Source :- LIVE HINDUSTAN
मुख्य बातें
- Rent vs Buying a House: अपना घर खरीदना जिंदगी का सबसे बड़ा फाइनेंशियल फैसला हो सकता है
- लेकिन क्या हर महीने ईएमआई भरकर घर खरीदना, सालों तक किराया देने से बेहतर है? जरूरी नहीं
Rent vs Buying a House: अपना घर खरीदना जिंदगी का सबसे बड़ा फाइनेंशियल फैसला हो सकता है। लेकिन क्या हर महीने ईएमआई भरकर घर खरीदना, सालों तक किराया देने से बेहतर है? जरूरी नहीं। 20-30 साल का होम लोन लेने पर EMI भले ही आपकी पहुंच में लगे, लेकिन ब्याज, डाउन पेमेंट, मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स और उस रकम के निवेश से मिलने वाले संभावित रिटर्न को जोड़ें तो पूरा हिसाब बदल सकता है। इसलिए सिर्फ ‘किराया दे रहे हैं तो पैसा बर्बाद हो रहा है’ सोचकर घर खरीदना सही फैसला नहीं है। घर खरीदने से पहले यह समझना जरूरी है कि 30 साल की ईएमआई और किराए के बीच असली खर्च कितना है और आपके पैसे के लिए कौन-सा विकल्प ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है।
सिर्फ किराया और ईएमआई की तुलना करना बड़ी गलती?
गोडरेड वेल्थ के चीफ बिजनेस ऑफिसर नीरज महाजन के मुताबिक यह तय करने का कोई एक फिक्स फॉर्मूला नहीं है कि कब घर खरीदना किराए पर रहने से ज्यादा फायदेमंद हो जाता है। इसके लिए घर की कीमत, उसी तरह के घर का किराया, होम लोन की ब्याज दर, आप कितने साल वहां रहेंगे और डाउन पेमेंट के पैसे का दूसरा इस्तेमाल करने पर मिलने वाले संभावित रिटर्न को देखना चाहिए।
मान लीजिए किसी घर की कीमत 1 करोड़ रुपये है और उसी घर का किराया 30,000 रुपये महीने है। यानी सालभर का किराया 3.6 लाख रुपये हुआ, जो घर की कीमत का करीब 3.6 फीसदी है। लेकिन सिर्फ इस आंकड़े से यह तय नहीं किया जा सकता कि घर खरीदना बेहतर है या किराए पर रहना।
घर खरीदते समय स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, होम लोन की प्रोसेसिंग फीस, इंटीरियर, प्रॉपर्टी टैक्स, मेंटेनेंस और मरम्मत जैसे खर्च भी जुड़ते हैं। वहीं, डाउन पेमेंट में लगाया गया पैसा आपके पास निवेश या किसी दूसरी जरूरत के लिए उपलब्ध नहीं रहता।
30 साल की ईएमआई छोटी दिखेगी, लेकिन ब्याज बहुत बड़ा हो सकता है। लंबे होम लोन की सबसे बड़ी खासियत कम ईएमआई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि घर सस्ता पड़ता है।
एक्सपर्ट के उदाहरण के मुताबिक अगर 80 लाख रुपये का होम लोन 8 फीसदी की ब्याज दर पर लिया जाए और पूरे समय कोई प्रीपेमेंट न किया जाए, तो 30 साल का लोन लेने पर 20 साल की तुलना में मंथली ईएमआई करीब 8,200 रुपये कम हो सकती है।
लेकिन इसके बदले कुल ब्याज में करीब 50.7 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ आ सकता है। यानी 30 साल की कम ईएमआई देखकर आकर्षित होना आसान है, लेकिन लंबे समय में बैंक को दिया जाने वाला ब्याज काफी ज्यादा हो सकता है।
अगर इसी घर का किराया 30,000 रुपये महीना है तो खरीदार को यह देखना होगा कि ईएमआई चुकाने के बाद उसके पास निवेश, बच्चों की पढ़ाई, इमरजेंसी फंड और बाकी जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा बचता है या नहीं।
