Source :- LIVE HINDUSTAN

पिछले कुछ दिनों से भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी तबकों में चर्चा और विमर्श के केंद्र में आ गई है। ईरान युद्ध और कच्चे तेल के दामों का असर आस-पास दिख ही रहा है, साथ में शेयर बाजार की भारी उठापटक भी रोज लोगों के दिल दहलाती आ रही है। आम आदमी को पेट्रोल-डीजल के दाम चुभने लगे हैं और चाहे-अनचाहे उसे महंगाई का डर भी सताने लगा है।

कुछ अर्थशास्त्री भी डरावने हालात की तरफ इशारा कर रहे हैं। खासकर उन अर्थशास्त्रियों की चर्चा ज्यादा हो रही है, जो पिछले कई साल से इस सरकार के बड़े समर्थक रहे हैं, लेकिन अब किसी न किसी कारण से आर्थिक नीतियों या सरकार के फैसलों पर उंगली उठाने लगे हैं।

इस बीच दो ऐसी खबरें आ गईं, जिनसे चर्चा और गर्म हो गई। पहली थी, भारत के शेयर बाजार में सारे शेयरों की कुल कीमत (मार्केट कैपिटलाइजेशन) दुनिया में पांचवें नंबर से खिसक कर पहले छठे और फिर सातवें नंबर पर पहुंच गई है और दूसरी खबर थी, एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी का यह दावा कि मई के अंत में भारत ने करीब 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया है। दोनों ही खबरें चटपट सुर्खियां बन गईं।

भारत का शेयर बाजार अचानक दुनिया की रेस में पिछड़ता क्यों दिख रहा

आखिर भारत का शेयर बाजार अचानक दुनिया की रेस में पिछड़ता क्यों दिख रहा है, जबकि देश की अर्थव्यवस्था ने पूरे साल उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है? यह चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि मात्र डेढ़-दो साल पहले भारत दुनिया के शेयर बाजारों में मार्केट कैप के पैमाने पर पांचवें पायदान पर पहुंच गया था।

अठारह महीने पहले के आंकड़े देखें, तो भारत का शेयर बाजार दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार से साढ़े तीन गुना और ताइवान से दोगुने से ज्यादा था, पर आज कोरिया भी भारत से आगे निकल चुका है। ताइवान तो उससे एक महीने पहले ही भारत को पीछे छोड़ चुका था।

भारत का बाजार कुछ खास नहीं गिरा

हालांकि, भारत का बाजार कुछ खास नहीं गिरा है। अब भी यह 4.8 ट्रिलियन डॉलर के करीब या दुनिया के बड़े बाजारों में से एक है, लेकिन पहले ताइवान और फिर दक्षिण कोरिया पांच ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कैप पार करके भारत से आगे निकल गए हैं। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि विदेशी निवेशक भारत के बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। सिर्फ 2026 में अब तक वे भारत से करीब 26 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। जबकि, दूसरी तरफ ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार इसी दौरान तूफानी रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

उनकी बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह है, कृत्रिम मेधा या एआई का धूम-धड़ाका। जिस अंदाज में एआई हमारे जीवन के हर पहलू को जकड़ता जा रहा है, उससे दुनिया भर के बड़े-छोटे निवेशक सम्मोहित हो चुके हैं। इसीलिए एआई और सेमीकंडक्टर वाली कंपनियों में पैसा लगाने की होड़ लगी है। सेमीकंडक्टर या चिप बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है- ताइवान सेमीकंडक्टर कॉरपोरेशन (टीएसएमसी)। दक्षिण कोरिया में सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसी कंपनियां भी इस कारोबार का एक अहम हिस्सा हैं।

