिम्मेदारी उठाती रहती है अचानक बच्चों के चले जाने से उसे लगता है कि अब उसके जीने का कोई उद्देश्य ही नहीं है। ऐसे वक्त में खुद को संभालना जरूरी है।

पैरेंट्स इस बदलाव को कैसे डील करें

काफी सारे पैरेंट्स अपने लाइफ के रूटीन और कामों को बच्चों के रूटीन और काम के हिसाब से रखते हैं। ऐसे में जब बच्चे जाते है तो अचानक से पूरे रूटीन में बदलाव आ जाता है और ये बदलाव काफी इमोशनल होता है। लेकिन ये निगेटिव नहीं होता। बच्चों के आगे बढ़ने और अपने पैर पर खड़े होने से जहां पैरेंट्स गर्व महसूस करते हैं तो वहीं उन्हें अकेलेपन की वजह से दुख भी होता है। हालांकि जिंदगी का ये फेज खुद को डिस्कवर करने का अच्छा मौका होता है। अपने खुद के इंटरेस्ट पर फोकस करने, दोस्ती बढ़ाने, अपने करियर पर फोकस करने या कई बार रिलेशनशिप को स्ट्रांग करने के लिए ये सही समय होता है। इस समय को पैरेंट्स अपनी आइडेंटिटी बनाने में बिता सकते हैं।

बच्चे को इमोशनली कमजोर ना करें

बच्चों बड़े होकर कॉलेज पढ़ने गए तो अब वो एक एडल्ट हो चुके हैं और हर वक्त उन्हें फोन, कॉल, मैसेज भेजना, हर वक्त पता करना कि वो कहां है, हर समय की अपडेट मांगना आपकी चिंता और सपोर्ट नहीं बल्कि बच्चे के ऊपर आपका कंट्रोल दिखाता है। ऐसे समय में बच्चे को सपोर्ट करें और खुद के अकेलेपन के लिए बच्चे को जिम्मेदार ना ठहराएं। बच्चे को आप याद कर रहे हैं ये बिल्कुल नेचुरल है लेकिन बार-बार उसे ये कहना बच्चों को ऊपर इमोशनल बैगेज देने जैसा होता है। इस तरह से बोलने पर कई बार बच्चे पैरेंट्स से दूर भागने लगते हैं। इस गलती को ना करें। बच्चे को मिस करना, उससे बातें करना सही लेकिन इस दौरान म्युचुअल रिस्पेक्ट और इंडिपेंडेस का भी ख्याल रखें।

अपनी खुद की पहचान बनाएं

इस खाली वक्त को पैरेंट्स अपनी पहचान बनाने में बिताएं, अपने रिश्ते मजबूत करें, दोस्तों से कनेक्ट करें, ट्रैवल, वर्क या फिर किसी दूसरी एक्टीविटी में समय लगाएं। एक्सपर्ट कहते हैं कि पैरेंट्स की आजाद इमोशनल जिंदगी जितनी हेल्दी होगी, उनके साथ और वैलिडेशन के लिए बच्चे पर बहुत ज्यायादा डिपेंडेंट होने का चांस उतना ही कम होगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN