Source :- LIVE HINDUSTAN
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ये किस्सा सन 1999 का है। पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा (LOC) पार कर भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान से मिले इस धोखे से बेहद आहत थे। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ ही समय पहले वो खुद शांति का पैगाम लेकर बस से लाहौर गए थे।
फिर क्या हुआ?
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा था, ‘एक दिन पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने ऑफिस में बैठे थे। तभी उनके एडीसी ने आकर कहा, भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे बेहद जरूरी बात करना चाहते हैं।’
अटल बिहारी वाजपेयी ने कॉल पर क्या कहा था?
अटल बिहारी वाजपेयी ने बेहद तल्ख और निराश आवाज में नवाज शरीफ से कहा, ‘मियाां साहब, एक तरफ आप लाहौर में मेरे साथ गर्मजोशी से गले मिल रहे थे और दूसरी तरफ आपके सैनिकों ने हमारे कारगिल पर कब्जा कर लिया? ये कैसी दोस्ती है?’ नवाज शरीफ सकपका गए। उन्होंने कहा कि उन्हें कारगिल की स्थिति के बारे में नहीं पता था और ये सब उनकी मर्जी के बिना हुआ है।
अटल बिहारी वाजपेयी की स्ट्रैटेजी
तभी अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ से कहा, ‘ठीक है! अगर आप मेरी बात पर भरोसा नहीं कर रहे, तो जरा उस शख्स से बात कीजिए जो इस वक्त मेरे पास बैठा है।’ अटल बिहारी वाजपेयी ने दिलीप कुमार को फोन दिया।
दंग रह गए थे नवाज शरीफ
जैसे ही फोन पर नवाज शरीफ ने दिलीप कुमार की आवाज सुनी वह दंग रह गए। दरअसल, दिलीप कुमार का जन्म बंटवारे से पहले पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था इसलिए पाकिस्तान में भी उन्हें बहुत पसंद किया जाता था।
दिलीप कुमार ने क्या कहा था?
दिलीप कुमार ने कहा, ‘मियाां साहब, हमें आपसे ये उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। आपने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति रखने का दावा किया है। एक हिंदुस्तानी मुस्लिम होने के नाते मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है तो भारत के मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। उनके लिए घरों से निकलना तक मुश्किल हो जाता है। खुदा के लिए इस स्थिति को संभालिए और कुछ कीजिए।’
क्या इस कॉल के बाद युद्ध रुक गया था?
कहा जाता है कि इस फोन कॉल के बाद कुछ समय के लिए सरहद पर तनाव थोड़ा कम हुआ था। हालांकि, धीरे-धीरे हालात इतने बिगड़ते चले गए कि ये युद्ध पूरे तीन महीने तक चला था और भारत ने अपने वीर जवानों की बदौलत कारगिल पर दोबारा तिरंगा फहराया था।
मिला था पाकिस्तान वापस जाने का ऑफर
1930 के दशक में दिलीप कुमार का परिवार मुंबई आ गया था। 1947 के विभाजन के समय किसी ने दिलीप कुमार के पिता से कहा था कि उन्हें वापस पेशावर लौट जाना चाहिए, तो दिलीप कुमार ने जवाब दिया था, ‘मेरा वतन यही है, मैं जिऊंगा भी हिंदुस्तान में और मरूंगा भी हिंदुस्तान में।’
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