एआई के पीछे भाग रहे दुनियाभर के निवेशक

एआई से सम्मोहित निवेशक अब इन कंपनियों के शेयरों में जमकर पैसा लगा रहे हैं। क्या आलम है, इसे यूं समझिए कि ताइवान के स्टॉक मार्केट इंडेक्स में करीब 42 फीसदी की हिस्सेदारी टीएसएमसी की है। इस साल इसका शेयर डेढ़ गुना हो चुका है। दुनिया भर के निवेशक तो इसके पीछे भाग ही रहे हैं, सरकार भी उनका रास्ता आसान कर रही है। ताइवान के म्यूचुअल फंड किसी एक कंपनी में अपनी कुल रकम का कितना हिस्सा लगा सकते हैं, इस नियम में ढील दे दी गई है। अंतरराष्ट्रीय निवेश संस्थानों का अनुमान है कि सिर्फ इसी वजह से ताइवान में लगभग छह अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश आ सकता है।

भारत की असली परेशानी क्या है

भारत के लिए परेशानी की बात यह है कि यहां लिस्टेड कंपनियों में कोई भी ऐसी बड़ी कंपनी नहीं है, जो एआई या सेमीकंडक्टर कारोबार में दुनिया की दिग्गज कंपनियों के सामने खड़ी हो। तो क्या इसका मतलब है कि भारत की अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है? इसका जवाब देने से पहले दूसरी खबर का भी हिसाब लगा लेना बेहतर होगा। क्या रिजर्व बैंक ने वाकई 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया? इतिहास में पहली बार? बहुत खस्ता आर्थिक स्थिति में भी बस एक उदाहरण है, जब भारत ने अपना सोना गिरवी रखा था, इसीलिए सोना बेचने की चर्चा होते ही इस पर बवाल मच गया।

यह खबर समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग के हवाले से आई थी, जिसमें कहा गया था कि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव से मुकाबले के लिए आरबीआई ने मई के अंत में करीब 12 अरब डॉलर का सोना बेचा हो सकता है। रिजर्व बैंक ने बाकायदा बयान जारी कर इस खबर को गलत बताया और गुरुवार की रात ब्लूमबर्ग ने भी इस खबर को गलत बताते हुए वापस ले लिया, मगर हंगामा तो बरपा हो ही चुका था।

क्या भारत की अर्थव्यवस्था खतरे में है?

फिर भी, क्या भारत की अर्थव्यवस्था खतरे में है? एक बड़ा संकट तो सामने खड़ा है, जो ईरान-अमेरिका के बीच स्थायी शांति-समझौता होने तक खड़ा रहेगा। मगर भारत की घरेलू मांग, नौजवान आबादी, बुनियादी ढांचे पर खर्च, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की नीति और मजबूत बैंकिंग प्रणाली ऐसी चीजें हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती दिखाती हैं। शेयर बाजार में भी घरेलू संस्थानों या छोटे निवेशकों की एसआईपी से आने वाले पैसे का प्रवाह मजबूत बना हुआ है।

उपभोक्ता बनकर गुजारा नहीं होने वाला

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अगर ईरान की लड़ाई से उपजी महंगाई की आशंका को किनारे रख दें, तब भी तेज आर्थिक वृद्धि के बरअक्स अच्छे रोजगार के मौके जरूरत के मुताबिक नहीं पैदा हो रहे। दूसरा, निर्यात के मोर्चे पर भारत को तमाम एशियाई देशों से ही पार पाना मुश्किल हो रहा है। आयातित तेल पर निर्भर होने के अपने दर्द हैं, पर इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती प्रौद्योगिकी की है। एआई और आधुनिकतम तकनीक की दुनिया में भारत काफी कमजोर स्थिति में दिखता है। यहां उपभोक्ता बनकर गुजारा नहीं होने वाला है। नई तकनीक के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर, दोनों ही पक्षों में भारत की मौजूदगी बहुत कम है।

शेयर बाजार के छठे या सातवें नंबर पर पहुंचने का कोई खास अर्थ नहीं है, लेकिन अगर नई तकनीक के मोर्चे पर भारत पिछड़ता रहा, तो आने वाले कुछ सालों या दशकों में विश्व से कदम मिलाकर चलना भी मुश्किल होगा। चुनौती यही है कि क्या अब भारत एक निर्णायक छलांग लगाकर दिखाएगा, जो उसे सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक व उद्योग के मोर्चे पर एक महाशक्ति भी बना सके?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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