Source :- LIVE HINDUSTAN
मुख्य बातें
- LTCG हटाने की मांग के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली है
- 2004 में UPA सरकार बनने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री पी
- चिदंबरम ने बजट में शेयरों पर लगने वाला LTCG टैक्स खत्म कर दिया था
- 2018 में NDA सरकार ने शेयरों पर LTCG टैक्स फिर से लागू कर दिया
शेयर बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे विदेशी निवेशकों (FII) को वापस लाने के लिए शेयरों पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (LTCG) को खत्म करने की मांग उठी है। इस बीच सरकार ने बाजार से जुड़े लोगों और टैक्स एक्सपर्ट्स से राय मांगी है। सूत्रों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों के लगातार निकलने के बीच सरकार कैपिटल मार्केट पर लगने वाले टैक्स की फिर से समीक्षा कर रही है। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि क्या टैक्स हटाने भर से विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में पैसा लगाने के लिए दौड़ पड़ेंगे?
यह कदम वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान के बाद उठाया गया है, जो उन्होंने 13 अक्टूबर को दिल्ली में एक कार्यक्रम में दिया था। उन्होंने कहा था, “इस पर काफी बहस चल रही है। बजट काफी करीब है और तैयारी शुरू हो चुकी है। मेरे लिए यह बताने का सही समय नहीं है कि मैं क्या मानूंगी और क्या नहीं।”
अभी 12 महीने से ज्यादा समय तक रखे गए शेयरों पर LTCG 12.5% है, देशी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों दोनों के लिए। सेस और सरचार्ज मिलाकर यह लगभग 15% हो जाता है। इसके अलावा इक्विटी निवेश पर STT 0.1% खरीदार और बेचने वाले दोनों से लिया जाता है और 0.015% स्टांप ड्यूटी खरीदार से।
2004 में खत्म हुआ था LTCG, 2018 में फिर लगा टैक्स
इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 2004 में UPA सरकार बनने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट में शेयरों पर लगने वाला LTCG टैक्स खत्म कर दिया था। उस समय शेयरों को 12 महीने से ज्यादा रखने के बाद बेचने पर होने वाले मुनाफे पर टैक्स नहीं देना पड़ता था। इसके बदले शेयर खरीदने और बेचने पर STT लगाया गया।
लेकिन, 2018 में NDA सरकार ने शेयरों पर LTCG टैक्स फिर से लागू कर दिया। STT भी जारी रहा। यानी निवेशकों को शेयर खरीदने-बेचने पर STT देना पड़ता है और तय सीमा से ज्यादा लंबी अवधि के निवेश पर हुए मुनाफे पर LTCG भी देना पड़ता है।
अब बाजार के जानकार चाहते हैं कि सरकार LTCG को फिर से खत्म करे। उनका मानना है कि इससे शेयर बाजार में निवेश करने वालों का रिटर्न बेहतर होगा और विदेशी निवेशकों को भारत में पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
FII ने 12 महीने में बेच दिए ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा के शेयर
LTCG हटाने की मांग के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली है। पिछले 12 महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार में 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच चुके हैं। इतनी बड़ी बिकवाली बाजार पर दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में से एक मानी जा रही है।
EY India के टैक्स लीडर समीर गुप्ता ने कहा कि भारत को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर टैक्स के बोझ की पूरी समीक्षा करनी चाहिए। दुनिया के किसी भी बड़े बाजार में FPIs पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगता, लेकिन भारत में उन पर LTCG और STT दोनों लगते हैं। उन्होंने कहा कि Tiger Global के फैसले के बाद विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स को लेकर भरोसा बनाना भी उतना ही जरूरी है। ट्रीटी बेनिफिट्स को साफ और लगातार तरीके से लागू किया जाना चाहिए, खासकर ग्रैंडफादर की गई इन्वेस्टमेंट्स के लिए।
SBI रिसर्च ने भी दी LTCG खत्म करने की सलाह
SBI रिसर्च ने LTCG को खत्म करने की सलाह दी है। इसके साथ ही शेयरों पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लागू होने के लिए निवेश की अवधि 12 महीने से बढ़ाकर 2 या 3 साल करने का सुझाव भी दिया है।
सरकार को LTCG से मिले ₹1.29 लाख करोड़, इतना पैसा कैसे छोड़ेगी?
शेयरों पर LTCG से सरकार को पिछले साल करीब ₹1.29 लाख करोड़ की कमाई हुई थी। अगर सरकार यह टैक्स खत्म करती है तो उसे इतनी बड़ी रकम के राजस्व पर असर पड़ने की आशंका का हिसाब लगाना होगा।
दूसरी तरफ सरकार के खर्च भी बढ़ रहे हैं। खाद और तेल पर सब्सिडी का खर्च बजट में लगाए गए अनुमान से ज्यादा रहने की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती है कि खर्च बढ़ने के बीच आमदनी को कैसे संभाला जाए। सरकार के लिए इस पर फैसला करना आसान नहीं होगा।
Bernstein की रिपोर्ट: LTCG हटाने से आएगी तेजी, लेकिन ज्यादा दिन टिकना मुश्किल
विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिए सिर्फ LTCG खत्म करना काफी होगा, इस पर भी सवाल हैं। Bernstein की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, LTCG हटाने से शेयर बाजार में कुछ समय के लिए तेजी आ सकती है, लेकिन उस तेजी को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होगा।
इसकी एक बड़ी वजह भारतीय शेयरों की कीमतें हैं। विदेशी निवेशकों को भारतीय कंपनियों के शेयर अब भी महंगे लग रहे हैं। ऐसे में टैक्स में राहत मिलने के बावजूद वे निवेश करने से पहले शेयरों की कीमत और संभावित रिटर्न का हिसाब लगाएंगे।
भारतीय शेयर विदेशी बाजारों के मुकाबले महंगे क्यों?
शेयरों के महंगे या सस्ते होने का अंदाजा लगाने के लिए प्राइस-टू-अर्निंग यानी PE रेशियो का इस्तेमाल किया जाता है। आसान भाषा में समझें तो PE रेशियो बताता है कि किसी कंपनी की कमाई के मुकाबले उसके शेयर की कीमत कितनी है। आम तौर पर ज्यादा PE रेशियो का मतलब होता है कि निवेशक उस कमाई के मुकाबले शेयर के लिए ज्यादा कीमत चुका रहे हैं।
तो क्या LTCG हटने से लौट आएंगे विदेशी निवेशक?
इसका सीधा जवाब है कि सिर्फ LTCG हटाने से विदेशी निवेशकों की वापसी की गारंटी नहीं है। टैक्स में राहत मिलने से निवेशकों का रिटर्न जरूर बेहतर हो सकता है। इससे बाजार को कुछ समय के लिए सहारा भी मिल सकता है। लेकिन विदेशी निवेशक पैसा लगाने से पहले शेयरों की कीमत, कंपनियों की कमाई और दूसरे बाजारों में मिलने वाले रिटर्न की भी तुलना करते हैं।
जब भारतीय शेयर दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले महंगे हों और वहां रिटर्न भी कम मिल रहा हो, तो केवल टैक्स में राहत निवेश का रुख बदलने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। यानी सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। LTCG खत्म करके बाजार को राहत दे या सरकारी खजाने की कमाई बचाए। और अगर टैक्स हटा भी दिया जाए, तो विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिए भारतीय बाजार में बेहतर रिटर्न और शेयरों की वाजिब कीमतें भी जरूरी होंगी।
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