घर की कीमत बढ़ेगी, इसी उम्मीद पर न खरीदें
कई लोग घर खरीदने का फैसला यह सोचकर करते हैं कि आने वाले सालों में प्रॉपर्टी की कीमत तेजी से बढ़ेगी और उन्हें बड़ा फायदा होगा। लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक, घर खरीदने का फैसला केवल भविष्य में प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ने की उम्मीद पर आधारित नहीं होना चाहिए।
खरीद और किराए की तुलना करते समय यह भी देखना चाहिए कि अगर कुछ सालों बाद घर बेच दिया जाए तो उसकी कीमत क्या होगी, बेचने में कितना खर्च आएगा और उस समय होम लोन कितना बाकी होगा।
दूसरी तरफ अगर कोई व्यक्ति किराए पर रहता है और खरीदारी के लिए बचाए गए पैसे या ईएमआई और किराए के बीच के अंतर को निवेश करता है, तो उस निवेश से मिलने वाला संभावित रिटर्न भी तुलना में शामिल किया जाना चाहिए।
एक जैसी सैलरी वालों के लिए भी फैसला अलग हो सकता है। दो लोगों की सैलरी एक जैसी हो सकती है, लेकिन दोनों की घर खरीदने की क्षमता एक जैसी नहीं होगी। मसलन, एक व्यक्ति के पास पर्याप्त डाउन पेमेंट है, कोई दूसरा लोन नहीं है और वह अगले 15-20 साल तक उसी शहर में रहना चाहता है। वहीं दूसरे व्यक्ति पर माता-पिता की जिम्मेदारी हो सकती है, दूसरे लोन चल रहे हो सकते हैं या नौकरी की वजह से शहर बदलने की संभावना हो सकती है।
ऐसे में दोनों के लिए घर खरीदने का फैसला अलग हो सकता है। इसलिए होम लोन लेते समय सिर्फ अपनी सैलरी नहीं, बल्कि मौजूदा ईएमआई, परिवार की जिम्मेदारियां, नौकरी की स्थिरता, सेविंग्स और इमरजेंसी फंड को भी ध्यान में रखना चाहिए।
बच्चों की पढ़ाई से लेकर रिटायरमेंट तक, स्थिरता भी मायने रखती है। घर खरीदने का फैसला सिर्फ पैसों का गणित नहीं है। परिवार की जरूरतें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। अगर बच्चों की पढ़ाई एक ही स्कूल में चल रही है, माता-पिता आसपास रहते हैं या परिवार लंबे समय तक एक ही शहर में बसना चाहता है तो अपना घर ज्यादा स्थिरता दे सकता है।
रिटायरमेंट के करीब पहुंचने वाले लोगों के लिए भी अपना घर एक फाइनेंशियल सिक्योरिटी हो सकता है। होम लोन खत्म होने के बाद हर महीने किराया देने की जरूरत नहीं रहती। हालांकि, प्रॉपर्टी टैक्स, मेंटेनेंस और मरम्मत जैसे खर्च तब भी बने रहते हैं।
घर खरीदें या किराए पर रहें? पहले ये 7 सवाल पूछें
1. क्या मैं कम से कम 10-15 साल इस शहर में रहना चाहता हूं?
2. डाउन पेमेंट देने के बाद मेरे पास पर्याप्त इमरजेंसी फंड बचेगा?
3. ईएमआई के बाद हर महीने कितनी रकम बचती है?
4. होम लोन के पूरे पीरियड में कुल कितना ब्याज देना होगा?
5. प्रॉपर्टी टैक्स, मेंटेनेंस और दूसरे खर्च कितने होंगे?
6. अगर मैं किराए पर रहूं तो बची रकम को निवेश करने पर कितना संभावित रिटर्न मिल सकता है?
7. कुछ साल बाद घर बेचने की स्थिति में मेरी कुल लागत और कीमत क्या होगी?
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